※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

रविवार, 27 अप्रैल 2014

गीताप्रेस के संस्थापक-सिद्धान्त-१३-


 

।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

वैशाख कृष्ण, त्रयोदशी, रविवार, वि० स० २०७१

गीताप्रेस के संस्थापक-सिद्धान्त-१३-

 

गत ब्लॉग से आगे…..... एक दिन जलपान देते समय एक रसगुल्ला उनकी कटोरी के लग कर पाटे पर गिर गया । परोसने वाले ने कहा की यह बच्चे को दे देवे तो सेठजी ने बहुत जोर से गर्म होकर सामने खड़े अपने अनुज मोहनलाल जी गोयन्दका से कहा-देख मोहन ! यह मेरे साथ दुर्व्यवहार कर रहा है, मुझे तो ऐसे ही लोग बदनाम करते है फिर मैं बोलने लायक नहीं रहूँगा । कोई है जहाँ जो इसे जमीन में गड्ढा खोदकर नष्ट कर दे ।

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किसी धनी व्यक्ति ने कहा की हमारे यहाँ महात्मा बहुत आते हैं । सेठजी बोले की पैसा देखकर जो आते है वे महात्मा नहीं होते ।

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यों तो सेठजी को सारी गीता याद थी और उनके एक-एक श्लोक प्रिय थे; परन्तु फिर भी कुछ श्लोक विशेष प्रिय प्रतीत होते थे-जिनमे स्वयं सेठजी का जीवन झांकता था –

कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य:

स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्त: कृत्स्नकर्मकृत् ४ /१८

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति गीता ६ / ३०

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ९ / २२

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च १० /

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वत:

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् १८ / ५५

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु

मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे १८ / ६५

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं  त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥ १८ / ६६

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प्रिय भजन:- यों तो सेठजी कई भजन गाया करते थे; किन्तु निम्न भजन उन्हें विशेष प्रिय था-

उड़ जायेगा रे हँस अकेला, दिन दोय का दर्शन मेला ।। टेर।।

राजा भी जाएगा, जोगी भी जायेगा, गुरु भी जायेगा चेला ।। १ ।।

माता-पिता भाई-बन्धु भी जायेंगे, और रुपयों का थैला ।। २ ।।

तन भी जायेगा, मन भी जायेगा, तू क्यों भया है गैला ।। ३ ।।

तू भ जायेगा, तेरा भी जायेगा, यह सब माया का खेला ।। ४ ।।

कोडी रे कोडी माया जोड़ी, सँग चलेगा न अधेला ।। ५ ।।

साथी रे साथी तेरे पार उतर गए, तू क्यों रहा अकेला ।। ६ ।।

राम-नाम निष्काम रटो नर, बीती जात है बेला ।। ७ ।।

कीर्तन में उन्हें श्रीमन्ननारायण नारायण नारायण का गान विशेष प्रिय था । ...... शेष अगले ब्लॉग में       

गीताप्रेस के संस्थापक, गीता के परम प्रचारक, प्रकाशक  श्रीविश्वशान्ति आश्रम, इलाहाबाद

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!