※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।
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शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

कल्याण प्राप्ति की कई युक्तियां -5-


|| श्री हरि: ||
आज की शुभ तिथि – पंचांग
माघ  शुक्ल,षष्ठी, शुक्रवार, वि० स० २०६९


स्वप्न  में जो संसार दीखता है, आँखे खोलने से जागने पर वह नहीं दीखता | इसी तरह यह विश्वास कर ले की मैं स्वप्न में हूँ, मुझे जो कुछ भी प्रतीत हो रहा है वह सब स्वप्न है | जब स्वप्न समाप्त हो जायेगा तब अपने-आप ही असली सत्य वस्तु दीखने लगेगी | यह विश्वास कर ले की जो दीखती है वह सच्ची वस्तु नहीं है, यह स्वप्नवत है | जो भासती है वह है नहीं | स्वप्न मिटने वाला जरुर है | आँख खुलते ही मिट जायेगा | इस पर यदि यह कहा जाये की आजतक आँख क्यों नहीं खुली ? तो इसका उत्तर यह है की आज तक संसार के  स्वप्नवत होने का निश्चय ही कब किया था ? आत्मा का संकल्प सत्य है | इसलिए यह निश्चय करो की संसार स्वप्न है | चाहे वह सत्य ही क्यों न दिखाई दे, उसे स्वप्नवत मानते रहो | मानते-मानते एक दिन स्वप्न का नाश हो जायेगा और सत्य वस्तु प्राप्त हो जाएगी |

सबको प्राण ही सबसे बढकर प्यारे है | प्राण के समान प्यारा कुछ भी नहीं है, प्रिय-से-प्रिय वस्तु तो याद रहेगी ही | इसलिए प्राणों में ब्रह्म की भावना करे | आने-जाने वाले श्वास की तरफ लक्ष्य रखे | श्वास तो अन्ततक आता ही है | इसी तरह यह अभ्यास किया जायेगा तो अंत समय में उद्धार हो जायेगा | प्राण को ब्रह्म मान ले ! उसमे होनेवाले शब्द को ब्रह्म का नाम मान ले; क्योकि प्राणों से ‘सोअहं सोअहं’ शब्द का उच्चारण होता रहता हैं | यह भी परमात्मा का नाम है | इसलिए प्राण ही ब्रह्म है ऐसा निश्चय करने से परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है | अब जिसको जो उपाय सुगम एवं प्यारा मालूम हो उसी का साधन करे |

इस प्रकार कल्याण की प्राप्ति के और भी सैकड़ो उपाय है, परन्तु कुछ-न-कुछ तो करना ही होगा | साधन किये बिना कल्याण नहीं हो सकता | वे सब साधन गीता, वेद तथा श्रुति में बतलाये गए है | श्रेयार्थियो को इनमेसे कोई-सा भी एक साधन, जो उन्हें पसन्द हो करना चाहिये |

नारायण नारायण नारायण..नारायण नारायण नारायण... नारायण नारायण नारायण....

ब्रह्मलीन परमश्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका, भगवत्प्राप्ति के विविध उपाय, कोड ३०९, गोरखपुर

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

कल्याण प्राप्ति की कई युक्तियां -4-


|| श्री हरि: ||
आज की शुभ तिथि – पंचांग
माघ  शुक्ल, बसन्तपंचमी , गुरूवार, वि० स० २०६९

                             

गंगाजी के प्रवाह का, हवा, पशु, पक्षीआदि का जो शब्द सुनाई दे उसमे ऐसी भावना करे की शब्द ही भगवान है | किसी प्रकार का भी शब्द सुनाई क्यों न दे ‘नादं ब्रह्म’ शब्द को ही ब्रह्म समझे |जो कुछ भी सुनाई दे वह भगवान है | चाहे कोई गाली दे, चाहे आशीर्वाद दे, दोनों को ही भगवान समझे | यदि गाली सुनकर हमे दुःख होता है तो फिर हमने शब्द को भगवान कहा समझा ? भगवान समझने पर तो आनन्द-ही-आनन्द होगा | भगवान के दर्शनों से जो आनन्द है, गाली को सुनने से भी उसी आनन्दका अनुभव करे, इस बात से भी कल्याण हो जाता है |

