जीवात्मा अपने मनसे कहता है ---
रे दुष्ट मन! कपटभरी प्रार्थना करनेसे क्या अन्तर्यामी भगवान् प्रसन्न हो सकते हैं? क्या वे नहीं जानते कि ये सब तेरी प्रार्थनाएं निष्काम नहीं हैं? एवं तेरे ह्रदयमें श्रधा, वीश्वास और प्रेम कुछ भी नहीं है? यदि तेरेको यह वीश्वास है कि भगवान् अन्तर्यामी हैं तो फिर किसलिए प्रार्थना करता है? बिना प्रेमके मिथ्या प्रार्थना करनेसे भगवान् कभी नहीं सुनते और यदि प्रेम है तो फिर कहनेसे प्रयोजन ही क्या है? क्योंकि भगवान् ने तो स्वयं ही श्रीगीताजीमें कहा है कि --
ये यथा मां प्रप्घन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ! (४/ ११ )
' जो मेरेको जैसे भजते हैं मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ !' तथा--
ये भजन्ति तू मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् !! (९ / २९ )
'जो भक्त मेरेको भक्तिसे भजते हैं वे मेरेमें हैं और मैं भी उनमें ( प्रत्यक्ष प्रकट ) हूँ !*
* जैसे सूक्ष्मरूपसे सब जगह व्याप्त हुआ भी अग्नि साधानोद्वारा प्रकट करनेसे ही प्रत्यक्ष होता है वैसे ही सब जगह स्थित हुआ भी परमेश्वर भक्तिसे भजनेवालेके ही अन्तः करणमें प्रत्यक्षरूपसे प्रकट होता है !
परन्तु तू नहीं जानता कि हरि अन्तर्यामी हैं ! श्रीयोगवशिष्टमें ठीक ही लिखा है कि मनके अमन हुए बिना अर्थात् मनका नाश हुए बिना भगवान् की प्राप्ति नहीं होती ! वासना का क्षय, मनका नाश और परमेश्वरकी प्राप्ति - यह तीनों एक ही कालमें होते हैं ! इसलिये तेरेसे विनय करता हूँ की तू यहाँसे अपने माजनेसहित चले जा, अब यह पक्षी तेरी मायारूपी फाँसीमें नहीं फँस सकता; क्योंकि इसने हरिके चरणोंका आश्रय लिया है ! क्या तू अपनी दुर्दशा कराके ही जायगा ? अहो ! कहाँ वह माया ? कहाँ काम-क्रोधादि शत्रुगन ? अब तो तेरी सम्पूर्ण सेनाका क्षय होता जाता है, इसलिये अपना प्रभाव पड़नेकी आशाको त्यागकर जहाँ इच्छा हो चला जा !!२ !!
