संत-महिमा
गत ब्लॉग से आगे ....
जड़ धन हमारी चाहके बदलेमें वैसी चाह नहीं कर सकता, परन्तु भगवान् तो, जो उनको चाहता है, उसको स्वयं चाहते हैं, और यह निश्चित सत्य है कि भगवान् कि चाह कभी निष्फल नहीं होती, वह अमोघ होती है! अतएव भगवान् की चाहसे बिना ही प्रयत्न किये भक्तिकी चाह अपने-आप पूर्ण हो जाती है! पर इतना स्मरण रखना चाहिये कि भक्तके चाहनेपर ही भगवान् उसे चाहते हैं ! यदि यह कहें कि भक्तके बिना चाहे भगवान् क्यों नहीं चाहते ? तो इसका उत्तर यह है कि भगवान् में वस्तुतः 'चाह' है ही नहीं, भक्तकि चाह्से ही उनमें चाह पैदा होती है! इसपर यह शंका है कि जब भक्तकी चाह्से भगवान् में चाह होकर भगवान् मिलते हैं तब केवल भाग्व्त्कृपाकी प्रधानता कहाँ रही? चाह भी तो एक प्रयत्न ही है ? इसपर उत्तर यह है कि भगवान् को प्राप्त करनेकी इच्छामात्रको प्रयत्न नहीं कहा जा सकता और यदि इसीको प्रयत्न मानें तो इतना प्रयत्न तो अवश्य ही करना पड़ता है ! परंतु ध्यान देकर देखनेसे मालूम होगा कि इच्छा करनेमात्रसे प्राप्त होनेवाले एक श्रीभगवान् ही हैं! दुनियामें लोग नाना प्रकारके पदार्थोंकी इच्छा करते हैं; परंतु इच्छा करनेसे ही उन्हें कुछ नहीं मिलता ! इच्छा हो, प्रारब्धका संयोग हो और फिर प्रयत्न हो तब भौतिक पदार्थ मिलता है! पर भगवान् के लिये तो इच्छा-मात्रसे ही काम हो जाता है ! इच्छा करनेपर जो प्रयत्न होता है वह प्रयत्न तो भगवान् स्वयं करा लेते हैं! साधक तो केवल निमित्तमात्र बनता है !
