※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

बुधवार, 2 जुलाई 2014

कर्मयोग -६


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

आषाढ़ शुक्ल, पञ्चमी, बुधवार, वि० स० २०७१

कर्मयोग  -६

       गत ब्लॉग से आगे.....पद-पद पर स्वामी के स्वरुप और उनकी दया का दर्शन करते हुए क्षण-क्षण में मुग्ध होते रहना और सर्वस्व स्वामी का ही समझते हुए अभिमान से रहित रहकर निमितमात्र बनकर प्रभु के आज्ञानुसार कर्मों का करना सर्वोत्तम भगवदअर्पण कर्म है ।

श्रद्धा और प्रेम की कमी, मान और बड़ाई, मन की चंचलता, प्रमाद, आलस्य, अज्ञान, आसक्ति और अहंकारप्रभृतिकर्मयोग के साधन में रूकावट डालनेवाले विशेष दोष है ।

विवेक और वैराग्य द्वारा सारे विषय-भोगों से मन को हटाकर भगवान की शरण रहते हुए श्रद्धा और प्रेमपूर्वकनिष्काम कर्मयोग के साधन के लिए प्राणपर्यन्त चेष्टा करनी चाहिये । इस प्रकार चेष्टा करने से सम्पूर्ण दुखों और दोषों का नाश होकर परम आनन्द और परम शान्ति की प्राप्ति शीघ्र हो सकती है ।

कंचन, कामिनी, भोग और आराम की तो बात ही क्या है, निष्काम कर्मयोगरूप धर्म के थोड़े-से भी पालन के मुकाबले मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा और अपने प्राणों को भी तुच्छ समझना एवं परम तत्पर होकर उसके पालन के लिए सदा-सर्वदा प्रयत्न करना ही प्राण-पर्यन्त चेष्टा करना है ।

जो इस निष्काम कर्मयोग के रहस्य और प्रभाव को तत्व से जान जाता है, वह फिर इसे छोड़ नही सकता .....शेष अगले ब्लॉग में

   -सेठ जयदयाल गोयन्दका, कल्याण वर्ष ८८, संख्या ६, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!