※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011


पौष कृष्ण पंचमी, वि.सं.-२०६८, गुरुवार 




संतकी विशेषता 


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भाव यह है कि भक्त न होते तो भगवानकी गुणगरिमा और महत्त्व-प्रभुत्वका विस्तार जगतमें कौन करता ? इसलिये भक्त भगवानसे ऊँचे हैं! दूसरी बात यह है कि जैसे सुगन्ध चन्दनमें ही है, परन्तु यदि वायु उस सुगन्धको वहन करके अन्य वृक्षोंतक नहीं ले जाता तो चन्दनमें ही रहती, नीम आदि वृक्ष कदापि चन्दन नहीं बनते! इसी प्रकार भक्तगण यदि भगवानकी महिमाका विस्तार नहीं करते तो दुर्गुणी, दुराचारी मनुष्य भगवानके गुण और प्रेमको पाकर सद्गुणी, सदाचारी नहीं बनते! 


इसलिये भी संतोंका दर्जा भगवानसे बढ़कर है! वे संत जगतके सारे जीवोमें समता, शान्ति, प्रेम, ज्ञान और आनन्दका विस्तार कर सबको भगवानके सदृश बना देना चाहते हैं !