※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

जीवन-सुधार की बातें



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अश्वत्थमेनं     सुविरूढमूलमसङगशस्त्रेण    दृढेन छित्वा !!
तत: पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूय: !
तमेव   चाध्यं  पुरुषं    प्रपध्ये  यत:  प्रवृति:  प्रसूता पुराणी !!
                                                            (गीता १५ ३-४ )
      डेढ़ श्लोक पर्याप्त है ! क्या कहते हैं ? संसार रूपी वृक्ष को दृढ वैराग्य रूप शस्त्र से कट डालो ! यह वृक्ष बड़ा दृढ है, इसकी जड़े भी जम गयी है इसको काट डालो ! काटना क्या ? भुला दो संकल्प रहित हो जाओ ! तीव्र वैराग्य का फल उपरति है !
  संकल्प रहित होने के बाद उप पद की खोज करनी चाहीये जिसको पाकर फिर लौट कर नहीं आयें ! वह पद कैसे मिले ? उस आदि पुरुष की मैं शरण हूँ ! जिस परमात्मासे चिरकाल से यह संसार विस्तार को प्राप्त हुआ है, इस भाव से उसका अन्वेषण करना चाहीये !
  संसार को हटा देना, परमात्मा की शरण होना यह भक्ति का मार्ग है ! ऐसे ही ज्ञान का मार्ग है-----------
  शनै:         शनैरुपरमेदबुद्धया        धृतिगृहीतया !
  आत्मसंस्थं मन: कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत !!
                                     (गीता ६ / २५ )
     क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरति को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा मनको परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे !
 धैर्य धारण की हुई बुद्धि के द्वारा मन को परमात्मा में लगा दो, फिर किसी का चिन्तन करो ही मत ! ऐसा नहीं हो सके तो जो प्रतीत हो वह परमात्मा का स्वरुप है !
 बहिरन्तश्च     भूतानामचरं      चरमेव     च !
 सुक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् !!
                                 (गीता १३ / १५ )
     वह चराचर सब भूतोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चार-अचररूप भी वही है ! वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय तथा अति समीप में और दूर में भी स्थित वही है !
     वह जो परमात्मा का स्वरुप है जिनके श्रद्धा प्रेम नहीं है उनके समझ में नहीं आता, जिनके श्रद्धा प्रेम है उनके निकट है ऐसा समझकर सर्वत्र परमात्मा को देखो !
  बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपध्य्ते !
  वासुदेव:   सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः !!
                                  (गीता ७ / १९ )
     यह ज्ञान के मार्ग में भी चलता है भक्ति के मार्ग में भी ! भक्ति मार्ग में सब चराचर परमात्मा का स्वरुप है ! मैं उसका सेवक हूँ !
  यह चराचर जो नाना रूपसे आपको दिख रहा है यह तत्व समझ में आने से परमात्मा के रूप में दिखने लगेगा !
  यह घट-पट आदि क्या है ? सब मिट्टी  है ! आग लगाओ सब मिट्टी सब मिट्टी जायगी ! मूल देखो मिट्टी, अंत देखो मिट्टी !
  इसी प्रकार जो संसार है उसमें मूलमें परमात्मा, अन्तमें भी परमात्मा तो बीचमें भी परमात्मा ही है !
  गहनों का नाम अलग अलग है किन्तु वास्तव में सोना ही है !

   जब आपको यह ज्ञान हो जायेगा तो परमात्मा ही परमात्मा दिखेगा ! जो जल का तत्व समझता है उसे बूंद, बर्फ, बादल सब जल-ही-जल दिखता है ! सोने का तत्व जो समझ जाता है उसे सब गहनों में स्वर्ण-ही-स्वर्ण दीखता है ! इसी प्रकार जो परमात्मा के तत्व को समझ जाता है उसे परमात्मा-ही-परमात्मा दीखते हैं ! आनन्दमय ! आनन्दमय ! आनन्दमय !
    प्रत्यक्ष देखो कैसा आनन्द है, कैसी शान्ति है ! नेत्रों को बंद करनेपर भी प्रकाश दीखता है हमारे बाहर-भीतर जो चेतनता है यह परमात्माका निराकार स्वरुप है ! वे विज्ञानानन्दघन परमात्मा बहार-भीतर सब जगह परिपूर्ण हो रहे हैं ! मनुष्य हरे रंग का चश्मा चढ़ा लेता  है तो सारा संसार हरा दिखने लग जाता है ! आप इसी प्रकार बुद्धि पर हरिके रंगका चश्मा चढ़ा लें तो सारा संसार हरिमय दीखने लगेगा !
   यह तो मान्यता की बात है और जब वास्तव में अनुभव हो जाता है तब तो प्रत्यक्ष परमात्मा दीखने लग जाते हैं, फिर कण-कण में परमात्मा का दर्शन होता है ! कोई भी जगह खाली नहीं जहाँ वह न दिखें !
 
  गम्भीरतासे विचारने पर सारे   आभूषण स्वर्ण है ! इसी प्रकार गंभीरतापूर्वक विचारने से सब जगह परमात्मा दीखने लग जाते हैं ! वे परमात्मा ही नाना रूपोंमें लीला कर रहे हैं !
  
            नारायण       नारायण    नारायण
 आनन्दमय पूर्ण आनन्द नित्य आनन्द ही आनन्द
  शान्ति शान्ति शान्ति