※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।
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सोमवार, 27 अगस्त 2012

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम






प्रजारन्जकता
      श्रीरामचन्द्रजी मे प्रजा को हर तरह से प्रसन्न रखने का गुण भी बड़ा ही आदर्श था । वे अपनी प्रजाका पुत्रसे भी बढ़कर वात्सल्यप्रेम से पालन करते थे । सदा-सर्वदा उनके हितमें रत रहते थे । यही कारण था कि अयोध्यावासियों का उनपर अद्भुत प्रेम था ।
   श्रीराम के वनगमन का, चित्रकूट मे भरत के साथ प्रजा से मिलाने का और परमधाम में पधारने के समयका वर्णन पढ़ने से पता चलता है कि आरम्भ से लेकर अन्त तक प्रजा के छोटे-बड़े सभी पुरुषों का श्रीराम में बड़ा ही अद्भुत प्रेम था । वे हर हालत में श्रीराम के लिये प्राण न्योछावर करने को तैयार रहते थे । उन्हें भगवान् राम का वियोग असह्य हो गया था ।
         जब श्रीरामचन्द्रजी वनमें जाने लगे, तब प्रजा के अधिकांश लोग प्रेममें पागल होकर उनके साथ हो लिये । भगवान् श्रीरामने बहुत-कुछ अनुनय-विनय कि; किन्तु चेष्टा करनेपर भी प्रजा को लौटा नहीं सके । आखिर उन्हें सोते हुए छोड़कर ही श्रीराम को वनमें जाना पड़ा । उस समय के वर्णन में यह भी कहा गया है कि पशु-पक्षी भी उनके प्रेम  में मुग्ध थे । उनके लिये श्रीराम का वियोग असह्य था । परमधाम मे पधारते समय का वर्णन भी ऐसा ही अद्भुत है ।
     इसके सिवा जिस सीताके वियोग में श्रीराम ने एक साधारण विरह-व्याकुल कामी मनुष्य कि भाँती पागल होकर विलाप किया था, उसी सीताको-यध्यपि वह निर्दोष और पति-परायणा थीं तो भी, प्रजा कि प्रसन्नता के लिये त्याग दिया । इससे भी उनकी प्रजारन्जकता का आदर्श भाव व्यक्त होता है ।