संकल्पमात्र (स्फुरणामात्र) को भगवान का स्वरुप समझकर एकान्त में आँखे मीचकर बैठ जावे | मन जहाँ जाता है और जो कुछ देखता है सब भगवान है ऐसी भावना करे | यह निश्चय कर ले की मेरा मन भगवान के सिवा और किसी वस्तु का चिन्तन नहीं करता है | मन घट, पट आदि जिस किसी भी पदार्थ का चिन्तन करे उसकी को भगवान समझ ले, उसमे भगवद बुद्धि कर ले | यह विश्वास कर ले की जो कुछ मन चिन्तन करता है वह भगवान है | भगवान का स्वरुप वही है जो मन चिन्तन करता है | चाहे वह स्त्री, पुत्र, धन आदि का ही चिन्तन करे; उनको स्त्री,पुत्र एवं धन न समझे,किन्तु भगवान समझे |पत्थर तथा वृक्ष जिस किसी का भी चिन्तन करे सब भगवान है | जैसा दीखे वैसा ही भगवान का स्वरुप मान ले | यह भी कल्याण प्राप्ति का सीधा रास्ता है | ऊपर जितनी बाते बतलाई गयी है, उनमे से एक-एक के पालन से कल्याण हो सकता है | हाँ, यह बात जरुर है की श्रद्धा और रूचि के तारतम्य के कारण किसी साधन में समय अधिक लगता है और किसी में कम | लेकिन कल्याण सभी से होता है |

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ब्रह्मलीन परमश्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका, भगवत्प्राप्ति के विविध उपाय, कोड ३०९, गोरखपुर

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

कल्याण प्राप्ति की कई युक्तियां -3-


|| श्री हरि:||
आज की शुभ तिथि – पंचांग
माघ  शुक्ल, तृतीया, बुधवार, वि० स० २०६९



वृक्ष, पत्थर, मनुष्य, पशु, पक्षी इत्यादि संसार की जो भी वस्तुएँ दिखलाई दे उन सबमे यह भाव करे की भगवान ने ही ये सब रूप धारण कर रखे है | मन से कहे जहाँ तुम्हारी इच्छा हो वहाँ जाओ,सब रूप तो भगवान ने ही  धारण कर रखे है | जो भी वस्तुये दिखलाई देती है वे सब परमात्मा नारायण के ही रूप है | सारे संसार में सबको भगवान का ही रूप समझकर मन-ही-मन भगवदबुद्धि से सबको प्रणाम करे | एक परमात्मा ने ही अनन्त रूप धारण कर लिए है, इस प्रकार के अभ्यास से भी कल्याण हो जाता है | इस प्रकार शास्त्रों में बहुत उपाय बतलाये गये है | जिसको जो मालूम हो पड़े उसको उसी का साधन करना चाहिये | क्योकि उनमे से किसी भी एक का साधन करने से कल्याण हो सकता है |

वृतिया दो है  अनुकूल और प्रतिकूल | जो मन को अच्छी लगे वह अनुकूल एवं जो मन के विरुद्ध हो वह प्रतिकूल कही जाती है | कोई भी काम जो मन के अनुकूल होता है उसमे स्वाभाविक ही प्रसन्नता होती है और जो मन के प्रतिकूल होता है उसमे दुःख होता है | उस दुःख को भगवान का भेजा हुआ पुरस्कार समझकर उसमे से प्रतिकूलता को निकाल दे और यह विचार करे की जो कुछ भी होता है भगवान की इच्छा से होता है | भगवान की इच्छा के बिना पेड़ का एक पत्ता तक नहीं हिल सकता |

हम लोग अनुकूल में तो प्रसन्न होते है और प्रतिकूल में द्वेष करते है | भला इस प्रकार कहीं भगवान मिल सकते है ? भगवान की प्रसन्नता में ही प्रसन्नता का निश्चय करना चाहिये | जो बात मन के अनुकूल होती है उसमे तो ऐसा निश्चय करने में कोई कठिनाई है ही नहीं, लेकिन जो मन के प्रतिकूल हो उसको अनुकूल बना लेना चाहिये | स्मरण रखना चाहिये की भगवान के प्रतिकूल तो वह है नहीं, उनके प्रतिकूल होता तो होता ही कैसे ? इस साधना से भी उद्धार हो सकता है |

