※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

सोमवार, 5 दिसंबर 2011




संत-महिमा 


संतभावकी प्राप्ति भगवत्कृपासे होती है 


संसारमें संतोंका स्थान सबसे ऊंचा है ! देवता और मनुष्य, राजा और प्रजा --- सभी सच्चे संतोंको अपनेसे बढ़कर मानते हैं! संतका ही जीवन सार्थक होता है ! अतएव सभी लोगोंको संतभावकी प्रप्तिके लिये भगवान् के शरण होना चाहिये! यहाँ एक प्रश्न होता है कि 'संतभावकी प्राप्ति प्रय्त्नसे होती है या भगवत्कृपासे अथवा दोनोंसे? यदि यह कहा जाय कि वह केवल प्रयत्न-साध्य है तो सब लोग प्रयत्न करके संत क्यों नहीं बन जाते? यदि कहें कि भगवत्कृपासे होती है तो भगवत्कृपा सदा सबपर अपरिमित है ही, फिर सबको संतभावकी प्राप्ति क्यों नहीं हो जाती ? दोनोंसे कही जाय तो फिर भगवत्कृपाका महत्त्व ही क्या रह गया, क्योंकि दुसरे प्रयत्नोंके सहारे बिना केवल उससे भगवत्प्राप्ति हुई नहीं?इसका उत्तर यह है कि भगवत्प्राप्ति यानि संतभावकि प्राप्ति भगवत्कृपासे  ही होती है! वास्तवमें भगवत्प्राप्त पुरुषको ही संत कहा जाता है! 'सत' पदार्थ केवल परमात्मा है और परमात्माके यथार्थ तत्त्वको जो जानता है और उसे उपलब्द कर चूका है वही संत है ! हाँ, गौणी वृत्तिसे उन्हें भी संत कह सकते हैं जो भाग्वात्प्रप्तिके पात्र हैं, क्योंकि वे भाग्वात्प्रप्तिरूपी लक्ष्यके समीप पहुँच गये हैं और शीघ्र उन्हें भाग्वात्प्रप्तिकी सम्भावना है !