गीता- जयन्ती
संत - महिमा
( गत ब्लॉग से आगे )
इसपर यह शंका होती है कि जब परमात्माकी कृपा सभिपर है, तब सभीको परमात्माकी प्राप्ति हो जानी चाहिये; परंतु ऐसा क्यों नहीं होता ? इसका उत्तर यह है कि यदि परमात्माकी प्राप्तिकी तीव्र चाह हो और भगवत्कृपामें विश्ववास हो तो सभीको प्राप्ति हो सकती है ! परंतु परमात्माकी प्राप्ति चाहते ही कितने मनुष्य हैं, तथा परमात्माकी कृपापर विश्वास ही कितनोंको है? जो चाहते हैं और जिनका विश्वास है उन्हें प्राप्ति होती ही है ! यदि यह कहा जाय कि परमात्माकी प्राप्ति तो सभी चाहते हैं, तो यह ठीक नहीं है; ऐसी चाह वास्तविक चाह नहीं है! हम देखते हैं जिसको धनकी चाह होती है, वह धनके लिये सब कुछ करने तथा इतर सबका त्याग करनेको तैयार हो जाता है, इसी प्रकारकी भागवतप्राप्तिकी तीव्र चाह कितनोंको है ? धन तो चाहनेपर भी प्रारब्धमें होता है तभी मिलता है, प्रारब्धमें नहीं होता तो नहीं मिलता ! परंतु भगवान् तो चाहनेपर अवश्य मिल जाते हैं, क्योंकि भगवान् धनकी भाँति जड़ नहीं हैं !