     श्रीराम का महत्व

 श्रीरामचन्द्रजी साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा भगवान् विष्णुके अवतार थे, यह बात वाल्मीकीय रामायण मे जगह-जगह कही गयी है । जब सब्सर मे रावण का उपद्रव बहुत बढ़ गया, देवता और ऋषिगण बहुत दू:खी हो गये, तन उन्होंने जाकर ब्रह्मा से प्रार्थना कि । पितामह ब्रह्मा देवताओं को धीरज बंधा रहे थे, उसी समय भगवान् विष्णुके प्रकट होने का वर्णन इस प्रकार आता है—
एतस्मिन्नन्तरे       विष्णुरूप्यातो     महाध्युति: ।
शंखचक्रगदापाणी:      पीतवासा       जगत्पतिः ।।
वैनतेयं   समारुह्य     भास्करस्तोयदं       यथा ।
तप्तहाटककेयू    वंध्यमान:           सुरोत्तमै: ।।
(वा०रा० १।१५।१६-१७ )
       इतने मे ही महान तेजस्वी उत्तम देवताओं द्वारा वन्दनीय जगत्पति भगवान् विष्णु मेघ पर चढ़े हुए सूर्य के समान गरुडपर सवार हो वहाँ आ पहुँचे । उनके शरीर पर पीताम्बर तथा हाथों में शँख, चक्र, और गदा आदि आयुध एवं चमकीले स्वर्ण के बाजूबंद शोभा पा रहे थे ।
    इसके बाद देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान् ने राजा दशरथ के घर मनुष्यरूप में अवतार लेना स्वीकार किया । फिर वहीँ अन्तर्धान हो गये ।
   श्रीरामचन्द्रजीका विवाह होने के बाद जब वे अयोध्या को लौट रहे थे, उस समय रास्ते में परशुरामजी मिले । श्रीराम विष्णु के अवतार है या नहीं—इसकी परीक्षा करने के लिये उन्होंने श्रीराम से भगवान् विष्णु के धनुष पर बाण चढाने के लिये कहा, तब श्रीरामचन्द्रजी ने तुरन्त ही उनके हाथ से दिव्य धनुष लेकर उस पर बाण चढ़ा दिया और कहा--`यह दिव्य वैष्णव बाण है । इसे कहाँ छोड़ा जाय ?` यह देख-सुनकर परशुरामजी चकित हो गये । उनका तेज श्रीराम मे जा मिला । उस समय श्रीरामकी स्तुति करते हुए परशुरामजी कहते हैं-
अक्षय्यं   मधुहन्तारं  जानामि त्वां सुरेश्र्वरम ।
धनुषोऽस्य  परामर्शात स्वस्ति तेऽस्तू परंतप ।।
 `शत्रुतापन राम !  आपका कल्याण हो । इस धनुष के चढाने सें मैं जान गया कि आप मधु-दैत्य को मारनेवाले, देवताओं के स्वामी, साक्षात् अविनाशी विष्णु है । इस प्रकार श्रीराम के प्रभाव का वर्णन करके और उनकी प्रदक्षिणा करके परशुरामजी चले गये ।
  रावण का वध हो जाने के बाद जब ब्रह्मा सहित देवता लोग श्रीरामचन्द्रजी के पास आये और उनसें बातचीत करते हुए श्रीरामने यह कहा कि मैं तो अपने को दशरथजी के पुत्र राम नाम का मनुष्य ही समझता हूँ । मैं जो हूँ, जहाँसे आया हूँ ---यह आप लोग ही बताएं । इस पर ब्रह्माजी ने सबके सामने सम्पूर्ण रहस्य खोल दिया । वहाँ राम के महत्व का वर्णन करते हुए ब्रह्माजी कहते हैं--
भवान्नारायणो    देव:   श्रीमांश्र्चक्रायुध:   प्रभु: ।
एक्श्रिंगे        वराह्स्त्वं    भूतभव्यपत्नजित ।।
अक्षरं  ब्रह्म  सत्यं  च मध्ये चान्ते  च  राघव ।
लोकानां  त्वं  परो   धर्मो  विष्वक्सेनश्र्चतुर्भुज: ।।
शार्न्गधन्वा    हृषीकेशः     पुरुषः  पुरुषोत्तमः ।
अजित:  खड्गधृग्   विष्णुः कृष्णश्र्चैव वृहदबल:।।
(वा०रा० ६।११७।१३-१५। )
  `आप साक्षात् चक्रपाणि लक्ष्मीपति प्रभु श्रीनारायण देव हैं । आप ही भुत-भविष्य के शत्रुओं को जिताने  वाले और एक श्रन्ग्धारी वराह भगवान् है राघव ! आप आदि, मध्य और अन्त में सत्यस्वरूप अविनाशी ब्रह्मा हैं । आप सम्पूर्ण लोकों के परमधर्म चतुर्भुज विष्णु हैं । आप ही अजित, पुरुष, पुरुषोत्तम, हृषिकेश शार्न्ग धनुष वाले खडगधारी विष्णु है और आप ही महाबलवान कृष्ण हैं ।
 इसी तरह और भी बहुत कुछ कहा है । वही राजा दशरथ भी लक्ष्मण के साथ बातचीत कृते समय श्रीराम कि सेवा का महत्व बतलाकर कहते हैं----`सौम्य ! यह परन्तम राम साक्षात् वेदवर्णित अविनाशी अव्युक्त ब्रह्मा है । यह देवों के हृदय और परम रहस्यमय है । जनक नन्न्दिनी   सीता के सहित इनकी सावधानी पूर्वक सेवा करके तुमने पवित्र धर्म का आचरण और बड़े भारी यश का लाभ किया है ।`
 इसके सिवा और भी अनेक बार ब्रह्माजी,देवता और महाऋषियों ने श्रीराम के अमित प्रभाव का यथा साध्य वर्णन किया है । मनुष्य-लीला समाप्त करके परमधाम में पधारने के प्रसंग में भी यह बात सपष्ट कर दि गयी है कि श्रीराम साक्षात् पूर्ण ब्रह्मा परमेश्वर थे । अत: वाल्मीकीय रामायण को प्रमाणिक ग्रन्थ मानने वाला कोई भी मनुष्य श्रीराम के ईश्वर होने में शँका कर सके, ऐसी गुंजाइश नहीं है ।
नारायण नारायण नारायण श्रीमन्नारायण नारायण नारायण........
[ पुस्तक तत्व-चिन्तामणि ! श्रीजयदयालजी गोयन्दका,कोड ६८३ ,गीता प्रेस गोरखपुर ] शेष अगले ब्लॉग में....

