संत -महिमा
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माता अपने बच्चेके लिये जो कुछ भी करती है, उसकी प्रत्येक क्रियामें दया भरी रहती है! इस बात का बच्चे को भी कुछ -कुछ अनुभव रहता है! जब बच्चा शरारत करता है तो उसके दोषनिवारणार्थ माँ उसे धमकाती-मारती है और उसको अकेला छोड़कर कुछ दूर हट जाती है! ऐसी अवस्थामें भी बच्चा माताके ही पास जाना चाहता है! दुसरे लोग उससे पूछते हैं-' तुम्हें किसने मारा? ' वह रोता हुआ कहता है-- माँने !' इसपर वे कहते हैं - 'तो आइन्दा उसके पास नहीं जाना !' परंतु वह उनकी बातपर ध्यान न देकर रोता है और माता के पास ही जाना चाहता है! उसे भय दिखलाया जाता है कि 'माँ तुझे फिर मारेगी!' पर इस बातका उसपर कोई असर नहीं होता, वह किसी भी बातकी परवा न करके अपने सरल भावसे माताके ही पास जाना चाहता है! रोता है, परंतु चाहता है माताको ही! जब माता उसे ह्रदयसे लगाकर उसके आँसू पोंछती है, आश्वासन देती है, तभी वह शान्त होता है ! इस प्रकार माताकी दयापर विश्वास करनेवाले बच्चेकी भाँति जो भगवान् के दया- तत्त्वको जान लेता है और भगवान् की मारपर भी भगवान् को ही पुकारता है, भगवान् उसे अपने हृदयसे लगा लेते हैं ! फिर जो भगवान् की कृपाको विशेषरूपसे जान लेता है, उसकी तो बात ही क्या है?
