※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

प्रत्यक्ष भगवद्दर्शन के उपाय-4



|| श्री हरि||
आज की शुभ तिथि – पंचांग
पौष शुक्ल,चतुर्दशी,शुक्रवार, वि० स० २०६९
 
कुमार भरत की तरह राम-दर्शन के लिए प्रेम में विह्वल होनेसे भगवान् प्रत्यक्ष मिल सकते हैं | चौदह साल की अवधि पूरी होने के समय प्रेममूर्ति भरतजी की कैसी विलक्षण दशा थी, इसका वर्णन श्रीतुलसीदासजी ने बहुत अच्छा किया है—
रहेउ एक दिन अवधि अधारा | समुझत मन दुख भयउ अपारा ||
कारन कवन नाथ नहिं आयउ | जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ ||
अहह धन्य लछिमन बड़भागी | राम पदारबिंदु अनुरागी ||
कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा | ताते नाथ संग नहिं लीन्हा ||
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी | नहिं निस्तार कलप सत कोरी ||
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ | दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ ||
मोरे जियँ भरोस दृढ़ सोई | मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई ||
बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना | अधम कवन जग मोहि समाना ||
राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत |
बिप्र रूप धरि पवन सुत आइ गयउ जणू पोत ||
बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात |
राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलपात ||
    हनुमान के साथ वार्तालाप होनेके अनन्तर श्रीरामचंद्रजी से भरत-मिलाप होनेके समय का वर्णन इस प्रकार है | शिव जी महाराज देवी पार्वती से कहते हैं—
राजीव लोचन स्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी |
अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी ||
प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही |
जनु प्रेम अरु सिंगार तनु सिंगार तनु धरि मिले बार सुषमा लही ||
बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई |
सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई ||
अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो |
बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो ||