जीवात्मा अपनी बुद्धि और इन्द्रियोंसे कहता है--
हे इन्द्रियो ! तुमको नमस्कार है, तुम भी जाओ, जहाँ वासना होती है वहाँ तुम्हारा टिकाव होता है !
मैंने हरिके चरणकमलोंका आश्रय लिया है, इसलिये अब तुम्हारा दाव नहीं पड़ेगा !
हे बुद्धे ! तेरेको भी नमस्कार है, पहले तेरा ज्ञान कहाँ गया था जब कि तू मेरेको संसारमें डूबनेके लिये सिक्षा दिया करती थी ! क्या वह सिक्षा अब लग सकती है? !!५!!