※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

गुरुवार, 4 मई 2023

मेरा अनुभव

 

|| श्रीहरिः ||

आज की शुभतिथि-पंचांग

बैशाख शुक्ल चतुर्दशी, गुरुवार, वि०स० २०८०


मेरा अनुभव  

गत ब्लॉग से आगे....... रामायण में भी यही बात है-

           सोई सेवक प्रियतम मम सोई | मम अनुसासन मानै जोई ||

   जो मेरे अनुकूल है, मेरी आज्ञा मानता है वह सबसे बढ़कर प्रिय है | अनुकूल होना सबसे बढ़कर है | भगवान् के शरीर की सेवा करे उसे भगवान् ने प्रियतम नहीं कहा, परन्तु भगवान् के मन, वाणी और इशारे के अनुसार जो चलता है वह प्रियतम है | भगवान् का जो प्रिय काम है उस करनेवाले को सबसे बढ़कर प्रिय काम करनेवाला कहा है | सबसे कठिन-से-कठिन काम करने का मौका आता तो हनुमानजी भगवान् राम के लिए तैयार थे | अतः हनुमान से बढ़कर प्यारा काम कौन कर सकता है | इसलिए यहाँ समझना चाहिए कि गीता, रामायण संसार में सबसे बढ़कर हैं | गीता के लिए कहा है-

               गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्रविस्तरै: |

               या  स्वयं  पद्मनाभस्य  मुखपद्माद्विनिःसृता  ||

        रामायण के रचयिता दूसरे हैं और गीता तो स्वयं भगवान् के मुखारविंद से निकली है | इसलिए गीता सबसे बढ़कर है |

        आज तुलसीदासजी नहीं है, किंतु उनकी रामायण, विनय-पत्रिका, जीवनी जबतक मौजूद रहेंगे तबतक संसार का उद्धार होता रहेगा | उसकी इति कोई नहीं कर सकता | यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण कार्य है | उसी प्रकार हमलोग भी तुलसीदासजी के मुकाबले में ही नहीं, अपितु उनसे भी बढ़कर दुनिया को लाभ पहुँचा सकते हैं | ऐसे लोगों को ईश्वर से बढ़कर कह दें तो अत्युक्ति नहीं | स्वयं राम अपनी भक्ति एवं भावों का उतना प्रचार नहीं कर सकते जितना उनके भक्त कर सकते हैं | यदि संसार में भक्त नहीं होते तो भगवान् की उतनी कीमत नहीं होती; इसलिए भगवान् के भक्तों की इतनी महिमा गाई जाती है |

          आज आपको बड़ी तात्त्विक, सिद्धान्तकी, दार्शनिक मर्मकी बातें बतायी, भगवान् और महात्माओं के रहस्य की बात बतायी | जो भगवान् के अनुकूल हो जाता है उसका तो उद्धार हो ही जाता है, पर उसकी कृपा से दुनिया के लाखों-करोड़ो का उद्धार हो सकता है | ईश्वर के अनुकूल बनने से बढ़कर कोई काम नहीं | ईश्वर को प्राप्त हुए पुरुष के अनुकूल बनने से ही अपनी आत्मा का कल्याण हो जाता है और परमात्मा के अनुकूल हो जाये वह तो संसार का उद्धार कर सकता है | हम यदि किसी महात्मा के अनुकूल ही हो गये तो अपने उद्धार की चिंता नहीं रहती, फिर परमात्मा के अनुकूल बन जाएँ तो चिंता की बात ही नहीं है | संसार में ऐसे पुरुष बहुत कम हैं जो परमात्मा या महात्मा के अनुकूल हैं | जो भगवान् के अनुकूल बन गया उसने भगवान् को खरीद लिया | भगवान् की प्रतिज्ञा है-

                  ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् |

          जो अपने को भगवान् के समर्पण कर चुका है, भगवान् उसके समर्पण हो गये | भगवान् का मूल्य यही है | भगवान् प्रेम करनेवाले हैं | जो अपनी चीज भगवान् को अर्पण कर देता है, उसके लिए भगवान् की सब चीज अपनी है | यह प्रेम की बात है फिर भगवान् की और हमारी चीज में कोई भेद नहीं रह जाता | भगवान् को अपना सर्वस्व अर्पण कर देना चाहिए | स्वार्थ की दृष्टी से देखो तो भगवान् के आगे हम तुच्छ हैं, क्षुद्र हैं | भगवान् हमारा आवाहन कर रहे हैं, बुला रहे हैं इसलिए एक क्षण भी नहीं रुकना चाहिए | तत्काल शामिल हो जाना चाहिए | भक्ति में स्वरुप से दो रहते हुए एकता है और ज्ञान में दो नहीं रहते, एक तत्त्व ही बन जाता है | ऐसे मित्र को हम भी खोजते हैं कि हमारा सर्वस्व उसका और उसका सर्वस्व हमारा हो |


श्रद्धेय जयदयाल गोयन्दका सेठजी, मेरा अनुभव पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

 नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!


