संत-महिमा
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अर्जुनसे भगवान् ने कहा --' ये सब मेरे द्वारा मारे हुए हैं तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा ! ' (गीता ११/३३) इसी प्रकार अपनी प्राप्तिरूप कार्यकी सिद्धिमें भी सब कुछ भगवान् ही कर लेते हैं ! इच्छा करनेवाले भक्तको केवल निमित्तमात्र बनाते हैं ! जो लोग भाग्वत्प्राप्तिको केवल अपने पुरुषार्थसे सिद्ध होनेवाली मानते हैं, उनको भगवान् प्रत्यक्ष दर्शन नहीं देते! हाँ, उन्हें बड़ी कठिनाईसे ज्ञानकी प्राप्ति हो सकती है, परंतू उसमे भी गुरुकी शरण ग्रहण तो करनी ही पड़ती है ! भगवान् स्वयं कहते हैं---
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया !
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानीनस्तत्त्वदर्शिनः !! (गीता ४/३४)
'उस ज्ञानको तू समझ; क्षोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ आचार्यके पास जाकर उनको भलीभाँति दण्डवत्-प्रणाम करनेसे, उनकी सेवा करनेसे और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे परमात्मतत्त्वको भलीभाँति जाननेवाले वे ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञानका उपदेश करेंगे !'
