प्रवचन नंबर १५. , वटवृक्ष
२१-०५-१९५३
कोईसा भी साधन हो किन्तु भगवान के नाम का जप और परमात्मा के स्वरुप की स्मृति अवश्य करें| वह चाहे वाणी से हो या श्वास से | चिंतन तो मन से ही होता है, बुद्धि और लगा दें| परमात्मा हैं ! इस प्रकार मानने में ना कौड़ी लगती है ना छदाम | ऐसा दृढ निश्चय करें की फिर यह निश्चय कायम रहे| बुद्धिसे मान लेवे की परमात्मा हैं| भक्तिपूर्वक, आदरपूर्वक बुद्धिमें विश्वास हो इसीका नाम श्रद्धा है| इस प्रकार बुद्धिकी मान्यतानुसार मन से भगवान का स्मरण एवं उनके नाम का जप होना चाहिए| स्मरण और जप हमेशा बना रहे इसके लिए शक्ति अनुसार प्राण-पर्यंत चेष्टा करनी चाहिए| मृत्युको स्वीकार कर लेवे किन्तु भगवानके नाम-जप एवं स्मरण को ना छोड़े | मारना तो है ही फिर भगवान के नाम को लेते हुए यदि मृत्यु हो तो इससे बढ़कर और क्या होगा ?
प्रार्थना करें की मरते समय आपके नाम का जप हो, चाहे आप दर्शन ना दें किन्तु श्रद्धा-भक्तिपूर्वक आपके नाम का जप और स्मृति बनी रहे, यह बह्ग्वान से प्रार्थना करें, मांग करें| यह, कामना होती हुई भी इतनी शुद्ध और पवित्र है की इससे मुक्ति हो जावे| शरीर भी छूटने वाला होवे तो आज ही छूट जावे किन्तु उनको याद करते हिउये छूटे| चाहे गंगा के किनारे मृत्यु ना होकर किसी हरिजन के घर मृत्यु होवे किन्तु आपकी स्मृति सदा बनी रहे|
भगवान से भी प्रार्थना करें की हे भगवान ! आप कृपया करके इसमें मदद करिये| यही सिद्धांत है, यही साधन, यही साधनों का नीचोड़ है| इस साधन को सिद्धांत मानकर इसका पालन करें| फिर साधन में कोई कमी भी रह जाए तो यह साधन स्वयं उसको संभाल लेता है| किन्तु इसमें कमी रह जाए तो फिर ना तो कोई सहायक है और ना साधन है| अब से अंत तक अभ्यास करें तो हमारा कल्याण हो जाय | इस बात पर भगवान गारंटी देते हैं –
“हे अर्जुन ! जो पुरुष मेरेमें अनन्य चित्त से स्थित हुआ, सदा मेरेको स्मरण करता है, उस निरंतर मेरेमें युक्त हुए योगीके लिए मैं सुलभ हूँ, अर्थात सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ|” (गीताजी ८/१४)
“जो पुरुष अन्त्काल्में भी मेरेको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात स्वरुप को प्राप्त होता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है|” (गीताजी ८/५) यही भगवान का क़ानून है|
“हे अर्जुन ! यह मनुष्य अन्त्काल्में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीरको त्यागता है, उस उसको ही प्राप्त होता है| परन्तु सदा जिस भाव का चिंतन करता है, अन्त्काल्में भी प्राय: उसीका स्मरण होता है|” (गीताजी ८/६)
सदा तदभाव से भावित हुआ यदि भगवान के नाम का जप करता हुआ मरता है, वह उनको ही प्राप्त होता है| देवताओं को याद करता हुआ जाता है वह उनको ही प्राप्त होता है| भूत-प्रेत और पिशाचों को याद करता हुआ जाता है वह उन्हीको प्राप्त होता है| इसलिए भगवान कहता हैं, “हे अर्जुन ! तू हरेक समय में मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर |” युद्धमें तो बड़ा ही जोर आता है| जब भगवान को याद रखते हुए युद्ध हो सकता है, तो फिर हमारेको सब काम करते हुए स्मरण क्यूँ नहीं हो सकता ? इसलये माता-बहिनों और भाईयों को भगवान को स्मरण करते हुए सब काम करना चाहिए|
भगवान को याद करते हुए काम करनेसे बुरे काम तो होंगे ही नहीं और आगे-पीछे के सब पाप भी स्वाहा हो जायेंगे| इस बात को मानकर इस कार्य के लिए कटीबद्ध हो जाना चाहिए |
नारायण नारायण नारायण श्रीमन्नारायण नारायण नारायण.............
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