※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।
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शनिवार, 26 जनवरी 2013

प्रत्यक्ष भगवद्दर्शन के उपाय-5

                                           || श्री हरि||
आज की शुभ तिथि – पंचांग
पौष शुक्ल,चतुर्दशी,शनिवार, वि० स० २०६९


मान-प्रतिष्ठा को त्यागकर श्रीअक्रूरजी की तरह भगवान् के चरण-कमलों से चिह्नित रजमें लोटनेसे भगवान् प्रत्यक्ष मिल सकते हैं |

पदानि तस्याखिललोकपालकिरीटजुष्टामलपादरेणोः |
ददर्श गोष्ठे क्षितिकौतुकनि विलक्षितान्यब्जयवाङ्कुशाद्यैः ||
तद्दर्शनाह्लादविवृद्धसम्भ्रमः प्रेम्णोर्ध्वरोमाश्रुकलाकुलेक्षणः |
रथादवस्कन्द्य स तेष्वचेष्टत प्रभोरमून्यङ्घ्रिरजांस्यहो इति ||
देहंभृतामियानर्थ हित्वा दम्भं भियं शुचम् |
                        संदेशाद्यो    हरेर्लिङ्गदर्शनश्रवणादिभिः || 
                                     ( श्रीमद्भा० १० | ३८ | २५-२७ )
    जिनके चरणों की परम पावन रज को सम्पूर्ण लोकपालजन आदरपूर्वक मस्तक पर चढ़ाते हैं ऐसे पृथ्वी के आभूषण रूप पद्म, यव, अंकुशादि अपूर्व रेखाओं से अंकित श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों को गोकुल में प्रवेश करते समय अक्रूर जी ने देखा |
    उनको देखते ही आह्लाद से व्याकुलता बढ़ गयी, प्रेमसे शरीर में रोमांच हो आये, नेत्रों से अश्रुपात होने लगे | अहो ! यह प्रभु के चरणों की धूलि है, ऐसे कहते हुए रथ से उतरकर अक्रूरजी वहाँ लोटने लगे |
    देहधारियों का यही एक प्रयोजन है कि गुरु के उपदेशानुसार निर्दम्भ, निर्भय और विगतशोक होकर भगवान् की मनोमोहिनी मूर्ति का दर्शन और उनके गुणों का श्रवणादि करके अक्रूर की भांति हरि की भक्ति करें |
    गोपियों के प्रेम को देखकर ज्ञान और योग के अभिमान को त्यागनेवाले उद्धव की तरह प्रेम में विह्वल होनेपर भगवान् प्रत्यक्ष मिल सकते हैं |
    एक पलको प्रलय के समान बितानेवाली रुक्मिणी के सदृश श्रीकृष्ण से मिलने के लिए हार्दिक विलाप करने से भगवान् प्रत्यक्ष दर्शन दे सकते हैं |
    महात्माओं की आज्ञा में तत्पर हुए राजा मयूरध्वज की तरह मौका पड़नेपर अपने पुत्र का मस्तक चीरने में भी नहीं हिचकनेवाले प्रेमी भक्त को भगवान् प्रत्यक्ष दर्शन दे सकते हैं |
    ‘बी० ए०’, ‘एम्० ए०’, ‘आचार्य’ आदि परीक्षाओं की जगह भक्त प्रह्लाद की तरह नवधा भक्ति की* सच्ची परीक्षा देने से भगवान् प्रत्यक्ष दर्शन दे सकती हैं |
    भगवान् केवल दर्शन ही नहीं देते वरं द्रौपदी, गजेन्द्र, शबरी, विदुरादि की तरह प्रेमपूर्वक अर्पण की हुई वस्तुओं को वे स्वयं प्रकट होकर खा सकते हैं |
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति |
              तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः || (गीता ९ | २६ )
पत्र, पुष्प, फल, जल इत्यादि जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से अर्पण करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुणरूप से प्रकट होकर प्रीतिसहित खाता हूँ | अतएव सबको चाहिए कि परम प्रेम और उत्कंठा के साथ भगवद्दर्शन के लिए व्याकुल हों |



जयदयाल गोयन्दका सेठजी , तत्त्वचिन्तामणि पुस्तक , गीताप्रेस गोरखपुर
नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!
 

