※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

मंगलवार, 29 नवंबर 2011






मन फिर परमात्मासे प्रार्थना करता है --


प्रभो ! प्रभो ! दया करिए, हे नाथ ! मैं आपकी शरण हूँ ! हे शरणागतप्रतिपालक ! शरण आयेकी लज्जा रखिये ! हे प्रभो ! रक्षा करिये, रक्षा करिये; एक बार आकर दर्शन दीजिये ! आपके बिना इस संसारमें मेरे लिये कोई भी आधार नहीं है, अतएव आपको बारंबार नमस्कार करता हूँ, प्रणाम करता हूँ, विलम्ब न करिये, शीघ्र आकर दर्शन दीजिये ! हे प्रभो ! हे दयासिंधो !! एक बार आकर दासकी सुध लीजिये !


आपके न आनेसे प्राणोंका आधार कोई भी नहीं दीखता ! हे प्रभो ! दया करिए,दया करिए, मैं आपकी शरण हूँ, एक बार मेरी और दयादृष्टिसे देखिये ! हे प्रभि ! हे दीनबन्धो !! हे दीनदयालो !!! विशेष न तरसाइये, दया  करिये ! मेरी दुष्टताकी और न देखकर अपने पतितपावन स्वभावका प्रकाश करिये !!३!!