बुधवार, 3 मई 2023

मेरा अनुभव

 

|| श्रीहरिः ||

आज की शुभतिथि-पंचांग

बैशाख शुक्ल त्रयोदशी, मंगलवार, वि०स० २०८०

मेरा अनुभव



गत ब्लॉग से आगे....... मैं ज्ञान का वर्णन करता हूँ, तो सीढ़ी-दर-सीढ़ी साधन किया है | भक्ति के विषय में ज्यादा साधन नहीं- भगवान् की कृपा से है | एक तो प्रयत्न-साध्य है और दूसरा ईश्वर की कृपा से हो वह ज्यादा महत्त्वपूर्ण है | भक्ति के विषय में भगवान् की प्रेरणा हुई और ज्ञान का विषय अपने अभ्यास से हुआ | ईश्वर की भक्ति के विषय में, सगुण के तत्त्व के विषय में कोई अपनी विशेष जानकारी की बात कहे तो उसकी बात सुनकर कुछ हँसी-सी आती है | वह असली भक्ति के इर्द-गिर्द फिरता दीखता है | उनके वचन बिना जाने, अभिमान के वचन मालूम पड़ते हैं | अतएव मैं चुप रहता हूँ |

            कोई कहे भगवान् का भजन-ध्यान ठीक बनता है तो मैं समझता हूँ मूर्ख है, कुछ नहीं करता | उसपर आक्षेप नहीं करता -अपमान नहीं करता | कोई पूछे कि तुमको भगवान् के दर्शन हुए या नहीं तो उत्तर है कि इसका उत्तर देने में मैं लाचार हूँ | ऐसा प्रश्न किसी से नहीं करना चाहिए | प्रश्न करना मूर्खता है | इतना जानने मात्र से उसे परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती | जो हमारे पास वर्षों से रहते हैं, उनके भी विशेष लाभ नहीं दीखता तो एकदम उसका उत्तर दे देने से लाभ कैसे होगा !

          समता अमृत है | जैसे बासे की पूड़ी में भेद-भाव नहीं है, उस पूड़ी को चाहे अमीर ले, चाहे साधु ले, एक-सी पूड़ी है, वह अमृत है | साधुओं के लिए तो बिना माँगे मिले वह वस्तु अमृत है | किन्तु गृहस्थों के लिए कोई चीज खरीदने पर ही अमृत होती है |

         मेरी सबसे यह प्रार्थना है कि शरीर सबका शान्त होता है | मेरा शरीर शान्त होनेपर सत्संग का सिलसिला चलता रहे | जिस उद्देश्य से मकान ( गीताभवन ) बनाया गया है, उसका उद्देश्य यही है कि यहाँ पर भजन, सत्संग होता रहे तभी उद्देश्य की पूर्ति होगी | यह स्थान, वटवृक्ष सब भगवान् की कृपा से कुदरती बने हुए हैं | ये जबतक कायम रहें, तबतक यह सिलसिला इसी प्रकार जारी रहे तो बहुत ही उत्तम बात है | मेरी तो यही प्रार्थना है कि भविष्य में यथाशक्ति कोशिश करें कि यह चले- यहाँ भजन, ध्यान और सत्संग तीनों चलें | संसार में भजन, ध्यान और सत्संग से बढ़कर कोई चीज मूल्यवान नहीं है |

              हर-एक को यह ध्यान रखना चाहिए कि भजन, ध्यान और सत्संग बड़े ही महत्त्वपूर्ण हैं, जो इसमें शामिल होता है उसे तो लाभ होता ही है | अतएव हर कोई भाई तन-मन से इसमें सहायता देता रहे तो बहुत फायदा है | धन की तो आवश्यकता नहीं है, क्योंकि धन तो जबरदस्ती आकर प्राप्त हो उसे स्वीकारना पड़ता है | इस काम में तन-मन लगाने की ही प्रेरणा की जाती है | जो कोई शरीर से यहाँ नहीं आ सकता वह मन तो दे सकता है | तन-मन से आत्मा के कल्याण में मदद दें | जन और धन वे ही कल्याण करनेवाले हैं जो भगवान् की प्राप्ति में मदद करने वालें हों |

           भगवान् के भावों का प्रचार करनेवाले पुरुष को भगवान् ने सबसे उच्चकोटि का पुरुष माना है | मैंने गीता में पढ़ा-

