जीवात्मा परमात्मासे कहता है--
हे प्रभो ! आप अन्तर्यामी हैं, इसलिये मैं नहीं कहता कि आप आकर दर्शन दीजिये, क्योंकि यदि मेरा पूर्ण प्रेम होता तो क्या आप ठहर सकते ? क्या वैकुन्ठमें लक्ष्मी भी आपको अटका सकतीं ?
यदि मेरी आपमें पूर्ण श्रद्धा होती तो क्या आप विलम्ब करते? क्या वह प्रेम और विश्वास आपको छोड़ सकता ? अहो! मैं व्यर्थ ही संसारमें निष्कामी और निर्वासनिक बना हुआ हूँ और व्यर्थ ही अपनेको आपके शरणागत मानता हूँ ! परन्तु कोई चिन्ता नहीं, जो कुछ आकर प्राप्त हो उसीमें मुझे प्रसन्न रहना चाहिए; क्योंकि ऐसे ही आपने श्रीगीताजीमें कहा है! इसलिये आपके चरणकमलोंकी प्रेमभक्तिमें मग्न रहते हुए यदि मेरेको नरक भी प्राप्त हो तो वह भी स्वर्ग से बढ़कर है ! ऎसी दशामें मेरेको क्या चिन्ता? जब मेरा आपमें प्रेम होगा तो क्या आपका नहीं होगा? जब मैं आपके दर्शन बिना नहीं ठहर सकूँगा, उस समय क्या आप ठहर सकेंगे ? आपने तो स्वयं श्रीगीताजीमें कहा है कि --
ये यथा मां प्रप्घन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ! (४/ ११ )
'जो मेरको जैसे भजते हैं मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ !' अतएव मैं नहीं कहता कि आप आकर दर्शन दीजिये ! और आपको भी क्या परवा है, परन्तु कोई चिन्ता नहीं, आप जैसा उचित समझें वैसा ही करें ! आप जो कुछ करें उसीमें मुझको आनन्द मानना चाहिये !!६!!
