※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।
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बुधवार, 27 मार्च 2013

मान-बड़ाई का त्याग-५

|| श्रीहरिः ||
आज की शुभतिथि-पंचांग
फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा,बुधवार, वि०स० २०६९
* मान-बड़ाई का त्याग *

गत ब्लॉग से आगे....... इसी प्रकार जो सच्चे प्रेमी होते हैं, वे अपने प्रेमास्पद का एक क्षण के लिए भी वियोग नहीं सह सकते | वे जान-बूझकर तो अपने प्रेमास्पद का त्याग कर ही नहीं सकते, यदि प्रेमास्पद उन्हें बरबस अलग कर देता है तो विरह के कारण उनकी दशा शोचनीय हो जाती है | किसी-किसी प्रेमी की तो प्रेमास्पद के विरह में मृत्यु तक हो जाती है, अथवा मृत्यु की-सी दशा हो जाती है, जलके अभाव में मछली की तरह उसके प्राण छटपटाने लगते हैं | वह यदि जीता है तो प्रेमी की इच्छा मानकर—उसके मिलनकी आशा से ही जीता है; मनसे तो उसका प्रेमास्पद से कभी वियोग होता ही नहीं, मन उसका निरन्तर अपने प्रियतम में ही बसा रहता है | प्राचीन इतिहास के पन्नो को उलटने पर श्रद्धा और प्रेम का सर्वोच्च नमूना हमें भरतजी के जीवन में मिलता है | ननिहाल से लौटनेपर भरतजी ने जब सुना कि श्रीराम वनको चले गये और उनके वनगमन का कारण मैं ही हूँ, तब वे सब कुछ छोड़कर तुरंत श्रीराम के पास वनमें गए और अयोध्या लौट चलने के लिए उनसे प्रार्थना की | वाल्मीकीय रामायण में तो उन्होंने श्रीरामजी को यहाँतक कह दिया कि यदि आप अयोध्या न चलेंगे तो मैं अनशन-व्रत लेकर प्राणत्याग कर दूँगा | परन्तु फिर श्रीराम की आज्ञा मानकर, उनकी चरणपादुकाओं को मस्तक पर रखकर अयोध्या लौट आये | किन्तु अयोध्या लौटकर भी वे भोगों में लिप्त न हुए, अयोध्या से बाहर नन्दिग्राम में रहकर उन्होंने मुनियोंका-सा जीवन व्यतीत किया और बड़ी उत्कंठा से श्रीराम के लौटने की प्रतीक्षा करते रहे |
     
     यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि यदि भरतजी का श्रीराम के चरणों में अतिशय प्रेम था तो उनसे श्रीराम का वियोग कैसे सहा गया, श्रीराम के विरह में उन्होंने प्राण क्यों नहीं त्याग दिये, तो इसका उत्तर यह है कि भरतजी श्रीराम के निरे प्रेमी ही न थे, वे उच्च कोटि के श्रद्धालु भी थे |  प्रसन्नता में प्रसन्न रहना, प्राणों की बाजी लगाकर भी उनकी आज्ञा का पालन करना उनके जीवन का व्रत था | उनकी इस श्रद्धा ने ही उनके प्राणों की रक्षा की और उन्हें चौदह वर्षतक जीवित रखा | उन्हें विश्वास था कि चौदह वर्ष बीतनेपर श्रीराम से अवश्य भेंट होगी और फिर आजीवन मैं उनके साथ रहूँगा, फिर कभी वे मुझे अलग रहने को नहीं कहेंगे | इसी आशापर वे जीवित रहे | फिर भी उन्हें श्रीराम के वियोग का दुःख कम न था | एक-एक दिन गिनकर उन्होंने चौदह वर्ष व्यतीत किये और विरह-व्यथा में सुखकर वे अत्यन्त कृश हो गये | यही नहीं, चौदह वर्ष बीतने के बाद यदि श्रीराम वनसे लौटनेमें कुछ भी विलम्ब करते तो उनका प्राण बचना कठिन था | इस प्रकार प्रेम की ऊँची-से-ऊँची अवस्था उनके अन्दर व्यक्त थी | साथ ही उनमें श्रद्धा भी कम न थी | इसीलिए उन्होंने सोचा कि जब श्रीराम अपनी इच्छा से वनमें जा रहे हैं तो उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें लौटाने के लिए मुझे अति आग्रह क्यों करना चाहिए | इस प्रकार अतिशय प्रेम के साथ-साथ उनमें श्रद्धा भी उच्चतम कोटि की थी | किन्तु उच्च श्रेणी के प्रेमी अपने प्रेमास्पद की और सब बातें मानते हुए भी कभी-कभी उनके संग के लिए अड़ जाते हैं | संग के लिए उनका इस प्रकार आग्रह करना भी दोषयुक्त नहीं माना जाता | इससे उनकी श्रद्धा में कमी नहीं मानी जाती | सारांश यह है कि प्रेमी किसी भी हेतु से प्रेमास्पद का त्याग नहीं करता | प्रेमास्पद का संग बना रहे, इसके लिए वह कभी-कभी अपने प्रेमास्पद की रूचि की भी उपेक्षा कर देता है | इसके विपरीत, श्रद्धालु अपने श्रद्धेय की रूचि रखने के लिए उनके संग का भी प्रसन्नतापूर्वक त्याग कर देता है; परन्तु उनकी रूचि के प्रतिकूल कोई चेष्टा नहीं करता | प्रेमी को प्रेमास्पद का संग छोड़ने में मृत्यु के समान कष्ट होता है और श्रद्धालु को श्रद्धेय की रूचि के प्रतिकूल आचरण मरण के समान प्रतीत होता है | प्रेमास्पद प्रेम बढ़ाने के लिए यदि प्रेमी को कभी अलग कर देता है तो प्रेमी को उसका वियोग असह्य हो जाता है | इसी प्रकार श्रद्धालु से श्रद्धेय की रूचि का पालन करने में तनिक भी कोर-कसर सहन नहीं होती | सच्चे प्रेम और श्रद्धा का यही स्वरुप है |.........शेष अगले ब्लॉग में

