जीवात्मा ज्ञाननेत्रोंद्वारा परमेश्वरका ध्यान करता हुआ आनन्दमें कहता है --
अहो! अहो! आनन्द ! आनन्द ! प्रभो ! प्रभो ! क्या आप पधारे ? धन्य भाग्य ! धन्य भाग्य ! आज मैं पतित भी आपके चरणकमलोंके प्रभावसे कृतार्थ हुआ ! क्यों न हो, आपने स्वयं श्रीगीताजीमें कहा है कि --
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्य्भाक् !
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स: !!
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्र्वच्छान्तिं निगच्छति !
कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति !! (९/३०-३१)
यदि (कोई) अतिशय दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भक्त हुआ मेरेको ( निरन्तर) भजता है, वह साधु हि मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है !
इसलिये वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहनेवाली परम शान्तिको प्राप्त होता है, हे अर्जुन ! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता !!७!!