               न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः |

               भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ||  (१८ | ६९)

यह श्लोक मुझे बहुत अच्छा लगा | भगवान् ने यहाँ तक कह दिया कि जो गीतारूपी संवाद का संसार में प्रचार करता है, उसके समान दुनियाँ में मेरा प्यारा काम करनेवाला न है, न हुआ और न होगा | हनुमान के प्रति भगवान् राम ने यह बात कही है कि हे हनुमान मैं तुम्हारा ऋणी हूँ | हनुमान ने भगवान् की आज्ञा का पालन किया तो कहना पड़ा कि मैं ऋणी हूँ, उस ऋण से मैं मुक्त होना भी नहीं चाहता | वही बात खयाल में रखकर हनुमान जी वहाँ जाते हैं जहाँ रामायण की कथा हो | गीता, रामायण वास्तव में एक हैं, इसलिए यह बात कही जाती है कि गीता का प्रचार मूल, शब्द, अर्थ, भाव, पुस्तक-वितरण, विक्रय, आचरण से, व्याख्यान देकर तथा सुनकर- हर-एक प्रकार से संसार में प्रचार करना, विस्तार करना, भगवान् के उत्तम ध्येय का प्रचार करना सबसे उत्तम है | अन्य तो सेवा है, किन्तु यह परम सेवा है | परम सेवा परमात्मा की सेवा है | निष्काम प्रेमभाव से तन-मन-धन  हर-एक से यह कार्य करना चाहिए | जो मेरी बात जितनी मानता है, वह मुझे उतना ही प्रिय लगता है | स्त्री-पुत्र भी अनुकूल नहीं हों तो प्रिय नहीं है | जो अनुकूल हैं, वे सबसे बढ़कर हैं |  .....शेष अगले ब्लॉग में

श्रद्धेय जयदयाल गोयन्दका सेठजी, मेरा अनुभव  पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

 नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

मंगलवार, 2 मई 2023

मेरा अनुभव

 

|| श्रीहरिः ||

आज की शुभतिथि-पंचांग

बैशाख शुक्ल द्वादशी, मंगलवार, वि०स० २०८०

 

मेरा अनुभव

         सभी सिद्धांतों से यही बात है कि मैं देह नहीं, आत्मा हूँ और भगवान् का चिदंश हूँ | ऐसा मानें तो भक्ति के मार्ग में विपरीत बात नहीं जाती | वास्तव में स्थूल शरीर से मृत्यु के समय सम्बन्ध-विच्छेद होता है और महाप्रलय में सूक्ष्म शरीर से सम्बन्ध-विच्छेद होता है | ज्ञान के सिद्धांत से आत्मा और प्रकृति का सम्बन्ध-विच्छेद होता है और परमात्मा में वह आत्मा मिल जाता है | भक्ति में जीव-ईश्वर का भेद नित्य है -भगवान् नित्य हैं | भक्तिमार्ग में माया अनादि और अनन्त है | सभी सिद्धान्त वाले स्थूल और सूक्ष्म शरीरों का अन्त मानते हैं, कारण का नाश सब कोई नहीं मानते | तीन देहों में से दो देह के साथ सम्बन्ध-विच्छेद सभी मानते हैं | जीव परमात्मा का अंश है, भक्तिमार्ग में स्वामी-सेवक का भाव है | अंशांशी की मान्यता का भी आरोप है | केवल ज्ञान में तो अजातवाद है -सृष्टि और माया है ही नहीं और केवल भक्ति में  जीव, ईश्वर और प्रकृति सदा से हैं और सदा रहेंगे |

       मैं बाल्यावस्था में भगवान् के चित्र को सामने रखकर मुखारविंद पर दृष्टी रखता और भावना करता कि भगवान् में क्रिया हो रही है | भाव रखता कि इसमें से भगवान् प्रकट होंगे | इससे भगवान् का ध्यान रहना, प्रसन्नता रहनी स्वाभाविक थी | तस्वीर कागज और काँच के सिवाय कोई वस्तु नहीं, परन्तु श्रद्धा और भाव से भगवद्विषयक ध्यान रहता था | मूर्ति चाहे पाषाण कि हो, चाहे कागज़ की -वास्तव में श्रद्धा-भाव से मूर्ति चेतन हो जाती है और साक्षात्-स्वरुप उसमें से प्रकट हो जाता है | छोटी अवस्था में साधु-महात्माओं का बहुत संग किया | मै तर्कशील था, इसलिए साधुओं के दर्जे के अनुरूप उनमें श्रद्धा करता था | परमात्मा को प्राप्त पुरुष बहुत कम मिले | अच्छे-अच्छे साधक तो बहुत मिले | गीता-शास्त्र आदि में जो लक्षण बताये हैं, उनके मुताबिक जितने लक्षण जिनमें होते, उनमें उतनी श्रद्धा होती थी | इस कसौटी से बहुत-से अच्छे-अच्छे साधु भी छिपकर रह जाते थे |

