※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

सोमवार, 12 दिसंबर 2011




संत-महिमा


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लड़का निचेके तल्लेसे उपरके तल्लेपर जब चढ़ना चाहता है तो माता उसे सीढियोंके पास ले जाकर चड़नेके लिये उत्साहित करती है! कहती है ---'बेटा ! चढ़ो, गिरोगे नहीं, मैं साथ हूँ न? लो, मैं हाथ पकडती हूँ!' यों साहस और आश्वासन देकर उसे एक-एक सीढ़ी चढ़ाती है, पूरा ख़याल रखती है, कहीं गिर न जाय; जरा-सा भी डिगता है तो तुरंत हाथका सहारा देकर थाम लेती और चढ़ा देती है; बच्चा जब चढ़नेमें कठिनाईका अनुभव करता है तब माँकी और ताककर मानो इशारेसे माँकी मदद चाहता है ! माँ उसू क्षण उसे अवलम्बन देकर चढ़ा देती है और पुनः उत्साह दिलाती है! बच्चा कहीं फिसल जाता है तो माँ तुरंत उसे गोदमें उठा लेती है, गिरने नहीं देती ! इसी प्रकार जो पुरुष बच्चेकी भाँति भगवान् पर भरोसा (निर्भर ) करता है, भगवान् उसकी उन्नति और रक्षाकी व्यवस्था स्वयं करते हैं, उसे तो केवल निमित्त बनाते हैं! सांसारिक माता तो कदाचित् असावधानी और सामर्थ्यके अभावसे या भ्रमसे गिरते हुए बच्चेको न भी बचा सके परन्तु वे सर्वशक्तिमान्, सर्वान्तर्यामी, परमदयालु, सर्वज्ञ प्रभु तो अपने आश्रितको कभी गिरने देते ही नहीं! वरन् उतरोत्तर उसे सहायता देते हुए, एक-एक सीढ़ी चढाते हुए सबसे ऊपरके तल्लेपर, जहाँ पहुँचना ही जीवका अन्तिम ध्येय है, पहुँचा ही देते हैं ! इससे यह सिद्ध हो जाता है कि प्रयत्न भगवान् ही करते हैं, भक्तको तो केवल इच्छा करनी पड़ती है और उसीसे भगवान् उसे निमित्त बना देते हैं !