※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

प्रत्यक्ष भगवद्दर्शन के उपाय-3

|| श्री हरि||
आज की शुभ तिथि – पंचांग
पौष शुक्ल,त्रयोदशी,वीरवार,वि० स० २०६९
 
आनन्दमय भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन होने के लिए सर्वोत्तम उपाय ‘सच्चा प्रेम’ है | वह प्रेम किस प्रकार होना चाहिए और कैसे प्रेमसे भगवान् प्रकट होकर प्रत्यक्ष दर्शन दे सकते हैं ? इस विषय में आपकी सेवा में कुछ निवेदन किया जाता है |

    अनेक विघ्न उपस्थित होनेपर भी ध्रुव की तरह भगवान् के ध्यान में अचल रहनेसे भगवान् प्रत्यक्ष दर्शन दे सकते हैं |
    भक्त प्रह्लाद की तरह राम-नामपर आनन्दपूर्वक सब प्रकार के कष्ट सहन करने के लिए एवं तीक्ष्ण तलवार की धार से मस्तक कटाने के लिए सर्वदा प्रस्तुत रहने से भगवान् प्रत्यक्ष दर्शन दे सकते हैं |
    श्रीलक्ष्मण की तरह कामिनी-कांचन को त्यागकर भगवान् के लिए वन-गमन करने से भगवान् प्रत्यक्ष मिल सकते हैं |
ऋषिकुमार सुतीक्ष्ण की तरह प्रेमोंमत्त होकर विचरने से भगवान् मिल सकते हैं |
    श्रीराम के शुभागमन के समाचार से सुतीक्ष्ण की कैसी विलक्षण स्थिति होती है इसका वर्णन श्रीतुलसीदासजी ने बड़े ही प्रभावशाली शब्दों में किया है | भगवान् शिव जी उमा से कहते हैं—
होइहैं सुफल आजु मम लोचन | देखि बदन पंकज भव मोचन ||
निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी | कहि न जाइ सो दसा भवानी ||
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहीं सूझा | को मैं चलेउं कहाँ नहिं बूझा ||
कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई | कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई ||
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई | प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई ||
अतिशय प्रीति देखि रघुबीरा | प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा ||
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा | पुलक सरीर पनस फल जैसा ||
तब रघुनाथ निकट चलि आए | देखि दसा निज जन मन भाए ||
राम सुसाहेब संत प्रिय सेवक दुख दारिद दवन |
मुनि सन प्रभु कह आइ उठु-उठु द्विज मम प्रान सम ||
    श्रीहनुमानजी की तरह प्रेम में विह्वल होकर अति श्रद्धा से भगवान् की शरण ग्रहण करने से भगवान् प्रत्यक्ष मिल सकते हैं |