रविवार, 26 अगस्त 2012

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम ( कृतज्ञता )

                                           कृतज्ञता
वास्तव मे देखा जाय तो भगवान् श्रीरामचन्द्रजी साक्षात् परब्रह्म परमेश्र्वर थे । उनकी अपार शक्ति थी, वे स्वयं सबकुछ कर सकते थे और करते थे, उनका कोई क्या उपकार कर सकता था । तथापि अपने आश्रीतजनोंके प्रेम कि वृद्धि के लिये उनकी साधारण सेवाको भी बड़े-से-बड़ा रूप देकर आपने अपनी कृतज्ञता प्रकट की है ।

सीता को खोजते-खोजते जब श्रीराम रावणद्वारा युद्ध मे मारकर गिराये हुए जटायुकी दशा देखते हैं, उस समय का वर्णन है-----

निकृत्तपक्षं रुधिरावसिक्तं तं गृध्रराजं परिगृह्य राघव: ।
क्व मैथिली प्राणसमा गतेति विमुच्य वाचं निपपात भुमौ ।। 

`जिसके पंख कटे हुए थे, समस्त शरीर लहू-लुहान हो रहा था,ऐसे गीधराज जटायु को हृदयसे लगाकर  श्रीरघुनाथजी `प्राणप्रिया जानकी कहाँ गयी ?` इतना कहकर पृथ्वी पर गिर पड़े ।`फिर रावण का परिचय देते और सीताजी को ले जाने कि बात कहते-कहते ही जब पक्षिराज के प्राण उड़ जाते हैं, तब भगवान् श्रीराम स्वयं अपने हाथों से उसकी दाह-क्रिया करते हैं । कैसी अद्भुत् कृतज्ञता है ।

इसी तरह और भी बहुत से प्रसंग हैं । वानरों,राजाओं,ऋषियों और देवताओं से बात करते समय आपने जगह-जगह पर कहा है कि `आप लोगों कि सहायता और अनुग्रह से ही मैंने रावण पर विजय प्राप्त कि है ।` 

जब श्रीहनुमानजी सीताजी का पता लगाकर भगवान् रामसे मिले हैं, उस समय उनके कार्यकी बार-बार प्रंशसा करके अन्तमें रघुनाथजी ने यहाँ तक कहा है कि `हनुमान ! जानकी का पता लगाकर तुमने मुझे, समस्त रघुवंशको और लक्ष्मण को भी बचा लिया । इस प्रिय कार्यके बदले मे कुछ दे सकूँ, ऐसी कोई वस्तु मुझे नहीं दिखायी देती । अत: अपना सर्वस्व यह आलिंगन ही मैं तुम्हे देता हूँ ।` इतना कहकर हर्षसे पुलकित श्रीरामने हनुमान् को ह्रदय से लगा लिया । राज्याभिषेक हो जानेके बाद हनुमान् को विदा करते समय हनुमान् कि सेवा और कार्यों को स्मरण करके भगवान् राम कहते हैं---

एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यामि ते कपे ।
शेषस्येहोपकाराणां भवाम ऋणिनो वयम् ।।
मद्न्गे जीर्णतां यातु यत्त्वयोपकृतं कपे ।
नर: प्रत्युपकाराणामापत्स्वायाति पात्रताम् ।।     
 (वा०रा० ७।४०।२३-२४)

`हनुमान् ! तुम्हारे एक-एक उपकार के बदले में मैं अपने प्राण दे दूँ तो भी इस विषय में शेष उपकारों के लिये तो मैं तुम्हारा ऋणी ही बना रहूँगा । तुम्हारे द्वारा किये हुए उपकार मेरे शरीर में ही विलीन हो जायँ—उनका बदला चुकाने का मुझे कभी अवसर ही न मिले, क्योंकि आपत्तियाँ आने पर ही मनुष्य प्रत्युपकारों का पात्र होता है ।` इससे पता चलता है कि भगवान् श्रीरामका कृतज्ञता का भाव कितना आदर्श था ।

[ पुस्तक तत्त्व-चिन्तामणि । श्रीजयदयालजी गोयन्दका, कोड ६८३, गीता प्रेस गोरखपुर ]

नारायण  नारायण  नारायण  श्रीमन्नारायण  नारायण  नारायण........ 

शनिवार, 25 अगस्त 2012

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम ( शरणागतवत्सलता )

                                                                    शरणागतवत्सलता

यों तो श्रीराम कि शरणागतवत्सलता का वर्णन वाल्मीकीय रामायण मे स्थान स्थान पर आया है, कित्नु जिस समय रावण से अपमानित होकर विभीषण भगवान् श्रीराम कि शरण मे आया है, वह प्रसंग तो भक्तों के हृदय मे उत्साह और आनन्द कि लहरें उत्पन्न कर देता है ।

