※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

भावना ऊँची-से-ऊँची करनी चाहिये 1


भावना ऊँची-से-ऊँची करनी चाहिये 

भावना ऊँची-से-ऊँची करनी चाहिये कोड- 2027 प्रवचन दिनांक-१२-५-१९५९, गंगेहरकी कुटिया, वटवृक्ष, स्वर्गाश्रम। अपने मनके अनुकूल या प्रतिकूल जो भी घटना होती है, वह अपने लिये भगवान् की मंगलमय विधान है, उसके प्राप्त होनेपर प्रसन्न रहे। प्रभु मंगल करनेवाले हैं, वे अनिष्ट करते ही नहीं।  सत्संग कर रहे हैं, कोई नास्तिक आ जाय और अंट-शंट पूछने लगे तो विघ्न नहीं समझे, उसमें प्रसन्न रहे। यदि विघ्न माने तो नीची श्रेणी है। वह भगवान् का भेजा हुआ है, भगवान् परीक्षा ले रहे हैं। अगर विघ्न मान लिया तो अनुत्तीर्ण हो गये, यदि उसे पुरस्कार मान ले तो पुरस्कार है।  बीमारी आती है तो चिकित्सा करनी चाहिये। जैसे प्यास लगती है तो जल पीनेसे प्यास दूर होती है, इसी तरह औषधि लेनेसे रोग दूर होने लगे तो प्रसन्न नहीं होना चाहिये। यदि रोग बढ़ता है तो दुखी नहीं होना चाहिये। कोई द्वेष भावना आ जाय तो चुप हो जाना चाहिये। मन के अनुकूल में उतनी शिक्षा नहीं है, जितनी प्रतिकूलमें मिलती है। प्रतिकूलतामें द्वेष, क्रोध, स्पर्धा आदि नहीं हों तो यह उत्तम बात है।  क्रोध का अवसर आपके नहीं आया और आपको क्रोध नहीं हुआ तो उससे क्या पता चले कि क्रोध जीता गया है या नहीं, क्रोध की स्थिति आनेपर क्रोध नहीं हो तब पता चले। भगवान् की दया को इतनी छोटी बना दी कि स्त्री, पुत्र, धन में ही दया मान ली। यह आत्मकल्याण करनेवाली नहीं है, इनमें समता रहनी चाहिये। यदि इनमें ही दया मान ली तो डूब जाता है। भगवान् की  दया सकाम भाव से मान ले तो नीचे गिरने की सम्भावना है। प्रतिकूल में दया माने तो ऊँचा उठाने वाली है। रोग आये तो भगवान् चेताते हैं कि मृत्यु आने वाली है, भगवान् सावधान करते हैं। रोग पाप का फल है निश्चिन्त होकर कैसे सो रहा है। यदि उस रोग को परम तप मान ले तो वह पाप तप हो जाता है। मैं जब अस्वस्थ हुआ, तब मैंने शरीरमें खोजा, किन्तु वहाँ भोक्ता नहीं मिला। प्रश्न-भगवत्प्राप्ति शीघ्र कैसे हो ? उत्तर-भगवान कहते हैं— यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ (गीता ६ । ३०) जो पुरुष सम्पूर्ण भूतोंमें सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतोंको मुझ वासुदेव अन्तर्गत देखता है उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।  जब भगवान कहते हैं तो मान ही लेना चाहिये। नहीं मानते है तो भगवान वचनोंमें विश्वास कहाँ है? आश्चर्य करना चाहिये कि ऐसा क्यों नहीं होता है। वैराग्य की तीव्रता राग-द्वेषको खा जाती है। समता उसका फल है। सार बात बतलाता हूँ।  पहली बात-भक्ति या ज्ञानके नशेमें चूर रहे। यह पता ही नहीं रहे कि संसार में क्या हो रहा है?  दूसरी बात- भगवान् का हृदय पुष्प से भी बढ़कर कोमल है और वज्रसे भी बढ़कर कठोर है। श्रद्धालुओं के लिये वज्रसे भी बढ़कर कठोर है और श्रद्धालुके लिये कोमल है। भगवान जब अवतार लेते हैं तब ये कार्य करते हैं— परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (गीता ४। ८)  साधु पुरुषोंका उद्धार करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्म की अच्छी तरहसे स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ।  माता, पिता, गुरु आदि की मार में परम लाभ है। भगवान ने महाभारत युद्ध में शस्त्र नहीं लिया, जिससे दुर्योधन आदि की मुक्ति नहीं हुई। जिसकी जैसी भावना होती है उनको भगवान उसी तरहसे दीखते हैं— जाकी रही भावना जैसी । प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥ एक स्त्री है वह शेर, कामी, विरक्त, बच्चे और भक्त सबको अलग-अलग दीखती है। इसी तरह भगवान भी सबको अपनी भावना के अनुसार अलग-अलग दीखते हैं। जैसे भगवान् श्रीकृष्ण चन्द्र जी जब कंस रंगभूमि में मल्ल युद्ध के लिये गये थे तब वहाँ उपस्थित लोगोंको  अपनी-अपनी भावना के अनुसार दीखे— मल्लाना नरवरः स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान् गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वपित्रोः शिशुः। मृत्यु भोजपतेर्विराड विदुषां तत्त्वं परं योगिनां वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रंगं गतः साग्रजः॥ (श्रीमद्भागवत महापुराण १०। ४३ । १७)  जिस समय भगवान श्री कृष्ण बलराम जी के साथ रंगभूमि में पधारे, उस समय वे पहलवानोंको को वज्र कठोर शरीर, साधारण मनुष्य को नर-रत्न, स्त्रियों को मूर्तिमान् कामदेव, गोपों को स्वजन, दुष्ट राजाओंको दण्ड देनेवाले शासक, माता-पिता के समान बड़े-बूढ़ों को शिशु, कंस को मृत्यु, अज्ञानियोंको विराट्, योगियों को परम तत्त्व और भक्त शिरोमणि वृष्टिवंशियों को अपने इष्टदेव जान पड़े (सबने अपने-अपने भावानुरूप क्रमशः रौद्र, अद्भुत, शृंगार, हास्य, वीर, वात्सल्य, भयानक, बीभत्स, शान्त और प्रेम भक्ति रस का अनुभव किया)।

