※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

शनिवार, 3 दिसंबर 2011




जीवात्मा ज्ञाननेत्रोंद्वारा परमेश्वरका ध्यान करता हुआ आनन्दमें  कहता है --
अहो! अहो! आनन्द ! आनन्द ! प्रभो ! प्रभो ! क्या आप पधारे ? धन्य भाग्य ! धन्य भाग्य ! आज मैं पतित भी आपके चरणकमलोंके प्रभावसे कृतार्थ हुआ ! क्यों न हो, आपने स्वयं श्रीगीताजीमें कहा है कि --


अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्य्भाक् !
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स: !!
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्र्वच्छान्तिं निगच्छति !
कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति !! (९/३०-३१)


यदि (कोई) अतिशय दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भक्त हुआ मेरेको ( निरन्तर) भजता है, वह साधु हि मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है !


इसलिये वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहनेवाली परम शान्तिको प्राप्त होता है, हे अर्जुन ! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता !!७!!