※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011




संतोंकी दया


उन महात्माओंमें कठोरता, वैर और द्वेषका तो नाम ही नहीं रहता! वे इतने दयालु होते हैं कि दुसरेके दुःखको देखकर उनका ह्रदय पिघल जाता है! वे दुसरेके हितको ही अपना हित समझते हैं!  उन पुरुषोंमें विशुद्ध दया होती है ! जो दया कायरता, ममता, लज्जा, स्वार्थ और भय आदिके कारण कि जाती है, वह शुद्ध नहीं है ! जैसे भगवानकी अहैतुकि दया समस्त जीवोंपर है -- इसी प्रकार महापुरुषोंकी अहैतुकी दया सबपर होती है! उनकी कोई कितनी ही बुराई क्यों न करे, बदला     लेनेकी इच्छा तो उनके ह्रदयमें होती ही नहीं ! कहीं बदला लेनेकी-सी क्रिया देखी जाती है, तो वह भी उसके दुर्गुणोंको हटाकर उसे विशुद्ध करनेके लिये ही होती है ! इस क्रियामें भी उनकी दया छिपी रहती है -- जैसे माता-पिता, गुरुजन बच्चेके सुधारके लिये स्नेहपूर्ण हृदयसे उसे दण्ड देते हैं --इसी प्रकार संतोंमें भी कभी-कभी ऐसी क्रिया होती है, परन्तु इसमें भी परम हित भरा रहता है! वे संत करूणाके भण्डार होते हैं ! जो कोई उनके समीप जाता है, वह मानो दयाके सागरमें गोते लगता है ! उन पुरुषोंके दर्शन, भाषण, स्पर्श और चिन्तनमें भी मनुष्य उनके दयाभावको देखकर मुग्ध  हो जाता है! वे जिस मार्गसे निकलते हैं, मेघकी-ज्यों दयाकी वर्षा करते हुए ही निकलते हैं !मेघ सब समय और सब जगह नहीं बरसता, परन्तु संत तो सदा - सर्वदा सर्वत्र बरसते ही रहते हैं!