※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

रविवार, 4 दिसंबर 2011





जीवात्मा परमात्माके आश्चर्यमय सगुणरूपको ध्यानमें देखता हुआ अपने मन-ही-मनमें उनकी शोभा वर्णन करता है ! 


अहो ! कैसे सुन्दर भगवान् के चरणारविन्द हैं  कि जो नीलमणिके ढेरकी भाँति चमकते हुए अनन्त सूर्योंके समान प्रकाशित हो रहे हैं ! चमकीले नखोंसे युक्त कोमल-कोमल अंगुलियाँ जिनपर रत्नजड़ित सुवर्णके नूपुर शोभायमान हैं ! जैसे भगवान् के चरणकमल हैं वैसे ही जानु और जंघादी अंग भी नीलमणिके ढेरकी भाँति पीताम्बरके भीतरसे चमक रहे हैं ! अहो! सुन्दर चार भुजाएँ कैसी शोभायमान हैं! उपरकी दोनों भुजाओंमें तो शंख और चक्र ऐवं नीचेकी दोनों भुजाओंमें गदा और पद्म विराजमान हैं ! चारों  भुजाओंमें केयूर और कड़े आदि सुन्दर-सुन्दर आभूषण शुशोभित हैं! अहो! भगवान् का वक्षः स्थल कैसा सुन्दर है कि जिसके मध्यमें श्रीलक्ष्मीजीका और भृगुलताका चिह्न विराजमान है तथा नीलकमलके समान वर्णवाली  भगवान् की ग्रीवा भी कैसी सुन्दर है जिसमें रत्नजड़ित हार और कौस्तुभमणि विराजमान हैं एवं मोतियोंकी और वैजयन्ती तथा सुवर्णकी और भाँति-भाँतिके पुष्पोंकी मालाएँ शुशोभित हैं, सुन्दर ठोड़ी, लाल ओष्ठ और भगवान् की अतिशय सुन्दर नासिका है जिसके अग्रभागमें मोती विराजमान है ! भगवान् के दोनों नेत्र कमलपत्रके समान वीशाल और नीलकमलके पुष्पकी भाँति खिले हुए हैं ! कानोंमें रत्नजड़ित सुन्दर मकराकृत कुण्डल और ललाटपर श्रीधारी तिलक एवं शीशपर रत्नजड़ित किरीट (मुकुट ) शोभायमान है! अहो! भगवान् का मुखारविन्द पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति गोल-गोल कैसा मनोहर है ! जिसके चारों और सूर्यके समान किरणें देदीप्यमान हैं ! जिनके प्रकाशसे मुकुटादि सम्पूर्ण भूषणोंके रत्न चमक रहे हैं ! अहो! आज मैं धन्य हूँ, कि जो मन्द-मन्द हँसते हुए आनन्दमूर्ति हरि भगवान् का दर्शन कर रहा हूँ !!८!!


इस प्रकार आनन्दमें विव्हल हुआ जीवात्मा ध्यानमें अपने सम्मुख सवा हाथकि दुरीपर बारह वर्षकी सुकुमार अवस्थाके रूपमें भूमिसे सवा हाथ ऊँचे आकाशमें विराजमान परमेश्वरको देखता हुआ उनकी मानसिक पूजा करता है !