※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

मंगलवार, 26 मार्च 2013

मान-बड़ाई का त्याग -४



|| श्रीहरिः ||
आज की शुभतिथि-पंचांग
फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी,मंगलवार, वि०स० २०६९

* मान-बड़ाई का त्याग *

गत ब्लॉग से आगे....... वर्तमान समय में असली श्रद्धा और प्रेम बहुत कम लोगों में देखने को मिलता है, अधिकांश लोगों में श्रद्धा और प्रेम की नक़ल ही देखने को मिलती है | असली श्रद्धा का रूप बाहरी पूजा, नमस्कार, सत्कार आदि नहीं है; ये तो श्रद्धा के बाहरी रूप हैं, शिष्टाचार के अन्तर्गत हैं | ये दिखावटी भी हो सकते हैं | असली श्रद्धा तो श्रद्धेय पुरुष का हृदय से अनुयायी बन जाना, उनकी इच्छा केउनके मन के सर्वथा अनुकूल बन जाना है | सूत्रधार कठपुतली को जिस प्रकार नचाता है, उसी प्रकार वह नाचने लगती है, वह सब प्रकार से नचानेवाले पर ही निर्भर करती है | इसी प्रकार जो श्रद्धेय पुरुष के सर्वथा अनुगत हो जाता है, उसीके इशारे पर चलता है, अपने मनसे कुछ भी नहीं करता, वही सच्चा श्रद्धालु है | श्रद्धेय की आज्ञाओं का अक्षरशः पालन करना भी ऊँची श्रद्धा का द्योतक है | परन्तु श्रद्धेय को मुँह से कुछ भी न कहना पड़े, उसके इंगितपर ही सब काम होने लगे, उसकी रूचि के अनुकूल सारी क्रिया होने लगेयह और भी ऊँची श्रद्धा है | सच्चे अनुगत पुरुष को छाया के समान व्यवहार करना चाहिए | जिस प्रकार हमारी छाया में, हमारे प्रतिबिम्ब में हमारी प्रत्येक चेष्टा अपने-आप जैसी-की-तैसी उतर आती है, उसी प्रकार श्रद्धेय का प्रत्येक आचरण, उसका प्रत्येक गुण श्रद्धालु के जीवन में उतर आना चाहिए | इस प्रकार जो छाया की भांति श्रद्धेय का अनुसरण करता है, वही सच्चा शरणागत है, उसीकी श्रद्धा परम श्रद्धा है, उच्चतम कोटि की श्रद्धा है | सच्चा श्रद्धालु श्रद्धेय के प्रतिकूल आचरण करना तो दूर रहा, अनुकूलता में रंचमात्र उनकी कमी को भी सहन नहीं कर सकता, संतो की बाहरी पूजा काशिष्टाचार का इतना महत्त्व नहीं है जितना भीतर से उनके अनुकूल बन जाने का | संतों के अनुकूल बन जाना ही उनकी असली पूजा है |.........शेष अगले ब्लॉग में

श्रद्धेय जयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्त्वचिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर
नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!