※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

शनिवार, 10 दिसंबर 2011




संत महिमा 


सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते !
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्वतं मम !! (वा रा ६/१८/३३ )


'जो एक बार भी मेरे शरण होकर कहता है, मैं तुम्हारा हूँ, (तुम मुझे अपना लो ) मैं उसे सब भुतोंसे अभय कर देता हूँ, यह मेरा व्रत है!' इसपर भी मनुष्य उनके शरण होकर अपना कल्याण नहीं करता, यह बड़े आश्चर्य-की बात है !


दयासागर भगवान् की जीवोंपर इतनी अपार दया है कि जिसकी कोई सीमा नहीं ! वस्तुतः उन्हें दयासागर कहना भी उनकी स्तुतिके व्याजसे निन्दा ही करना है ! क्योंकि सागर तो सिमावाला है, परन्तु भगवान् कि दयाकी तो कोई सीमा ही नहीं है! अच्छे-अच्छे पुरुष भी भगवान् की दयाकी जितनी कल्पना करते हैं,वह उससे भी बहुत ही बढ़कर है! उसकी कोई कल्पना ही नहीं की जा सकती ! कोई ऐसा उदहारण नहीं जिसके द्वारा भगवान् की दयाका स्वरूप समझाया जा सके! माताका उदहारण दें तो वह भी उपयुक्त नहीं है! कारण, दुनियांमें असंख्य जीव हैं और उन सबकी उत्पत्ति माताओंसे ही होती है, उन साड़ी मातओंके हृदयमें अपने पुत्रोंपर जो दया या स्नेह है, वह सब मिलकर भी उन दयासागरकी दयाके एक बूँदके बराबर भी नहीं है ! ऐसी हालतमें और किससे तुलना की जाय? तो भी माताका उदहारण इसलिये दिया जाता है कि लोकमें जितने उदहारण हैं, उन सबमें इसकी विशेषता है ! ....