अपने मनके अनुकूल या प्रतिकूल जो भी घटना होती है, वह अपने लिये भगवान् की मंगलमय विधान है, उसके प्राप्त होनेपर प्रसन्न रहे। प्रभु मंगल करनेवाले हैं, वे अनिष्ट करते ही नहीं।
सत्संग कर रहे हैं, कोई नास्तिक आ जाय और अंट-शंट पूछने लगे तो विघ्न नहीं समझे, उसमें प्रसन्न रहे। यदि विघ्न माने तो नीची श्रेणी है। वह भगवान् का भेजा हुआ है, भगवान् परीक्षा ले रहे हैं। अगर विघ्न मान लिया तो अनुत्तीर्ण हो गये, यदि उसे पुरस्कार मान ले तो पुरस्कार है।
 बीमारी आती है तो चिकित्सा करनी चाहिये। जैसे प्यास लगती है तो जल पीनेसे प्यास दूर होती है, इसी तरह औषधि लेनेसे रोग दूर होने लगे तो प्रसन्न नहीं होना चाहिये। यदि रोग बढ़ता है तो दुखी नहीं होना चाहिये। कोई द्वेष भावना आ जाय तो चुप हो जाना चाहिये। मन के अनुकूल में उतनी शिक्षा नहीं है, जितनी प्रतिकूलमें मिलती है। प्रतिकूलतामें द्वेष, क्रोध, स्पर्धा आदि नहीं हों तो यह उत्तम बात है।
 क्रोध का अवसर आपके नहीं आया और आपको क्रोध नहीं हुआ तो उससे क्या पता चले कि क्रोध जीता गया है या नहीं, क्रोध की स्थिति आनेपर क्रोध नहीं हो तब पता चले। भगवान् की दया को इतनी छोटी बना दी कि स्त्री, पुत्र, धन में ही दया मान ली। यह आत्मकल्याण करनेवाली नहीं है, इनमें समता रहनी चाहिये। यदि इनमें ही दया मान ली तो डूब जाता है। भगवान् की  दया सकाम भाव से मान ले तो नीचे गिरने की सम्भावना है।
प्रतिकूल में दया माने तो ऊँचा उठाने वाली है। रोग आये तो भगवान् चेताते हैं कि मृत्यु आने वाली है, भगवान् सावधान करते हैं। रोग पाप का फल है निश्चिन्त होकर कैसे सो रहा है। यदि उस रोग को परम तप मान ले तो वह पाप तप हो जाता है। मैं जब अस्वस्थ हुआ, तब मैंने शरीरमें खोजा, किन्तु वहाँ भोक्ता नहीं मिला।
प्रश्न-भगवत्प्राप्ति शीघ्र कैसे हो ?
उत्तर-भगवान कहते हैं—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
(गीता ६ । ३०)
जो पुरुष सम्पूर्ण भूतोंमें सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतोंको मुझ वासुदेव अन्तर्गत देखता है उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।
जब भगवान कहते हैं तो मान ही लेना चाहिये। नहीं मानते है तो भगवान वचनोंमें विश्वास कहाँ है? आश्चर्य करना चाहिये कि ऐसा क्यों नहीं होता है। वैराग्य की तीव्रता राग-द्वेषको खा जाती है। समता उसका फल है। सार बात बतलाता हूँ।
पहली बात-भक्ति या ज्ञानके नशेमें चूर रहे। यह पता ही नहीं रहे कि संसार में क्या हो रहा है?

