※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

कर्मयोग -८


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

आषाढ़ शुक्ल, सप्तमी, शुक्रवार, वि० स० २०७१

कर्मयोग  -८

       गत ब्लॉग से आगे.....साधन निष्काम प्रेमभाव से हर समय भगवान् का चिन्तन करते हुए भगवदआज्ञानुसार केवल भगवतप्रीत्यर्थ ही करने का नाम भक्तिप्रधान निष्काम कर्मयोग है ।

कर्मप्रधान में भी भक्ति रहती है; किन्तु सामन्य-भाव से रहती है । फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदआज्ञानुसार समत्व-बुद्धि से कर्म करने का नाम कर्मप्रधान निष्कामकर्मयोग है ।

कर्मयोग की निष्ठा में प्रकृति-माया, जीवात्मा और परमेश्वर-ये तीन पदार्थ माने गए है । वे सर्वशक्तिमान, सबके कर्ता-हर्ता, सर्वात्न्यामी, सर्वव्यापी परमेश्वर उस नित्य विज्ञानानन्दघन ब्रह्म की प्रतिष्ठा है अर्थात विज्ञानानन्दघन ब्रह्म वे ही है । उन्होंने ही अपनी योगमाया के एक अंश से सम्पूर्ण संसार को अपने में धारण कर रखा है । माया ईश्वर की शक्ति है तथा जड, अनित्य और विकारी है एवं ईश्वर के अधीन है तथा जीवात्मा भी ईश्वर का अंश होने के कारण नित्य विज्ञानानन्दघन है, किन्तु माया में स्तिथ होने के कारण परवश हुआ वह गुण और कर्मों के अनुसार सुख-दुखादी को भोगता एवं जन्म-मृत्यु को प्राप्त होता है; किन्तु परमात्मा की शरण होने से वह माया से छुटकारा पाकर परमपद को प्राप्त हो सकता । .....शेष अगले ब्लॉग में

   -सेठ जयदयाल गोयन्दका, कल्याण वर्ष ८८, संख्या ६, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!