धर्मयुक्त और न्यायसंगत बात कहने पर भी जब रावण ने विभीषण कि बात नहीं मानी, बल्कि भरी सभा में उसका अपमान कर दिया, तब विभीषण वहाँ से निराश और दू:खी होकर श्रीराम कि शरण मे आया । उसें आकाश मार्ग से आते देखकर सुग्रीव ने सब वानरों को सावधान होने के लिये कहा । इतने में ही विभीषण ने वहाँ आकर आकाश में ही खड़े-खड़े पुकार लगाई कि मैं दुरात्मा पापी रावण का छोटा भाई हूँ । मेरा नाम विभीषण है । मैं रावण से अपमानित होकर भगवान् श्रीराम कि शरण में आया हूँ । आप लोग समस्त प्राणियों को शरण देने वाले श्रीराम को मेरे आने कि सूचना दें ।


यह सुनकर सुग्रीव तुरन्त ही भगवान् श्रीराम के पास गये और राक्षस स्वभाव का वर्णन कर श्रीराम को सावधान करते हुए रावण के भाई विभीषण के आने कि सूचना दी । साथ ही यह भी कहा कि ` अच्छी तरह परीक्षा करके, आगे पीछे कि बात सोचकर जैसा उचित समझें, वैसा करें । इसी प्रकार वहाँ बैठे हुए दुसरे बंदरों ने भी अपनी-अपनी सम्मति दी । सभी ने विभीषण पर सन्देह प्रगट किया, पर श्रीहनुमानजी ने बड़ी नम्रता के साथ बहुत सि युक्तियों से विभीषण को निर्दोष और सचमुच शरणागत समझाने की सलाह दी । इस प्रकार सबकी बातें सुनाने के अन्नतर भगवान् श्रीराम ने कहा—

मित्रभावेन संप्राप्तं न त्येजेयं कथन्च्न ।
दोषों यध्य्पी तस्य स्यात् सतामेतदगर्हितम् ।। (वा०रा०६।१८।३)

`मित्र भाव से आये हुए विभीषण का मैं कभी त्याग नहीं कर सकता । यदि उसमें कोई दोष हो तो भी उसे आश्रय देना सज्जनों के लिये निन्दित नहीं है ।` इसपर भी सुग्रीव को संतोष नहीं हुआ । उसने शंका और भय उत्पन्न करनेवाली बहुत-सी बातें कही । तब श्रीराम ने सुग्रीव को फिर समझाया---

पिशाचान् दानवान् यक्षान् पृथिव्यां चैव राक्षसान् ।
अन्कुल्यप्रेण तान् हन्यामिच्छ्न् हरिगणेश्वर ।।
बद्धान्ज्लिपूटं दीनं याचन्तं शरणागतम् ।
न हन्यदानृशंसस्यार्थमपि शत्रुं परंतप ।।
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम् ।।
आनायैनं हरिश्रेष्ठ दत्त्मस्याभयं मया ।
विभीषणो वा सुग्रीव यदि वा रावण: स्वयम् ।।
(वा० रा० ६ । १८ । २३,२६,३३-३४ )

`वानरगणाधीश ! यदि मैं चाहूँ तो पृथ्वी भर के उन पिशाच, दानव, यक्ष, और राक्षसों को अंगुली के अग्रभाग से ही मार सकता हूँ । ( अत: डरने कि कोई बात नहीं है ।)

परंतप ! यदि कोई शत्रु भी हाथ जोड़कर दीन भाव से शरण मे आकर अभय-याचना करे तो दया धर्म का पालन करने के लिये उसे नहीं मारना चाहिये । मेरे तो यह विरद है कि जो एक बार मैं आपका हूँ यों कहता हुआ शरण मे आकर मुझसें रक्षा चाहता है, उसें मैं समस्त प्राणियों से निर्भय कर सकता हूँ । वानरश्रेष्ठ सुग्रीव ! ( उपर्युक्त निति के अनुसार ) मैंने इसें अभय दे दिया, अत: तुम इसे ले आओ—चाहे यह विभीषण हो या स्वयं रावण ही क्यों न हो ।

 बस फिर क्या था । भगवान् कि बात सुनकर सब मुग्ध हो गये और भगवान् कि आज्ञानुसार तुरन्त ही विभीषण को ले आये । विभीषण अपने मंत्रियों सहित आकर श्रीराम के चरणों मे गिर पड़ा और कहने लगा- भगवान् ! मैं सब कुछ छोड़कर आपकी शरण में आया हूँ । अब मेरा राज्य, सुख और जीवन सब कुछ आपके ही अधीन है । इसके बाद श्रीराम ने प्रेमभरी दृष्टि और वाणी सें उसें धैर्य दिया और लक्ष्मण से समुद्र का जल मांगकर उसका वहीँ लंकाके राज्य पर अभिषेक कर दिया ।