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

प्रत्यक्ष भगवद्दर्शन के उपाय-4



|| श्री हरि||
आज की शुभ तिथि – पंचांग
पौष शुक्ल,चतुर्दशी,शुक्रवार, वि० स० २०६९
 
कुमार भरत की तरह राम-दर्शन के लिए प्रेम में विह्वल होनेसे भगवान् प्रत्यक्ष मिल सकते हैं | चौदह साल की अवधि पूरी होने के समय प्रेममूर्ति भरतजी की कैसी विलक्षण दशा थी, इसका वर्णन श्रीतुलसीदासजी ने बहुत अच्छा किया है—
रहेउ एक दिन अवधि अधारा | समुझत मन दुख भयउ अपारा ||
कारन कवन नाथ नहिं आयउ | जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ ||
अहह धन्य लछिमन बड़भागी | राम पदारबिंदु अनुरागी ||
कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा | ताते नाथ संग नहिं लीन्हा ||
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी | नहिं निस्तार कलप सत कोरी ||
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ | दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ ||
मोरे जियँ भरोस दृढ़ सोई | मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई ||
बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना | अधम कवन जग मोहि समाना ||
राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत |
बिप्र रूप धरि पवन सुत आइ गयउ जणू पोत ||
बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात |
राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलपात ||
    हनुमान के साथ वार्तालाप होनेके अनन्तर श्रीरामचंद्रजी से भरत-मिलाप होनेके समय का वर्णन इस प्रकार है | शिव जी महाराज देवी पार्वती से कहते हैं—
राजीव लोचन स्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी |
अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी ||
प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही |
जनु प्रेम अरु सिंगार तनु सिंगार तनु धरि मिले बार सुषमा लही ||
बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई |
सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई ||
अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो |
बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो ||

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

प्रत्यक्ष भगवद्दर्शन के उपाय-3

|| श्री हरि||
आज की शुभ तिथि – पंचांग
पौष शुक्ल,त्रयोदशी,वीरवार,वि० स० २०६९
 
आनन्दमय भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन होने के लिए सर्वोत्तम उपाय ‘सच्चा प्रेम’ है | वह प्रेम किस प्रकार होना चाहिए और कैसे प्रेमसे भगवान् प्रकट होकर प्रत्यक्ष दर्शन दे सकते हैं ? इस विषय में आपकी सेवा में कुछ निवेदन किया जाता है |

    अनेक विघ्न उपस्थित होनेपर भी ध्रुव की तरह भगवान् के ध्यान में अचल रहनेसे भगवान् प्रत्यक्ष दर्शन दे सकते हैं |
    भक्त प्रह्लाद की तरह राम-नामपर आनन्दपूर्वक सब प्रकार के कष्ट सहन करने के लिए एवं तीक्ष्ण तलवार की धार से मस्तक कटाने के लिए सर्वदा प्रस्तुत रहने से भगवान् प्रत्यक्ष दर्शन दे सकते हैं |
    श्रीलक्ष्मण की तरह कामिनी-कांचन को त्यागकर भगवान् के लिए वन-गमन करने से भगवान् प्रत्यक्ष मिल सकते हैं |
ऋषिकुमार सुतीक्ष्ण की तरह प्रेमोंमत्त होकर विचरने से भगवान् मिल सकते हैं |
    श्रीराम के शुभागमन के समाचार से सुतीक्ष्ण की कैसी विलक्षण स्थिति होती है इसका वर्णन श्रीतुलसीदासजी ने बड़े ही प्रभावशाली शब्दों में किया है | भगवान् शिव जी उमा से कहते हैं—
होइहैं सुफल आजु मम लोचन | देखि बदन पंकज भव मोचन ||
निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी | कहि न जाइ सो दसा भवानी ||
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहीं सूझा | को मैं चलेउं कहाँ नहिं बूझा ||
कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई | कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई ||
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई | प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई ||
अतिशय प्रीति देखि रघुबीरा | प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा ||
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा | पुलक सरीर पनस फल जैसा ||
तब रघुनाथ निकट चलि आए | देखि दसा निज जन मन भाए ||
राम सुसाहेब संत प्रिय सेवक दुख दारिद दवन |
मुनि सन प्रभु कह आइ उठु-उठु द्विज मम प्रान सम ||
    श्रीहनुमानजी की तरह प्रेम में विह्वल होकर अति श्रद्धा से भगवान् की शरण ग्रहण करने से भगवान् प्रत्यक्ष मिल सकते हैं |