—श्रद्धेय जयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्त्वचिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर
नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

रविवार, 24 मार्च 2013

मान-बड़ाई का त्याग -२



|| श्रीहरिः ||
आज की शुभतिथि-पंचांग
फाल्गुन शुक्ल द्वादशी,रविवार, वि०स० २०६९
* मान-बड़ाई का त्याग *

गत ब्लॉग से आगे.......अद्वैतसिद्धान्त की दृष्टिसे देखा जाय तो आत्मा और परमात्मा एक हैं, अतः अपने से भिन्न कोई है ही नहीं | इस सिद्धान्त को माननेवाले की दृष्टि में भगवान् श्रीराम और श्रीकृष्ण भी अपने ही स्वरुप हैं, अतः उनकी पूजा भी अपनी ही पूजा है | फिर उनकी पूजा से हटाकर कोई ज्ञानी महात्मा कैसे चाहेगा कि लोग मेरी पूजा करें | जो ऐसा चाहता है, वह देहाभिमानी है, ज्ञानी नहीं | ज्ञानी पुरुष को तो चाहिए कि यदि कोई दूसरा भी ऐसा करता हो तो उसे रोके, उसका विरोध करे, जिससे उसका अज्ञान दूर हो | ऐसा न करके यदि वह स्वयं अपने को पुजवाता है तो यही मानना पड़ेगा कि या तो वह अज्ञानी है, मुर्ख है या ढोंगी है, दम्भ के द्वारा अपना उल्लू सीधा करता है, मान, बड़ाई , प्रतिष्ठा का किंकर है | इसके सिवा और क्या कहा जा सकता है | फिर श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि के स्वरुप तो नित्य एवं दिव्य हैं, हमारी तरह पाञ्चभौतिक—मायिक नहीं | और महात्माओं का शरीर तो ज्ञान की प्राप्ति हो जानेपर भी माया का कार्य होने के कारण नाशवान, क्षणभंगुर ही है | ऐसी दशा में किसी भी मनुष्य का शरीर, चाहे वह बड़े-से-बड़ा महात्मा ही क्यों न हो, भगवान् राम-कृष्णादि के अलौकिक सौन्दर्य एवं माधुर्य से पूर्ण विग्रहों की समता कैसे कर सकता है | अतः भगवान् राम-कृष्णादि के दिव्य विग्रहों की पूजा से हटाकर जो अपने नाशवान शरीर को पुजवाता है, वह वास्तव में भगवान् के तत्त्व को नहीं जानता | इसी प्रकार भगवान् के दिव्य एवं मधुर नामों से हटाकर जो अपने नाम की पूजा, अपने नामका प्रचार करवाता है वह भी ज्ञानी नहीं, अज्ञानी ही है |
    यह तो हुई ज्ञान की बात | भक्ति के द्वारा जो भगवान् को प्राप्त कर चुका है, वह भी भगवान् के स्थान पर अपने को कैसे बैठाना चाहेगा | जो ऐसा करता है, वह तो अपने को घोर अन्धकार में डालता है | यदि यह कहा जाय कि वह स्वयं तो पूजा नहीं चाहता, परन्तु कोमल स्वभाव होने के कारण वह दूसरों को पूजा करने से रोक नहीं सकता, तो इसका उत्तर यह है कि जो भक्त दूसरों को अपने साथ अनुचित व्यवहार करनेसे रोक नहीं सकता, उन्हें समझा नहीं सकता, उसकी पूजा और प्रतिष्ठा से हमें क्या लाभ हो सकता है | भगवान् को प्राप्त हुए भक्तों में तो अलौकिक शक्ति होनी चाहिए | फिर यदि कोई मनुष्य भक्त होकर भी दूसरों के द्वारा अपने प्रति किये जानेवाले पूजा-प्रतिष्ठादि को रोक नहीं सकता तो वह दूसरों का कल्याण कैसे कर सकता है | किसी महात्मा के नामपर, चाहे वह भक्ति, ज्ञान, योग—किसी भी मार्ग से पहुँचा हुआ हो, कोई अनुचित व्यवहार करे और वह उसे रोक न सके—यह असम्भव है | यदि कोई श्रीहनुमानजी को भगवान् श्रीराम के स्थान पर बिठाकर पूजना चाहे तो भक्तशिरोमणि श्रीहनुमानजी उसकी इस पूजा को कैसे स्वीकार कर सकते हैं | यदि किसी सेठकी गद्दी पर कोई उसके गुमाश्ते या मुनीम को ही सेठके रूपमें सजाकर उसका सम्मान करना चाहे और वह गुमाश्ता या मुनीम यदि स्वामिभक्त है तो वह उस सम्मान को कब स्वीकार करेगा | और यदि करता है और सेठ को इस बात का पता चल जाय तो वह अपने गुमाश्ते या मुनीम के इस व्यवहार को कैसे सहन करेगा | नमकहराम नौकर ही ऐसा कर सकता है | सच्चा स्वामिभक्त ऐसी बात कभी सोच भी नहीं सकता | यहाँ तो गुमाश्ता या मुनीम सेठ बनकर ऐसा कर भी सकता है और सेठको पता ही न चले; परन्तु भगवान् तो सर्वव्यापी एवं सर्वज्ञ ठहरे, उनसे छिपाकर कोई कुछ कर ही नहीं सकता | भगवान्-सा सजकर पूजा ग्रहण करना कोई भगवत्प्राप्त पुरुष तो कर ही नहीं सकता, भक्तिमार्ग पर चलनेवाला साधक भी ऐसा नहीं कर सकता | इस प्रकार का अवसर अनायास कभी प्राप्त भी हो जाय तो भक्त साधक ऐसी अवस्था में रोने लग जायगा, वह समझेगा कि यह तो मेरे लिए कलंक की बात होगी | बात भी सच है, ऐसा करने-करानेवाला अपने और अपने भगवान् दोनों पर कलंक लगाता है | जो भगवान् के नामपर अपने को पुजवाता है, वह भक्ति का प्रचार करना तो दूर रहा, उलटा संसार में भ्रम फैलाता है और भगवान् भी उसकी इस करतूत पर मन-ही-मन हँसते हैं |.........शेष अगले ब्लॉग में