[ पुस्तक तत्त्व-चिन्तामणि । श्रीजयदयालजी गोयन्दका,कोड ६८३,गीता प्रेस गोरखपुर ]

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गुरुवार, 23 अगस्त 2012

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम ,सख्य-प्रेम




    श्रीराम का अपने मित्रों के साथ भी अतुलनीय प्रेम का बर्ताव था । वह अपने मित्रों के लिये जो कुछ भी करते, उसें कुछ नहीं समझते थे, परन्तु मित्रों के छोटे से छोटे कार्य कि भी भूरि-भूरि प्रशंशा किया करते थे । इसका एक छोटा सा उदाहरण यहाँ लिखा जाता है । अयोध्या में भगवान् का राज्याभिषेक होने के बाद बन्दरोंको विदा करते समय मुख्य मुख्य बंदरों को अपने पास बुलाकर प्रेम भरी दृष्टि सें देखते हुए श्रीरामचन्द्रजी बड़ी सुन्दर और मधुर वाणी मे कहने लगे----

सुह्र्दो  मे  भवन्तश्च    शरीरं    भ्रातरस्तथा ।।

युश्माभिरुद्ध्रतश्र्चाहं   व्यसनात् काननौकस: ।

धन्यो  राजा  च  सुग्रीवो  भवद्धि: सुह्र्दां वरै: ।।

 वनवासी वानरों ! आप लोग मेरे मित्र हैं, भाई हैं तथा शरीर हैं । एवं आप लोगों ने मुझे संकट से उबारा है, अत: आप सरीखे श्रेष्ठ मित्रों के साथ राजा सुग्रीव धन्य हैं ।इसके सिवा और भी बहुत जगह श्रीराम ने अपने मित्रों के साथ प्रेम का भाव दिखाया है । सुग्रीवादि मित्रों ने भी भगवान् के सख्य प्रेम कि बारम्बार प्रशंशा कि है । वह अपने बर्ताव सें इतने मुग्ध रहते थे कि उनको धन,जन और भोगों की स्मृति भी नहीं होती थी । वह हर समय श्रीरामचन्द्र के लिये अपना प्राण न्यौछावर करने को प्रस्तुत रहते थे । श्रीराम और उनके मित्र धन्य है । मित्रता हो तो ऐसी हो ।


नारायण नारायण नारायण श्रीमन्नारायण नारायण नारायण........
(पुस्तक तत्त्व-चिन्तामणि, श्रीजयदयालजी गोयन्दका,कोड ६८३,गीता प्रेस गोरखपुर)

शनिवार, 18 अगस्त 2012

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम ( भ्रातृ-प्रेम )




श्रीराम का भ्रातृ-प्रेम

श्रीराम का भ्रातृ-प्रेम भी अतुलनीय था । लड़कपन से ही श्रीराम अपने भाइयों के साथ बड़ा प्रेम करते थे । सदा उनकी रक्षा कारते थे और उन्हें प्रसन्न रखने की चेष्टा करते थे । चारों भाई एक साथ घोड़े पर चढ़कर विचरण किया करते थे । रामचन्द्रजी को जो भी कोई भोजन या वस्तु मिलती थी, उसे वे पहले अपने भाइयों को देकर पीछे स्वयं खाते या उपयोग में लाते थे । यद्यपि श्रीराम का सभी भाइयों के साथ सामान भाव से ही पूर्ण प्रेम था, उनके मन में कोई भेद नहीं था, तथापि लक्ष्मण का श्रीराम के प्रति विशेष स्नेह था । वे थोड़ी देर के लिये भी श्रीराम से अलग रहना नहीं चाहते थे । श्रीराम का वियोग उनके लिये असह्य था, इसी कारण विश्र्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिये भी वे श्रीराम के साथ ही वन में गये । वहाँ राक्षसों का नाश करके दोनों भाई जनकपुर पहुँचे । धनुषभंग हुआ । तदनन्तर विवाह की तैयारी हुई और चारों भाइयों का विवाह साथ-साथ ही हुआ । विवाह के बाद अयोध्या में आकर चरों भाई प्रेमपूर्वक रहे ।

 कुछ दिनों के बाद अपने मामा के साथ भरत-शत्रुघ्न ननिहाल चले गये । श्रीराम और लक्षमण पिता की आज्ञानुसार प्रजा का कार्य करते रहे । श्रीराम के प्रेम भरे बर्तावसे, उनके गुण और स्वभाव से सभी नगर-निवासी और बाहार रहने वाले ब्राह्मणादि वर्णों के मनुष्य मुग्ध हो गये । फिर राजा दशरथ ने मुनि वसिष्ठ की आज्ञा और प्रजा की सम्मतिसे श्रीरामके राज्याभिषेक का निश्चय किया । राजा दशरथजीके मुख से अपने राज्याभिषेक की बात सुनकर श्रीराम माता कौसल्या के महल में आये । माता सुमित्रा और भाई लक्ष्मण भी वहीँ थे । उस समय अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कहते हैं---

