पौष कृष्ण चतुर्थी, वि.सं.-२०६८, बुधवार
संतकी विशेषता
दयासागर भगवान् की दयाके तत्त्व और रहस्यको यथार्थ जाननेवाला पुरुष भी दयाका समुद्र और सब भूतोंका सुह्द् बन जाता है, भगवान् ने कहा है --
' सुह्दं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छ्ती !!'(गीता ५/२९)
इस कथनका रहस्य यही है कि दयामय भगवान् को सब भूतोंका सुह्द् समझनेवाला पुरुष उस दयासागरके शरण होकर निर्भय हो जाता है तथा परमशान्ति और परमानन्दको प्राप्त होकर स्वयं दयामय बन जाता है ! इसलिये भगवान् ठीक ही कहते हैं कि मुझको सबका सुह्द् समझनेवाला शान्तिको प्राप्त हो जाता है, ऐसे भगवत्प्राप्त पुरुष ही वास्तवमें संत पदके योग्य हैं! ऐसे संतोंको कोई-कोई तो विनोदमें भगवान् से बढ़कर बता दिया करते हैं ! तुलसीदासजी महाराज कहते हैं---
मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा ! राम ते अधिक राम कर दासा !!
राम सिंधु घन सज्जन धीरा ! चंदन तरु हरि संत समीरा !!
'भगवान् समुद्र हैं तो संत मेघ हैं, भगवान् चन्दन हैं तो संत समीर (पवन ) हैं ! इस हेतुसे मेरे मनमें ऐसा विश्वास होता है कि रामके दास रामसे बढ़कर हैं !' दोनों दृष्टान्तोंपर ध्यान दीजिये! समुद्र जलसे परिपूर्ण है, परन्तु वह जल किसी काममें नहीं आता! न कोई उसे पिता है और न उससे खेती ही होती है! परन्तु बादल जब उसी समुद्रसे जलको उठाकर यथायोग्य बरसते हैं तो केवल मोर, पपीहा और किसान ही नहीं-- सारे जगतमें आनंद कि लहर बह जाती है ! इसी प्रकार परमात्मा सच्चिदानंदघन सब जगह विधमान हैं, परन्तु जबतक परमात्माके तत्त्वको जाननेवाले भक्तजन उनके प्रभावका सब जगह विस्तार नहीं करते, तबतक जगतके लोग परमात्माको नहीं जान सकते! जब महात्मा संत पुरुष सर्वसद्गुणसागर परमात्मासे समता, शान्ति, प्रेम, ज्ञान और आनंद आदि गुण लेकर बादलोंकी भाँति संसारमें उन्हें बरसाते हैं, तब जिज्ञासु साधकरूप मोर, पपीहा, किसान ही नहीं, किन्तु सारे जगतके लोग उससे लाभ उठाते हैं !