बुधवार, 23 जनवरी 2013

भगवान् के दर्शन प्रत्यक्ष हो सकते हैं -2-

                                                  || श्री हरि||
आज की शुभ तिथि – पंचांग
पौष शुक्ल,द्वादशी,बुधवार, वि० स० २०६९
 
(२)        भगवान् के मिलने के बहुत-से उपायों में से सर्वोत्तम उपाय है ‘सच्चा प्रेम’ | उसी को शास्त्रकारों ने अव्यभिचारिणी भक्ति, भगवान् में अनुरक्ति, प्रेमा भक्ति और विशुद्ध भक्ति आदि नामों से कहा है |
जब सत्संग, भजन, चिंतन, निर्मलता, वैराग्य, उपरति, उत्कट इच्छा और परमेश्वरविषयक व्याकुलता क्रम से होती है तब भगवान् में सच्चा विशुद्ध प्रेम होता है |
    शोक तो इस बात का है कि बहुत-से भाइयों को तो भगवान् के अस्तित्व में विश्वास नहीं है | कितने भाइयों को यदि विश्वास है तो भी, तो वे क्षणभंगुर नाशवान विषयों के मिथ्या सुखमें लिप्त रहने के कारण उस प्राणप्यारे के मिलने के प्रभाव को और महत्त्व को ही नहीं जानते | यदि कोई कुछ सुन-सुनाकर तथा कुछ विश्वास करके उसके प्रभाव को कुछ जान भी लेते हैं तो अल्प चेष्टा से ही सन्तुष्ट होकर बैठ जाते हैं या थोड़े–से साधनों में ही निराश-से हो जाया करते हैं | द्रव्य-उपार्जन के बराबर भी परिश्रम नहीं करते |
     बहुत-से भाई कहा करते हैं कि हमने बहुत चेष्टा की परन्तु प्राणप्यारे परमेश्वर के दर्शन नहीं हुए | उनसे यदि पूछा जाय कि क्या तुमने फाँसी के मामले से छूटने की तरह भी कभी संसार की जन्म-मरण-रूपी फाँसी से छुटने की चेष्टा की ? घृणास्पद, निंदनीय स्त्री के प्रेम में वशीभूत होकर उसके मिलने की चेष्टा के समान भी कभी भगवान् से मिलने की चेष्टा की ? यदि नहीं, तो फिर यह कहना कि भगवान् नहीं मिलते, सर्वथा व्यर्थ है |
    जो मनुष्य शर-शय्यापर शयन करते हुए पितामह भीष्म के सदृश भगवान् के ध्यान में मस्त होते हैं, भगवान् भी उनके ध्यान में उसी तरह मग्न हो जाते हैं | गीता अ० ४ श्लोक ११ में भी भगवान् ने कहा है—
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्थैव भजाम्यहम् |
‘हे अर्जुन ! जो मुझको जैसे भजते हैं मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ |’
 भगवान् के निरंतर नामोच्चार के प्रभाव से जब क्षण-क्षण में रोमांच होने लगते हैं, तब उसके सम्पूर्ण पापों का नाश होकर उसको भगवान् के सिवा और कोई  वस्तु अच्छी नहीं लगती | विरह-वेदना से अत्यंत व्याकुल होने के कारण नेत्रोंसे अश्रुधारा बहने लग जाती है तथा जब वह त्रैलोक्य के ऐश्वर्य को लात मारकर गोपियों की तरह पागल हुआ विचरता है और जलसे बाहर निकाली हुई मछली के सामान भगवान् के लिए तड़पने लगता है, उसी समय आनंदकंद प्यारे श्यामसुंदर की मोहिनी मूर्ति का दर्शन होता है | यही है उस भगवान् से मिलने का सच्चा उपाय |
    यदि किसी को भी भगवान् के मिलने की सच्ची इच्छा हो तो उसे चाहिए कि वह रुक्मिणी, सीता और व्रजबालाओं की तरह सच्चे प्रेमपूरित हृदय से भगवान् से मिलने के लिए विलाप करे |

(३)       यद्यपि प्रकट में तो ऐसे पुरुष कलिकाल में नहीं दिखायी देते जिनको उपर्युक्त प्रकार से भगवान् के साक्षात् दर्शन हुए हों, तथापि सर्वथा न हों यह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि प्रह्लाद आदि की तरह हजारों में से कोई कारणविशेष से ही किसी एककी लोकप्रसिद्धि हो जाया करती है, नहीं तो ऐसे लोग इस बात को विख्यात करने के लिए अपना कोई प्रयोजन ही नहीं समझते |
    यदि यह कहा जाय कि संसार-हित के लिए सबको यह जताना उचित है, सो ठीक है, परन्तु ऐसे श्रद्धालु श्रोता भी मिलने कठिन हैं तथा बिना पात्र के विश्वास होना भी कठिन है | यदि बिना पात्र के कहना आरम्भ का दिया जाय तो उसका कुछ भी मूल्य नहीं रहता और न कोई विश्वास ही करता है |
    अतः हमें विश्वास करना चाहिए कि ऐसे पुरुष संसार में अवश्य हैं, जिनको उपर्युक्त प्रकार से दर्शन हुए हैं | परन्तु उनके न मिलने में हमारी अश्रद्धा ही हेतु है और न विश्वास करने की अपेक्षा विश्वास करना ही सबके लिए लाभदायक है; क्योंकि भगवान् से सच्चा प्रेम होने में तथा दो मित्रों की तरह भगवान् की मनोमोहिनी मूर्ति के प्रत्यक्ष दर्शन मिलने में विश्वास ही मूल कारण है |

जयदयाल गोयन्दका सेठजी , तत्त्वचिन्तामणि पुस्तक , गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!
   

