※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011




जीवात्मा परमात्मासे कहता है--


हे प्रभो ! आप अन्तर्यामी हैं, इसलिये मैं नहीं कहता कि आप आकर दर्शन दीजिये, क्योंकि यदि मेरा पूर्ण प्रेम होता तो क्या आप ठहर सकते ? क्या वैकुन्ठमें लक्ष्मी भी आपको अटका सकतीं ?
यदि मेरी आपमें पूर्ण श्रद्धा होती तो क्या आप विलम्ब करते? क्या वह प्रेम और विश्वास आपको छोड़ सकता ? अहो! मैं व्यर्थ ही संसारमें निष्कामी और निर्वासनिक बना हुआ हूँ और व्यर्थ ही अपनेको आपके शरणागत मानता हूँ !  परन्तु कोई चिन्ता नहीं, जो कुछ आकर प्राप्त हो उसीमें मुझे प्रसन्न रहना चाहिए; क्योंकि ऐसे ही आपने श्रीगीताजीमें कहा है! इसलिये आपके चरणकमलोंकी प्रेमभक्तिमें मग्न रहते हुए यदि मेरेको नरक भी प्राप्त हो तो वह भी स्वर्ग से बढ़कर  है ! ऎसी दशामें मेरेको क्या चिन्ता? जब मेरा आपमें प्रेम होगा  तो क्या आपका नहीं होगा? जब मैं आपके दर्शन बिना नहीं ठहर सकूँगा, उस समय क्या आप ठहर सकेंगे ? आपने तो स्वयं श्रीगीताजीमें कहा है कि --


ये यथा मां प्रप्घन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् !  (४/ ११ )


'जो मेरको जैसे भजते हैं मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ !' अतएव मैं नहीं कहता कि आप आकर दर्शन दीजिये ! और आपको भी क्या परवा है, परन्तु कोई चिन्ता नहीं, आप जैसा उचित समझें वैसा ही करें ! आप जो कुछ करें उसीमें मुझको आनन्द मानना चाहिये !!६!!