वाणी से सत्य बोले,व्यवहार सत्य करे, सत्य का आचरण करे | इससे कल्याण हो सकता है |

साँच बरोबर तप नही झूठ बरोबर पाप |

जाके हिरदै साँच है ताके हिरदै आप ||

सारे संसार में जितने पदार्थ रूप में दिखलाई देते है वे सब सचमुच नाशवान है | वे जैसे है हमारी आँखों के सामने है | उन सब पदार्थों में समबुद्धि कर ले | उनमे से भेदभाव उठा ले | किसी भी वस्तु में भेद न रखे | जैसे शरीर में अपनापन है, भेद नहीं, अंगो में अंतर नहीं; इसी तरह एक-दूसरे में भेद न रखे | सबमे समता कर ले, भेदबुद्धि उठा दे | इस भेदबुद्धि के उठाने से भी कल्याण हो जायेगा |

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ब्रह्मलीन परमश्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका, भगवत्प्राप्ति के विविध उपाय, कोड ३०९, गोरखपुर

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

कल्याण प्राप्ति की कई युक्तियां -2-


|| श्री हरि:||
आज की शुभ तिथि – पंचांग
माघ  शुक्ल, द्वितीया,मंगलवार, वि० स० २०६९




उठते, बैठते, चलते हर समय नाम-ही का जप किया जाये | नाम को कभी भी न भूले, यह भगवतप्राप्ति का बहुत सुगम उपाय है | कहा भी है :-


कलिजुग केवल नाम आधारा | सुमिरि सुमिरि भव उतराहू पारा ||
सुमिरि पवनसुत पवन नामु | अपने बस कर राखे रामु ||
अपितु अजामिलु गजू गनिकाऊ | भये मुकुत हरी नाम प्रभाउ ||

एक ऐसा साधन भी है जिससे हर समय आनन्द रहता है और जिसमे परिश्रम भी नही करना पडता | वह है आनन्दमय का अभ्यास | ‘आनन्दमयो अभ्यासात |’ (ब्र० सू० १|१|१२) ‘आनन्द परमात्मा का स्वरूप् है |’ चारो तरफ भीतर-बाहर आनंद-ही-आनन्द भरा हुआ है, सारे सन्सार में आनंद छाया हुआ है | यदि ऐसा दिखलाई न दे तो वाणी से केवल कहते रहो और मन से मानते रहो | जल में डूब जाने, गोता खा जाने के सामान निरन्तर आनंद में ही डूबे रहो और गोता लगते रहो | रात-दिन आनंद में मग्न रहे | किसी की मृत्यु हो जाये, घर में आग लग जाये अथवा और भी कोई अनिष्ट कार्य हो जाये तो आनन्द-ही-आनन्द, कुछ भी हो केवल आनन्द-ही-आनन्द | इस प्रकार का अभ्यास करने से सम्पूर्ण दुःख एवं क्लेश नष्ट हो जाते है | वाणी से उच्चारण करे तो केवल आनंद ही का, मन से मनन करे तो आनंद ही का और बुद्धि से विचार करे तो आनन्द ही का; परन्तु यदि ऐसी प्रतीति न हो तो कल्पित रूप से ही आनन्द का अनुभव करे | इसका भी फल बहुत अच्छा होता है | ऐसा करते-करते आगे चल कर नित्य आनन्द की प्राप्ति हो जाती है | इस साधन को सब कर सकते है | पुराने ज़माने में मुसलमानों के राज्य में हिन्दुओं से कहा गया कि तुम मुसलमान मत बनो, हिन्दू ही रहो एवं हिन्दू धर्म का पालन करो, केवल मुसलमानों में अपना नाम लिखा दो | कोई पूछे तो कहो की हम मुसलमान है | इससमें तुम्हारा क्या बिगड़ता है | उन्होंने यह बात स्वीकार कर ली | आगे चल कर उनकी सन्तान से कजिओ ने कहा की तुम तो मुसलमान हो इसलिये मुसलमानों के धर्म का पालन करो | अन्त में यहाँ तक हुआ के वे लोग कट्टर मुसलमान बन गए | इसी प्रकार हमलोगों को भी यही निश्चय कर लेने से आनन्द-ही-आनन्द हो जायेगा |

