※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

शनिवार, 26 नवंबर 2011

* ईश्वर दयालु और न्यायकारी है । *




॥ श्रीहरिः ॥

* ईश्वर दयालु और न्यायकारी है । *

ईश्वरका कानून दया, सुहृदता और जीवोँके हितसे पूर्ण होता है। हमलोग तो उसकी कल्पनातक भी नहीँ कर सकते ।

ईश्वरका दण्ड भी वरके सदृश होता है । ईश्वरके न्यायसे फरियादी और असामी दोनोँका ही परिणाममेँ हित और उद्धार होता है, यही उसकी विशेषता है । परम दयालु परमात्माके कानूनके अनुसार जो अपराधी अपनी भूलको सच्चे दिलसे स्वीकार करता हुआ भविष्यमेँ फिर अपराध न करनेकी प्रतिज्ञा करता है और सच्चे हृदयसे ईश्वरकी शरण होकर सर्वस्वसहित अपनेको उसके चरणोँमेँ अर्पण कर देता है एवं ईश्वरकी कड़ी-से-कड़ी आज्ञाको, उसके भयानक-से-भयानक विधानको, उसके प्रत्येक न्यायको सानन्द स्वीकार करता है तथा उसे पुरस्कार समझता है, साथ ही अपने किये हुए अपराधोँके लिए क्षमा नहीँ चाहकर दण्ड ग्रहण करनेमेँ खुश होता है, ऐसे सरलभावसे सर्वस्व अर्पण करनेवाले शरणागत भक्तको भगवान अपराधोँसे मुक्त करके उसे अभय कर देते हैँ । इसमेँ दयालु ईश्वरका न्याय ही सिद्ध होता है । ऐसे भाववाले भक्तको दण्डसे मुक्त करना ही परमात्माके राज्यका दया और न्यायपूर्ण नियम है । इसीसे भगवानमेँ दया और न्याय-दोनोँ एक ही साथ रहते हैँ । श्रीगीताजीमेँ भगवान स्पष्ट कहते हैँ-
अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिँ निगच्छति ।
कौन्येय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ (९। ३०-३१, १८ । ६६)
'यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भक्त हुआ मुझको निरंतर भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है; क्योँकि वह यथार्थ निश्चयवाला है । उसने भलीभाँति निश्चय कर लिया है कि परमेश्वरके भजनके समान अन्य कुछ भी नहीँ है । अतएव वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहनेवाली परम शांतिको प्राप्त होता है । हे अर्जुन ! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त (कदापि) नष्ट नहीँ होता । इसलिए सब कर्मोँके आश्रयको त्यागकर केवल एक मुझ सच्चिदानंदघन वासुदेव परमात्माकी ही अनन्य शरणको प्राप्त हो, मैँ तुझे समस्त पापोँसे मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर ।'