※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

सोमवार, 28 नवंबर 2011






जीवात्मा अपने मनसे कहता है ---


रे दुष्ट मन! कपटभरी  प्रार्थना   करनेसे क्या अन्तर्यामी भगवान्  प्रसन्न हो सकते हैं? क्या वे नहीं जानते कि ये सब तेरी प्रार्थनाएं निष्काम नहीं हैं?  एवं तेरे ह्रदयमें श्रधा, वीश्वास और प्रेम कुछ भी नहीं है? यदि तेरेको यह वीश्वास है कि भगवान् अन्तर्यामी हैं तो फिर किसलिए प्रार्थना करता है? बिना प्रेमके मिथ्या प्रार्थना करनेसे भगवान् कभी नहीं सुनते और यदि प्रेम है तो फिर कहनेसे प्रयोजन ही क्या है? क्योंकि भगवान् ने तो स्वयं ही श्रीगीताजीमें कहा है कि --


  ये यथा मां प्रप्घन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् !  (४/ ११ )


' जो मेरेको जैसे भजते हैं मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ !' तथा--


ये भजन्ति तू मां भक्त्या मयि ते तेषु  चाप्यहम् !! (९ / २९ ) 


'जो भक्त मेरेको भक्तिसे भजते हैं वे मेरेमें हैं और मैं भी उनमें ( प्रत्यक्ष प्रकट ) हूँ !*


* जैसे सूक्ष्मरूपसे सब जगह व्याप्त हुआ भी अग्नि साधानोद्वारा प्रकट करनेसे ही प्रत्यक्ष होता है वैसे ही सब जगह स्थित हुआ भी परमेश्वर भक्तिसे भजनेवालेके ही अन्तः करणमें प्रत्यक्षरूपसे प्रकट होता है !


रे मन ! हरी दयासिन्धु होकर भी दया न करें तो भी कुछ चिन्ता नहीं, अपनेको तो अपना कर्तव्यकार्य करते ही रहना चाहिए ! हरी प्रेमी  हैं, वे प्रेमको पहचानते हैं! प्रेमके विषयको प्रेमी ही जानता है, वे अन्तर्यामी भगवान् क्या तेरे शुष्क  प्रेमसे दर्शन दे सकते हैं ? जब विशुद्ध प्रेम और श्रद्धा -विश्वासरुपी डोरी तैयार हो जायगी तो उस डोरीद्वारा बंधे हुए हरी आप-हि-आप चले आवेंगे ! रे मुर्ख मन! क्या मिथ्या प्रार्थनासे  काम चल सकता है ? क्योंकि हरी अन्तर्यामी हैं ! रे मन तेरेको नमस्कार है,  तेरा काम संसारमें चक्कर लगानेका है, सो जहाँ तेरी इच्छा हो वहाँ जा ! तेरे ही संगके कारण मैं इस असार संसारमें अनेक दिन फिरता रहा, अब हरिके चरणकमलोंका आश्रय ग्रहण करनेसे तेरा सम्पूर्ण कपट जान गया, तू मेरे लिए कपटभाव  और अति दीन वचनोंसे भगवान् से  प्रार्थना करता है ! 


परन्तु तू नहीं जानता कि हरि अन्तर्यामी हैं ! श्रीयोगवशिष्टमें ठीक ही लिखा है कि मनके अमन हुए बिना अर्थात् मनका नाश हुए बिना भगवान् की प्राप्ति नहीं होती ! वासना का क्षय, मनका नाश और परमेश्वरकी प्राप्ति - यह तीनों एक ही कालमें होते हैं ! इसलिये तेरेसे विनय करता हूँ की तू यहाँसे अपने माजनेसहित चले जा, अब यह पक्षी तेरी मायारूपी फाँसीमें नहीं फँस सकता; क्योंकि इसने हरिके चरणोंका आश्रय लिया है ! क्या तू अपनी दुर्दशा कराके ही जायगा ? अहो ! कहाँ वह माया ? कहाँ काम-क्रोधादि शत्रुगन ? अब तो तेरी सम्पूर्ण सेनाका क्षय होता जाता है, इसलिये अपना प्रभाव पड़नेकी आशाको त्यागकर जहाँ इच्छा हो चला जा !!२ !!