दूसरी बात- भगवान् का हृदय पुष्प से भी बढ़कर कोमल है और वज्रसे भी बढ़कर कठोर है। श्रद्धालुओं के लिये वज्रसे भी बढ़कर कठोर है और श्रद्धालुके लिये कोमल है। भगवान जब अवतार लेते हैं तब ये कार्य करते हैं
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
(गीता ४। ८)
साधु पुरुषोंका उद्धार करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्म की अच्छी तरहसे स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ।
माता, पिता, गुरु आदि की मार में परम लाभ है। भगवान ने महाभारत युद्ध में शस्त्र नहीं लिया, जिससे दुर्योधन आदि की मुक्ति नहीं हुई। जिसकी जैसी भावना होती है उनको भगवान उसी तरहसे दीखते हैं—
जाकी रही भावना जैसी । प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥
एक स्त्री है वह शेर, कामी, विरक्त, बच्चे और भक्त सबको अलग-अलग दीखती है। इसी तरह भगवान भी सबको अपनी भावना के अनुसार अलग-अलग दीखते हैं। जैसे भगवान् श्रीकृष्ण चन्द्र जी जब कंस रंगभूमि में मल्ल युद्ध के लिये गये थे तब वहाँ उपस्थित लोगोंको  अपनी-अपनी भावना के अनुसार दीखे—
मल्लाना नरवरः स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान्
गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वपित्रोः शिशुः।
मृत्यु भोजपतेर्विराड विदुषां तत्त्वं परं योगिनां
वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रंगं गतः साग्रजः॥
(श्रीमद्भागवत महापुराण १०। ४३ । १७)
 जिस समय भगवान श्री कृष्ण बलराम जी के साथ रंगभूमि में पधारे, उस समय वे पहलवानोंको को वज्र कठोर शरीर, साधारण मनुष्य को नर-रत्न, स्त्रियों को मूर्तिमान् कामदेव, गोपों को स्वजन, दुष्ट राजाओंको दण्ड देनेवाले शासक, माता-पिता के समान बड़े-बूढ़ों को शिशु, कंस को मृत्यु, अज्ञानियोंको विराट्, योगियों को परम तत्त्व और भक्त शिरोमणि वृष्टिवंशियों को अपने इष्टदेव जान पड़े (सबने अपने-अपने भावानुरूप क्रमशः रौद्र, अद्भुत, शृंगार, हास्य, वीर, वात्सल्य, भयानक, बीभत्स, शान्त और प्रेम भक्ति रस का अनुभव किया)।

- श्री जयदयाल जी गोयन्दका -सेठजी 
पुस्तक- भगवत्प्राप्ति की अमूल्य बातें , कोड-2027, गीताप्रेस गोरखपुर  

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