—श्रद्धेय जयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्त्वचिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर
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शनिवार, 23 मार्च 2013

मान-बड़ाई का त्याग-१



                                                                      || श्रीहरिः ||
आज की शुभतिथि-पंचांग
फाल्गुन शुक्ल एकादशी,शनिवार, वि०स० २०६९
* मान-बड़ाई का त्याग *

    जो उच्चकोटि के पुरुष हैं, जिन्होंने परमात्मा का तत्त्व भलीभांति जान लिया है, वे मान-अपमान, निन्दा-स्तुति आदि को समान समझते हुए भी मान-बड़ाई, पूजा-प्रतिष्ठा से बहुत दूर रहते हैं | क्योंकि साधनकाल में वे इन्हें विष के समान हेय तथा आध्यात्मिक उन्नति में बाधक समझकर इनसे बचते आये हैं और दृढ़ अभ्यास के कारण यही आचरण उनके अंदर सिद्धावस्था में भी देखा जाता है | सिद्ध पुरुष वास्तव में तो कुछ करते नहीं; किन्तु उनके द्वारा लोक में वैसा ही आचरण होते देखा जाता है, जैसा आचरण वे सिद्धावस्था के ठीक पहले करते रहे हैं | सिद्धावस्था को प्राप्त हुआ पुरुष कभी कोई ऐसा कार्य नहीं कर सकता जो संसार के लिए अनुकरणीय न हो | स्वयं भगवान ने गीता में कहा है—
यद्ददाचरति   श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो  जनः |
स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ||
(३ | २९)
‘श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करते हैं, अन्य पुरुष भी वैसा–वैसा ही आचरण करते हैं | वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्यसमुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है |’
    ऐसे पुरुष अपने जीवनकाल में तथा मरने के बाद भी मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा को नहीं चाहते | जो लोग उनके इस रहस्य को जानकर स्वयं भी मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा से दूर रहते हैं, वे ही उनके सच्चे अनुयायी कहलानेयोग्य हैं | इसके विपरीत जो लोग मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा के गुलाम हैं; किन्तु कहते हैं अपने को महात्माओं का अनुयायी, वे तो वास्तव में महात्माओं के संग को लजानेवाले हैं | जो लोग ऐसा मानते हैं कि महात्मा लोग लौकिक व्यवहार की दृष्टि से ही लोगों को अपनी पूजा करने से रोकते हैं, वे तो ऐसा करनेवाले महात्माओं को एक प्रकार से दम्भी सिद्ध करते हैं | जो लोग मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा का त्याग इसलिए करते हैं कि ऐसा करने से लोकमर्यादा की रक्षा होती है, किन्तु हृदय से अपने को पुजवाना चाहते हैं, वे वास्तव में महात्मा नहीं हैं | मरने के बाद पूजा चाहने का स्वरुप यह है कि लोग मरने के बाद उनकी