लक्ष्मणेमां  मया  सार्ध प्रशाधि त्वं  वसुन्धराम् ।

द्वितीयं  मेऽन्तरात्मानं  त्वामियं  श्रीरुपस्थिता ।।  

सौमित्रे भुन्क्षय भोगांस्त्वमिष्टान् राज्य्फ़लानि च ।

जीवितं   छापी   राज्यं   च   त्वदर्थमभिकामये  ।।
(वा०रा०२।४।४३-४४ )

  ‘लक्ष्मण । तुम मेरे साथ इस पृथ्वी का शासन करो । तुम मेरे दूसरे अन्तरात्मा हो । यह राज्यलक्ष्मी तुझे ही प्राप्त हुई है । सुमित्रानन्दन ! तुम मनोवांछित भोग और राज्य-फलका उपभोग करो । मैं जीवन और राज्य भी तुम्हारे लिये ही चाहता हूँ ।’
  इसके बाद इस लीला-नाटक का पट बदल गया । माता कैकेयी के इच्छानुसार राज्यभिषेक वन-गमन के रूप में परिणत हो गया । सुमन्त्र के द्वारा बुलाये जाने पर जब श्रीराम महलमें गये और माता कैकेयी से बातचीत करने पर उन्हें वरदान की बात मालूम हुई, तब उन्होंने बड़ी प्रसन्नता प्रकट की । तदनन्तर वे माता कौसल्या से विदा माँगने गये,वहाँ भी बहुत बातें हुई ; परन्तु श्रीरामने एक भी शब्द भरत या कैकयी के विरुद्ध नहीं कहा, बल्कि भरतजी की बड़ाई करते हुए माता को धैर्य दिया और कहा कि ‘भरत मेरे ही समान आपकी सेवा करेगा ।’ उसी समय सीताको घरपर रहने के लिये समझाते हुए कहते हैं----------

भ्रातृपुत्रसमौ चापि द्रिष्ट्व्यो च विशेषत: ।

त्वया भरतशत्रुघ्नो प्राणै: प्रियतरौ  मम: ।।

(वा०रा० २।२६।३३ )

‘सीते ! मेरे भाई भरत-शत्रुघ्न मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय है । अत: तुम्हे उनको अपने भाई और पुत्रके समान या उससे भी बढ़कर प्रिय समझना चाहिये ।’
  वन गमन का समाचार सुनकर लक्ष्मण के मनमें भारी दुःख और क्रोध हुआ । उसे भी श्रीराम ने नीति और धर्म से परिपूर्ण बहुत ही मधुर और कोमल वचनों से शान्त किया । फिर जब लक्ष्मण ने साथ चलने के लिये प्रार्थना  की, उस समय उनको वहीँ रहने के लिये समझाते हुए श्रीराम ने कहा है----लक्षमण ! तुम मेरे स्नेही, धर्मपरायण, धीर और सदा सन्मार्ग मे स्थित रहने वाले हो । मुझे प्राणों के समान प्रिय, मेरे वश मे रहने वाले, आज्ञापालक और सखा हो ।

  बहुत समझाने पर भी जब लक्ष्मण ने अपना प्रेमाग्रह नहीं छोड़ा, तब भगवान् ने उनको संतुष्ट करने के लिये अपने साथ ले जाना स्वीकार किया । वन में रहते समय भी  श्रीरामचन्द्रजी  सब प्रकार से लक्ष्मण और सीता को सुख पहुँचाने तथा प्रसन्न रखने की चेष्टा किया करते थे ।

 भरत के सेना सहित चित्रकूट आने का समाचार पाकर जब श्रीराम-प्रेम के कारण लक्ष्मण क्षुब्ध होकर भरत के प्रति न कहने योग्य शब्द कह बैठे, तब श्रीराम ने भरत की प्रशंसा करते हुए कहा-    “लक्ष्मण ! मैं सच्चाई से अपने आयुध की शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं धर्म,अर्थ,काम, और साडी पृथ्वी-सब कुछ तुम्ही लोगों के लिये चाहता हूँ । लक्ष्मण ! मैं राज्य को भी भाईयों कि भोग्य सामग्री ओर उनके सुख के लिये ही चाहता हूँ । तथा मेरे विनयी भाई ! भरत, तुम और शत्रुघ्न को छोड़कर यदि मुझे कोई भी सुख होता हो तो उसमें आग लग जाये । मैं समझता हूँ कि मेरे वन मे आने की बात कानों मे पड़ते ही भरत का हृदय स्नेह सें भर गया है, शोक सें उसकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयी है, अत: वह मुझे देखने के लिये आ रहा है ।उसके आने का कोई दूसरा कारण नहीं है ।”

