※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

रविवार, 15 जुलाई 2012

भक्त की महिमा......3

|| श्री हरी ||

भक्त की महिमा............
दुर्वासा ऋषि तेजस्वी और बड़े क्रोधी थे |  ऋषि दुर्वासा को स्नान से लौटने में विलम्ब होने के कारण एकादशी व्रत  भंग होने के भय से राजा अम्बरीष ने ब्राह्मणों की सम्मति से तुलसी चरणामृत  लेकर पारण कर लिया था | इसलिए दुर्वासा ने कहा - ब्राह्मणों को निमंत्रित किये बिना ब्राह्मणों को भोजन कराये तुमने कैसे भोजन कर लिया ? राजा ने जबाब दिया महाराज ! आप क्षमा करे, मैंने भोजन नहीं किया है | केवल तुलसी और  चरणामृत  ही लिया है | दुर्वासा ने कहा - तुलसी और चरणामृत भी क्यों लिया ? में तुम्हे दंड दूंगा | ऐसा कह कर उन्होंने क्रोध करके कृत्या उत्पन्न की  | वह राजा पर दौड़ी तो भगवान् के सुदर्शन चक्र ने उससे नष्ट कर दिया , फिर वह चक्र दुर्वासा के पीछे दौड़ा | दुर्वासा भागे. शिवलोक और ब्रह्मा जी के लोक में गए, कही भी उनकी रक्षा नहीं हुई | फिर भगवान् के वैकुण्ठ लोक में गए, परन्तु भगवान् ने कहा हे ऋषि ! में तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता, मैं भक्त के अधीन हु, तुम मेरे उसी भक्त के पास जाओ, वही रक्षा कर सकता है | दुर्वासा ऋषि अम्बरीष के पास गए | अम्बरीष अभी तक बिना कुछ खाए हाथ जोड़े खड़े हुए थे | उन्होंने सुदर्शन की प्रार्थना   करके उसे शांत किया और फिर दुर्वासा ने राजा की भूरी भूरी प्रसंसा की | बाद में भोजन किया | यहाँ यह बात समझ लेनी चाहिए के भक्तो में काम क्रोध नहीं रहता |
उद्धव जी ने भगवान् का पास जाकर कहा के अपने मुझे गोपिओ को योग और ज्ञान सिखाने के लिए नहीं भेजा , अपितु मुझे उनके पास प्रेम सीखने  के लिए भेजा है | मैं प्रार्थना करता हु की आप मुझे लता पता भी बनाये तो वृन्दावन में बनाये | जिससे गोपिओ की चरण धुली मेरे उपर गिरे , उससे मैं पवित्र बन जाऊ |

यसोदा ने किसी ब्रह्मण को भोजन का निमंत्रण दिया| भोजन तैयार कर भोजन के थाली सामने रखी और ब्राह्मण आंख बंद करके भगवान् का ध्यान करने लगे  | भगवान् झट उनकी थाली में भोजन करने लगे | माँ ने उनको धमकाया तोह भगवान् बोले माँ ! मैं क्या करू, यह मुझे बुलाता है , तभी मैं खाता हु |
ऐसे भक्तो के लिए भगवान् कहते है की मैं उनके पीछे पीछे जाता हु , जिससे उनकी चरण धुली मेरे उपर पड़े और मैं पवित्र हो जाऊ | भगवान् क्या पवित्र होंगे, वे तो परम पवित्र है | भक्त की जो भावना है उसी के अनुसार भगवान् भावना करते है |
हे अर्जुन ! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते है , मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हु | ( गीता ४|११)

महाभारत के शांति पर्व में आया है | एक समय महाराज युधिष्ठर ने भगवान् श्री कृष्ण को एकांत में बैठे हुए ध्यान करते देखा | ध्यान के बाद युधिष्ठर ने पूछा सारा संसार आपका ध्यान करता है, परन्तु आप किसका ध्यान करते है? यह बात यदि प्रगट करने योग्य हो तो बताए | भगवान् ने कहा - भीष्म पितामह  सर  सैया  पर पड़े मेरा ध्यान कर रहे है , अत एव मैं भी उनका ध्यान करता हूँ |
मैं उसके लिए अद्रश्य नहीं होता वह मेरे लिए अद्रशय नहीं होता (गीता ६|३०)

 यह उनका भाव है | हम तो हनुमान की तरह भी बन जाये तो बड़ा अच्छा है | वे भरत जी से कहते है की मैं तो महाराज राम का किंकर हु | भरत जी के क्या दशा होगी ?
राम  विरह  सागर  मह   भरत मगन मन होत |
विप्र्रूप  धरी  पवनसुत  आई गयौ जिमी पोत ||
बैठे   देखी   कुसासन   जटामुकुट      क्रष गात |
राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात ||
ब्राह्मण का रूप धारण करके डूबते हुए भरत जी को हनुमान जी ने बचा  लिया | ऐसे अवस्था में हनुमान जी ने सूचना दी की सीता लक्ष्मण जी  समेत रघुनाथ जी आ रहे है | यह सुनते ही भरत जी में आंख खोल कर देखा और पूछा -
को तुम तात कहा ते आये | मोहि परम प्रिय वचन सुनाये ||
हे तात | तुम कौन हो ? तुमने मुझको परम प्रिय वचन  सुनाये | 
हनुमान जी ने अपना परिचय दिया |
मारुतसुत मैं कपि हनुमाना | नामु मोर सुनु कृपानिधाना |
महाराज ! मैं रघुनाथ जी का किंकर हु | यह सुन कर भरत जी उठे और हनुमान जी से मिले और कहा -
एही सन्देश सरिस जग माहि | करी विचार देकहू कछु नहीं |
नहिन तात उरिन मैं तोही | अभ प्रभु चरित सुनावहु मोहि ||
जो प्रसन्ता भगवान् के मिलने पर होती है, वैसे ही भगवान् के दास के मिलने पर हुई | हनुमान जी सेवा का काम करते है और उनका उपकार भरत जी मानते है | भगवान् भी हनुमान का उपकार मानते है यह भगवन और भक्त का भाव है | हम लोगो को भी भगवान् के दशो का दस और उनके दस बन्ने का सोभाग्य मिल जाये तो हमारा  कल्याण हो सकता है |


नारायण !!!!!!!!! नारायण !!!!!!!!!! नारायण!!!!!!!!!!!!
सेठ श्री जयदयाल जी गोयन्दका ...साधन की आवस्यकता ...गीताप्रेस गोरखपुर ....पुस्तक कोड ११५०