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

भगवान् के दर्शन प्रत्यक्ष हो सकते हैं -1-

|| श्री हरि||
आज की शुभ तिथि – पंचांग
पौष शुक्ल,एकादशी,मंगलवार, वि० स० २०६९
 
 बहुत-से सज्जन मन में शंका उत्पन्न कर इस प्रकार के प्रश्न करते हैं कि दो प्यारे मित्र जैसे आपस में मिलते हैं क्या इसी प्रकार इस कलिकाल में भी भगवान् के प्रत्यक्ष दर्शन मिल सकते हैं ? यदि सम्भव है तो ऐसा कौन-सा उपाय है कि जिससे हम उस मनोमोहिनी मूर्ति का शीघ्र ही दर्शन कर सकें ? साथ ही यह भी जानना चाहते हैं, क्या वर्तमान काल में ऐसा कोई पुरुष संसार में है जिसको उपर्युक्त प्रकार से भगवान् मिले हों ?
      
वास्तव में तो इन तीनों प्रश्नों का उत्तर वे ही महान पुरुष दे सकते हैं जिनको भगवान् की उस मनोमोहिनी मूर्ति साक्षात् दर्शन हुआ हो |
यद्यपि मैं एक साधारण व्यक्ति हूँ तथापि परमात्मा की और महान पुरुषों की दया से केवल अपने मनोविनोदार्थ तीनों प्रश्नों के सम्बन्ध में क्रमशः कुछ लिखने का साहस कर रहा हूँ |

(१)       जिस तरह सत्ययुगादि में ध्रुव, प्रह्लादादि को साक्षात् दर्शन होने के प्रमाण मिलते हैं उसी तरह कलियुग में भी सूरदास, तुलसीदासादि बहुत-से भक्तों को प्रत्यक्ष दर्शन होने का इतिहास मिलता है; बल्कि विष्णुपुराणादि में तो सत्ययुग की अपेक्षा कलियुग में भगवत-दर्शन होना बड़ा ही सुगम बताया है | श्रीमद्भागवत् में भी कहा—

          कृते यद् ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः |
          द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकिर्त्तानात् ||    (१२ | ३ | ५२)
‘सत्ययुग में निरंतर विष्णु का ध्यान करने से, त्रेता में यज्ञद्वारा यजन करने से और द्वापर में पूजा (उपासना) करने से जो परमगति की प्राप्ति होती है वही कलियुग में केवल नाम-कीर्तन से मिलती है |’
 
जैसे अरणी की लकड़ियों को मथने से अग्नि प्रज्वलित हो जाती है, उसी प्रकार सच्चे हृदय की प्रेमपूरित पुकार की रगड़ से अर्थात् उस भगवान् के प्रेममय नामोच्चारण की गम्भीर ध्वनि के प्रभावसे भगवान् भी प्रकट हो जाते हैं | महर्षि पतंजलि ने भी अपने योगदर्शन में कहा है—
               स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोग: | (२ | ४४)
‘नामोच्चार से इष्टदेव परमेश्वर के साक्षात् दर्शन होते हैं |’
जिस तरह सत्य-संकल्पवाला योगी जिस वस्तु  के लिए संकल्प करता है वही वस्तु प्रत्यक्ष प्रकट हो जाती है, उसी तरह शुद्ध अन्तःकरणवाला भगवान् का सच्चा अनन्य प्रेमी भक्त जिस समय भगवान् के प्रेममें मग्न होकर भगवान् की जिस प्रेममयी मूर्ति के दर्शन करने की इच्छा करता है उस रूप में ही भगवान् तत्काल प्रकट हो जाते हैं | गीता अ० ११ श्लोक ५४ में भगवान् ने कहा है—
  
                 भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन |
                 ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ||
‘हे श्रेष्ठ तपवाले अर्जुन ! अनन्य भक्ति करके तो इस प्रकार (चतुर्भुज) रूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिए और तत्त्वसे जानने के लिए तथा प्रवेश करने के लिए अर्थात् एकीभाव से प्राप्त होने के लिए भी शक्य हूँ |’
 
एक प्रेमी मनुष्य को यदि अपने दूसरे प्रेमी से मिलने की उत्कट इच्छा हो जाती है और यह खबर यदि दूसरे प्रेमी को मालूम हो जाती है तो वह स्वयं बिना मिले नहीं रह सकता, फिर भला यह कैसे संभव है कि जिसके समान प्रेम के रहस्य को कोई भी नहीं जानता वह प्रेममूर्ति परमेश्वर अपने प्रेमी भक्त से बिना मिले रह सके ?
अतएव सिद्ध होता है कि वह प्रेममूर्ति परमेश्वर सब काल तथा सब देश में सब मनुष्यों को भक्तिवश होकर अवश्य ही प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं |
 
....शेष अगले ब्लॉग में