नारायण नारायण नारायण श्रीमन्नारायण नारायण नारायण........ 
[ पुस्तक तत्त्व-चिन्तामणि । श्रीजयदयालजी गोयन्दका,कोड ६८३,गीता प्रेस गोरखपुर ]

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम (पितृ-भक्ति)



पितृ-भक्ति

     इसी प्रकार श्रीराम की पितृ-भक्ति भी बड़ी अद्भुत थी ।रामायण पढ़नेवालों से यह बात छिपी नहीं है कि पिता का आज्ञा पालन करने के लिये श्रीराम के मन में कितना उत्साह, साहस और दृढ निश्चय था । माता कैकयी से बातचीत करते समय श्रीराम कहते हैं----

 अहं हि वचनाद् राज्ञ: पतेयमपि पावके ।
 भक्षयेयं विषं तीक्ष्ण पतेयमपि चारणवे ।।
             (वा० रा० २/१८/२८-२९)

 न ह्य्तो धर्मचरणं किन्चिद्स्ति महत्तरम्।
 यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिया ।।
  “मैं महाराज के कहने से आगमें भी कूद सकता हूँ, तीव्र विषका पान कर सकता हूँ और समुद्र में भी गिर सकता हूँ, क्योंकि जैसे पिता की सेवा और उनकी आज्ञा का पालन करना है, इससें बढ़कर संसार में दूसरा कोई धर्म नहीं है ।”
  इसी तरह के वहाँ और भी बहुत-से वचन मिलते हैं । उसके बाद माता कौसल्या से भी उन्होंने कहा है----

 नास्ति शक्ति: पितुर्वाक्यं समतिक्रमितुं मम् ।
 प्रसादये त्वां शिरसा गंतुमिच्छाम्य्हं वनम् ।।
                     (वा०रा० २/२१/३०)

 
“मैं चरणों में सिर रखकर आपसे प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करता हूँ । मुझमें पिता की वचन टालने की शक्ति नहीं है । अत: मैं वनको ही जाना चाहता हूँ ।”
    इसके सिवा लक्ष्मण, भरत, और भरत और ऋषि-मुनियों सें बात करते समय भी राम ने पितृ-भक्ति के विषय में बहुत कुछ कहा है । श्रीरामचन्द्र के बालचरित्र का संक्षेप में वर्णन करते हुए भी यह बात कही गयी है कि श्रीराम सदा अपने पिता की सेवा में लगे रहते थे ।
   ‘एकपत्नीव्रत’ श्रीरामका एकपत्नीव्रत भी बड़ा ही आदर्श था । श्रीरामने स्वप्न में भी कभी श्रीजानकीजी के सिवा दूसरी स्त्री का वरण नहीं किया । सीता को वनवास देने के बाद यज्ञ में स्त्री की आवश्यकता होनेपर भी उन्होंने सीताकी ही स्वर्णमयी मूर्ति से काम चलाया । यदि वे चाहते तो कम-से-कम उस समय तो दूसरा विवाह कर ही सकते थे । उससे संसार में भी उनकी कोई अपकीर्ति नहीं होती, परन्तु भगवान् तो मर्यादापुरुषोत्तम ठहरे । उनको तो यह बात चरितार्थ करके दिखानी थी कि जिस प्रकार स्त्री के लिये पतिव्रत्यका विधान है, उसी तरह पुरुषका सम्बन्ध भोग भोगनेके लिये नहीं, अपितु धर्माचरण के लिये है ।
      भगवान् श्रीराम सीताके साथ प्रेम था, इसका कुछ दिग्दर्शन सीता-हरण के बाद का प्रसंग पढ़ने से हो सकता है । श्रीराम परमवीर, धीर और सहिष्णु होते हुए भी उस समय एक साधारण विरहोन्मत पागल कि भाँती पशु-पक्षी, वृक्ष-लता और पर्वतों से सीता का पता पूछते और नाना प्रकार के विलाप करते हुए एक वनसे दुसरे वनमें भटकते फिरते है एवं “हा सीते ! हा सीते !!” पुकार उठाते हैं । उस समय वर्णन बड़ा ही करुणापूर्ण और हृदयविदारक है ।