भगवान की मूर्ती या चित्र को सामने रखकर तथा आंखे खोल कर उनके नेत्रों से अपने नेत्र मिलावे | त्राटक की भाँती आँखे खोल कर उसमे ध्यान लगा दे | ध्यान के समय यह विश्वाश रखे की इसमें भगवान प्रगट होंगे | विश्वासपूर्वक ऐसा ध्यान करने पर इससे भी भगवान मिल जाते है | यह भी भगवत्प्राप्ति का सुगम साधन है |

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ब्रह्मलीन परमश्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका, भगवत्प्राप्ति के विविध उपाय, कोड ३०९, गोरखपुर

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

कल्याण प्राप्ति की कई युक्तियां -1-


|| श्री हरि: ||
आज की शुभ तिथि – पंचांग
माघ  शुक्ल, प्रतिपदा,सोमवार, वि० स० २०६९


सभी कार्यो में स्वार्थत्याग प्रधान है | किसी भी वैध कार्य में स्वार्थ का त्याग होने से नीच-से-नीच प्राणी का भी कल्याण हो जाता है |

उतने ही भोगो का अनासक्त भाव से ग्रहण किया जाये जितना शरीर निर्वाह के लिये  आवश्यक है | तथा केवल आसक्ति का त्याग कर देने से भी कल्याण हो जाता है |

जो कुछ भी करे उसमे अहंकार का त्याग कर दे | किसी भी उत्तम कार्य में अहंकार को पास न आने दें |

घर में भगवान की मूर्ति रखकर भक्ति-भाव से उसकी पूजा, आरती, स्तुति एवं प्रार्थना करने से भी कल्याण हो जाता है |

प्रतिदिन नियमपूर्वक एकान्त में बैठकर मन से सम्पूर्ण संसार को भूल जावे | इस प्रकार संसार को भुला देने से केवल एक चैतन्य आत्मा शेष रह जाता है | तब उस चैतन्य स्वरुप का ध्यान करें | ध्यान करने से समाधी हो जाती है और मुक्ति हो जाती है |

 यह नियम ले-ले कि शरीर से वही कार्य निष्काम भाव के साथ किया जायेगा की जिससे दूसरे का उपकार हो | इसके समान कोई भी धर्म नहीं है | भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने कहा है

पर हित सरिस धर्म नहीं भाई | पर पीड़ा सम नहीं अधमाई ||

इस नियम को धारण कर लेने से भी संसार की मुक्ति हो जाती है |

यदि इन्द्रियाँ और मन वश में हो तो भगवान का ध्यान ही सबसे बढकर कल्याण का साधन है | यदि मन, इन्द्रियाँ वश में न हो तो ऐसी अवस्था में बिना किसी कामना के केवल आत्मा के कल्याण केलिए व्रत एवं उपवास आदि का साधन करना चाहिये | परमात्मा की प्राप्ति के अतिरिक्त उनसे कुछ भी कामना नहीं करनी चाहिये | इस प्रकार साधन करने से भगवान की प्राप्ति होती है |सारांश यह है कि यदि मन एवं इन्द्रियाँ वश में हो तो ध्यानयोग का साधन करे | नहीं तो बिना किसी कामना के केवल भगवान की प्राप्ति के लिये ही तप एवं उपवास आदि का साधन करे | लेकिन इन सबमें भी सुगम उपाय तो भजन ही है |

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नारायण नारायण नारायण.. नारायण नारायण नारायण... नारायण नारायण नारायण....

ब्रह्मलीन परमश्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका, भगवत्प्राप्ति के विविध उपाय, कोड ३०९, गोरखपुर