※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011




संत-महिमा 


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अर्जुनसे भगवान् ने कहा --' ये सब मेरे द्वारा मारे हुए हैं तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा ! ' (गीता ११/३३) इसी प्रकार अपनी प्राप्तिरूप कार्यकी सिद्धिमें भी सब  कुछ भगवान्  ही कर लेते हैं ! इच्छा करनेवाले भक्तको केवल निमित्तमात्र बनाते हैं ! जो लोग भाग्वत्प्राप्तिको केवल अपने पुरुषार्थसे सिद्ध होनेवाली मानते हैं, उनको भगवान् प्रत्यक्ष  दर्शन नहीं देते! हाँ, उन्हें बड़ी कठिनाईसे  ज्ञानकी प्राप्ति हो सकती है, परंतू उसमे  भी गुरुकी शरण ग्रहण तो करनी ही पड़ती है ! भगवान् स्वयं कहते हैं--- 


तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया !
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानीनस्तत्त्वदर्शिनः !! (गीता ४/३४)


'उस ज्ञानको तू समझ; क्षोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ आचार्यके पास जाकर उनको भलीभाँति दण्डवत्-प्रणाम  करनेसे, उनकी सेवा करनेसे और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे परमात्मतत्त्वको भलीभाँति जाननेवाले वे ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञानका उपदेश करेंगे !'