नारायण नारायण नारायण श्रीमन्नारायण नारायण नारायण........ 
[ पुस्तक तत्त्व-चिन्तामणि । श्रीजयदयालजी गोयन्दका,कोड ६८३,गीता प्रेस गोरखपुर ]


गुरुवार, 16 अगस्त 2012

मर्यादा-पुरुषोत्तम श्रीराम की मातृभक्ति



मर्यादा-पुरुषोत्तम श्रीराम
         श्रीराम की मातृभक्ति बड़ी ही आदर्श थी ! उसका ठीक-ठीक वर्णन करना असम्भव है, अत: यहाँ संकेत मात्र ही लिखा जाता है----
माता कौसल्या तथा अन्य माताओं की तो बात ही क्या है,माता कैकयी के द्वारा कठोर-से-कठोर व्यवहार किये जाने पर भी उसके प्रति श्रीराम का व्यवहार तो सदा भक्ति और सम्मान से पूर्ण ही रहा ! माता कौसल्या के महल से लौटते समय कुपित हुए भाई लक्ष्मण से उन्होंने स्वयं कहा है---
यस्या     मदभिषेकार्थे    मानस   परितप्यते !
माता न: सा यथा न स्यात सविशंका तथा कुरु !!
तस्या:  शंकामयं  दू:खं    मुहूर्तमपि   नोत्सहे !
मनसि   प्रतिसंजातं       सौमित्रेऽहमुपेक्षितुम् !!
न   बुद्धिपूर्वं   नाबुद्धं   स्मरामिह    कदाचन !
मातृणां  वा पितुर्वाहं  कृत्मल्पं  च  विप्रियम्  !!
                     (वा० रा० २/२२/६—८)
        `लक्ष्मण ! मेरे राज्याभिषेक के कारन जिसके चित्तमें संताप हो रहा है, उस हमारी माता कैकयी को जिससे मेरे ऊपर किसी तरह का सन्देह न हो, वही काम करो ! उसके मन में सन्देह के कारण उत्पन्न हुए दू:ख की मैं एक मुहूर्त के लिये भी उपेक्षा नहीं कर सकता ! मैंने कभी जान-बुझकर या अनजान में माताओं या पिताजी का कभी थोड़ा भी अप्रिय कार्य किया हो---ऐसा याद नहीं पड़ता !`
          इसके सिवा और भी बहुत-से उदाहरण श्रीरामकी मातृभक्ति के मिलते हैं ! चित्रकूट से लौटते समय भरतसे भी राम ने कहा कि `भाई भरत ! माता कैकयी ने तुम्हारे लिये कामना से या राज्य लोभसे यह जो कुछ किया है, उसको मन में न लाना ! उनके साथ सदा वैसा ही बर्ताव करना, जैसा अपनी पूजनीया माता के साथ करना चाहिये !` उसी समय शत्रुघ्न से भी कहा-----भाई ! मैं तुम्हे अपनी और सीताकी शपथ दिलाकर कहता हूँ कि तुम कभी माता कैकेयी पर क्रोध न करना, सदा उनकी सेवा ही करते रहना ! वनमें रहते समय एक बार लक्ष्मण ने कैकेयी कि निन्दा की, उस पर आपने यही कहा---`भाई ! माता कैकेयी की तुमको निन्दा नहीं चाहिये !`--इत्यादि ! इससे यह पता चलता है कि श्रीरामकी अपनी अन्य माताओंके प्रति कैसी श्रद्धा और भक्ति रही होगी ! राजा दशरथ की अन्य रानियों ने उनके वन जाते समय विलाप करते हुए कहा था-----
कृत्येषचोदितः  पित्रा  सर्वस्यान्त:पुरस्य  च !
गतिश्र्च शरणं चासीत् स रामोऽध प्रव्त्स्यति !!
कौसल्यायां यथा युक्तो जनन्यां वर्तते  सदा !
तथैव  वर्ततेऽस्मासु   जन्मप्रभृति   राघव: !!
                      (वा०रा० २/२०/२-३)
   `जो राम किसी काम काज के विषय में पिता के कुछ न कहने पर भी सरे अंत:पुर की गति और आश्रय थे, वे ही आज वनमें जा रहे हैं ! वे जन्म से ही जैसी सावधानी से पाने माता कौसल्या के साथ बर्ताव करते थे, उसी प्रकार हम सबके साथ भी करते थे !`
  इससें बढ़कर श्रीराम की मातृभक्ति का प्रमाण और क्या होगा !



नारायण नारायण नारायण श्रीमन्नारायण नारायण नारायण........
[ पुस्तक तत्त्व-चिन्तामणि ! श्रीजयदयालजी गोयन्दका,कोड ६८३,गीता प्रेस गोरखपुर ]