पौष कृष्ण पंचमी, वि.सं.-२०६८, गुरुवार
संतकी विशेषता
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भाव यह है कि भक्त न होते तो भगवानकी गुणगरिमा और महत्त्व-प्रभुत्वका विस्तार जगतमें कौन करता ? इसलिये भक्त भगवानसे ऊँचे हैं! दूसरी बात यह है कि जैसे सुगन्ध चन्दनमें ही है, परन्तु यदि वायु उस सुगन्धको वहन करके अन्य वृक्षोंतक नहीं ले जाता तो चन्दनमें ही रहती, नीम आदि वृक्ष कदापि चन्दन नहीं बनते! इसी प्रकार भक्तगण यदि भगवानकी महिमाका विस्तार नहीं करते तो दुर्गुणी, दुराचारी मनुष्य भगवानके गुण और प्रेमको पाकर सद्गुणी, सदाचारी नहीं बनते!
इसलिये भी संतोंका दर्जा भगवानसे बढ़कर है! वे संत जगतके सारे जीवोमें समता, शान्ति, प्रेम, ज्ञान और आनन्दका विस्तार कर सबको भगवानके सदृश बना देना चाहते हैं !