कीर्ति को स्थायी रखने के लिए, उनकी स्मृति बनाए रखने के लिए किसी स्मारक का आयोजन करें और वे लोगों के इस विचार का समर्थन करें | यही नहीं, जो लोग अपने किसी पूज्य पुरुष के लिए इस प्रकार के स्मारक का आयोजन करते हैं, उनके सम्बन्ध में भी ऐसी धारणा अनुचित नहीं कही जा सकती कि वे स्वयं भी अपने लिए यही चाहते हैं कि मेरे मरने के बाद लोग मेरे लिए भी इसी प्रकार का स्मारक बनायें |
    जो कोई भी ऐसा चाहता है कि मरने के बाद लोग मेरा चित्र रखकर उसकी पूजा करें और मेरी कीर्ति अखण्ड रहे, उसके सम्बन्ध में यह निश्चय समझ लेना चाहिए कि वह परमात्मा के रहस्य को नहीं जानता, वह निरा अज्ञानी है | ज्ञान एवं भक्ति दोनों के ही सिद्धान्त से हम इसी निर्णय पर पहुँचते हैं | ज्ञान के सिद्धान्त से तो एक सच्चिदानन्द ब्रह्म के अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, तब कौन किसकी पूजा करे और कौन किससे पूजा कराये | एक ही परमात्मा सर्वत्र स्थित है, वह अनन्त और सम है; ऐसी स्थिति में अपने एकदेशीय स्वरुप की पूजा करानेवाला महात्मा कैसे समझा जाय | यदि कोई यह समझे कि पूजा ग्रहण करने से मेरा तो कोई लाभ-हानि नहीं; परन्तु पूजा करनेवाले को लाभ पहुँचेगा, तो वहाँ यह स्पष्ट है कि ऐसा समझनेवाला अपने को ज्ञानी और पूजा करनेवालों को अज्ञानी समझता है | किन्तु जो अपने को ज्ञानी और दूसरों को अज्ञानी समझता है, वह स्वयं अज्ञानी ही है | ज्ञानी के अन्दर यह भावना कदापि संभव नहीं है कि मेरी पूजा से दूसरों को लाभ पहुंचेगा | यदि यह कहा जाय कि ऐसा माननेवाला ज्ञानी तो नहीं हो सकता, किन्तु जिज्ञासु तो ऐसा मान सकता है, तो यह भी ठीक नहीं | अपनी पूजा से दूसरों का लाभ समझनेवाला जिज्ञासु भी नहीं हो सकता | इस प्रकार की धारणा जिज्ञासु के अन्दर भी नहीं हो सकती | निरा अज्ञानी ही ऐसा सोच सकता है |
    यदि यह मानें कि महात्मा स्वयं तो पूजा नहीं चाहते; परन्तु लोगों की दृष्टि से उन्हें महात्माओं की पूजा में प्रवृत्त करने के लिए वे ऐसा करते हैं, तो इसका उत्तर यह है कि लोगों को महात्माओं की पूजा में लगाना तो ठीक है; परन्तु ऐसा करना चाहिए अपने व्यक्तित्व को बचाकर ही | महात्माओं की पूजा का आदर्श स्थापित करने के लिए भी अपने को पुजवाना ठीक नहीं | यदि महात्माओं की पूजा का प्रचार ही करना है तो पहले भी तो अनेकों एक-से-एक बढ़कर महात्मा हो गये हैं और उनसे भी बढ़कर स्वयं भगवान् के अवतार हो चुके है; उन सबको छोड़कर अपनी पूजा करवाने की क्या आवश्यकता है |.........शेष अगले ब्लॉग में

—श्रद्धेय जयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्त्वचिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर
 नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!