         ईश्वर की दया सबपर है, उसको जो माने उसे विशेष मालूम पड़ती है | अपनी दृष्टी से सोचता हूँ तो यह मालूम पड़ता है कि मेरे ऊपर जितनी दया है, उतनी शायद ही किसी के ऊपर होगी | अपनी प्रतीति की बात कहता हूँ कि परमात्मा कि अपार दया है | मुझे ऐसी प्रतीति नहीं होती तो मैं भक्ति का विरोधी होता |  वेदान्त के ग्रन्थ, योगवासिष्ट, पंचदशी, विचार-सागर देखे थे, पर विचार-सागर, पंचदशी में मेरी श्रद्धा नहीं थी | मैं इनका प्रचार भी नहीं करता | शंकराचार्यजी के अद्वैत सिद्धान्त पर मेरी श्रद्धा थी | भक्तिमार्ग के ग्रन्थ- श्रीमद्भागवत, रामानुजाचार्य जी की टीका, माधवाचार्य जी की टीका छपवाने में, प्रचार करने में मेरा विरोध नहीं है | ज्ञान का मार्ग और भक्ति का मार्ग मुझे ऐसे प्रतीत होते हैं -मानों गाड़ी के दो पहिये हैं | ज्यादा लोगों के लिए सुगम भक्ति ही मालूम देती है | शास्त्रों ने ज्ञान के मार्ग को कठिन बताया है, पर मैं उतना कठिन नहीं मानता, हाँ, समूह के लिए कठिन मानता हूँ | मैं तो कहता हूँ कि मेरे ऊपर भगवान् कि विशेष कृपा नहीं होती तो मैं या तो वेदान्ती या नास्तिक बन जाता | भगवान् ने बचा लिया | मैं आधुनिक वेदान्त को नहीं मानता | मैं मर्यादा का बहुत पक्षपाती हूँ | मैं मर्यादा का भक्त हूँ | मुझे मर्यादा प्रिय है | अच्छे पुरुषों में मेरी श्रद्धा हुई, किन्तु जितनी होनी चाहिए उतनी नहीं हुई | यह बात मानता हूँ कि अग्निहोत्र नित्य करना चाहिए, पर मैं नहीं कर रहा हूँ यह मेरे में कमी है | माता-पिता की सेवा करनी बड़ी महत्त्व की चीज है | परन्तु मेरे व्यवहार में माता-पिता की सेवा में कमी मिलेगी -व्यवहार में कमी है | शास्त्रोचित व्यवहार को आदर देता हूँ | किन्तु मेरे से वैसा व्यवहार नहीं होता तो उतनी मेरे में कमी है | ‘आवश्यक नहीं है यह बात मैं नहीं मानता |

          मान, बड़ाई, पूजा-प्रतिष्ठा के लिए जो दम्भ करता है वह राजसी है | नास्तिकता को लेकर जो दम्भ करता है वह तामसी है | इसी की ज्यादा निन्दा की गयी है | मैं ज्ञान के मार्ग की निन्दा नहीं करता हूँ | पर ज्ञान के मार्ग से गिरनेवाले निन्दा के पात्र हैं |

         प्रश्न-  भक्ति के मार्ग में आने में भगवान् की दया का क्या कारण है ?

       उत्तर-  यह कारण हो सकता है कि भक्ति के मार्ग की समय के अनुसार आवश्यकता है | कोई अन्धा गड्ढे की ओर जा रहा है तो कोई दयालु आदमी उसकी लकड़ी पकड़कर रास्ते पर लगा देता है, वैसे भगवान् ने आवश्यक समझकर किया है |

         निष्कामभाव, सत्यभाषण और मर्यादा -ये तीनों चीजें मेरी प्रकृति के अनुकूल ज्यादा पड़ी हैं | मर्यादा के अनुसार आचरण और सच्चाई प्रिय है | ये बातें होनी चाहिए, मनुष्य चाहे ज्ञान अथवा भक्ति किसी मार्ग से चले | भगवान् की सत्ता, निष्कामभाव, उत्तम आचरण, वैराग्य -ये एक-एक चीज बहुत उच्चकोटि की है |.....शेष अगले ब्लॉग में

श्रद्धेय जयदयाल गोयन्दका सेठजी, मेरा अनुभव  पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

 नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!