जीवात्मा अपने मनसे फिर कहता है --
रे मन ! सावधान ! सावधान ! किसलिए व्यर्थ प्रलाप करता है! वे श्रीसच्चिदानन्दघन हरि झूठी विनती नहीं चाहते ! अब तेरा कपट यहाँ नहीं चलेगा, तू मेरे लिये क्यों हरिसे कपटभरी प्रार्थना करता है ? ऐसी प्रार्थना मैं नहीं चाहता, तेरी जहाँ इच्छा हो वहाँ चला जा !
यदि हरि अन्तर्यामी हैं तो प्रार्थना करनेकी क्या आवश्यकता है? यदि वे प्रमी हैं तो बुलानेकी क्या आवश्यकता है ? यदि वे विश्वम्भर हैं तो माँगनेकी क्या आवश्यकता है? तेरको नमस्कार है, तू यहाँसे चला जा; चला जा !!४!!