संत-महिमा
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श्रुति कहती है --
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत !
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया
दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति !! (कठ १/३/१४)
'उठो, जागो और महान् पुरुषोंके समीप जाकर ज्ञान प्राप्त करो! जिस प्रकार छुरेकी धार तीक्ष्ण और दुस्तर होती है, तत्त्वज्ञानी लोग उस पथको भी वैसा ही दुर्गम बतलाते हैं! '
भगवत्प्राप्तिमें केवल अपना पुरषार्थ माननेका कारण -- अहंकाररुपी दोष है! भक्तके इस अहंकार-दोषको नष्ट करनेके लिये भगवान् उसे भीषण संकटमें डालकर यह बात प्रत्येक्ष दिखला देते हैं कि कर्यसिद्धिमें अपनी सामर्थ्य मानना मनुष्यकि एक बड़ी गलती है ! इस प्रकार अहंकारनाशके लिये जो विपत्तिमें डालना है, यह भी भगवान् की विशेष कृपा है ! केनोपनिषद् में एक कथा है-- इन्द्र, अग्नि, वायु देवोंने विजयमें अपने पुरषार्थको कारण समझा, इसलिये उन्हें गर्व हो गया! तब भगवान् ने उनपर कृपा करके यक्षके रूपमें अपना परिचय दिया और उनके गर्वका नाश किया ! जब अग्नि, वायु देवता परास्त हो गये और यह समझ गये कि हमारे अन्दर वस्तुतः कुछ भी सामर्थ्य नहीं है, तब भगवान् ने विशेष दया करके उमाके द्वारा इन्द्रको अपना यथार्थ परिचय दिया ! सफलतामें अपना पुरषार्थ मानकर मनुष्य गर्व करता है, परन्तु अनिवार्य विपत्तिमें जब वह अपने पुरुषार्थसे निराश हो जाता है तब निरूपाय होकर भगवान् के शरण जाता है और आर्त होकर पुकार उठता है -- ' नाथ ! मुझे इस घोर संकटसे बचाइये ! मैं सर्वथा असमर्थ हूँ ! मैं जो अपने बलसे अपना उद्धार मानता था, वह मेरी भारी भूल थी! राग-द्वेष और काम-क्रोधादि शत्रुओंके दबानेसे अब मुझे इस बातका पूरा पता लग गया कि आपकी कृपाके बिना मेरे लिये इनसे छुटकारा पाना कठिन ही नहीं, वरं असम्भव-सा है ! जब अहंकारको छोड़कर इस तरह सरल भावसे और सच्चे हृदयसे मनुष्य भगवान् के शरण हो जाता है तब भगवान् उसे अपना लेते हैं और आश्वासन देते हैं, क्योंकि भगवान् की यह घोषणा है --
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते !
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्वतं मम !! (वा रा ६/१८/३३ )
