※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रभाव


!! ॐ श्री परमात्मने नमः !!

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* गीतोपदेश का आरम्भ और पर्यवसान *

गीता के मुख्य उपदेश का आरम्भ अशोच्यानन्शोस्त्वम् आदि श्लोक से हुआ है | इसी से लोग इसे गीता का बीज कहते हैं, परन्तु कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः’ (|७) आदि श्लोक भी बीज कहा गया है; क्योंकि अर्जुन के भगवत्-शरण होने के कारण ही भगवान् द्वारा  यह गीतोपनिषद् कहा गया | गीता का पर्यवसान समाप्ति शरणागति में है | यथा

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणम् व्रज |
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः || (गीता १८|६६)

सर्व धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्मों के आश्रय को त्यागकर केवल एक मुझ सच्चिदानंदघन वासुदेव परमात्मा की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो, मैं तुझको सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर |’

प्रश्न भगवान अर्जुन को क्या सिखलाना चाहते थे ?
उत्तर तत्त्व और प्रभाव सहित भक्ति प्रधान कर्मयोग |

प्रश्न गीता में प्रधानत: धारण करने योग्य विषय कितने हैं ?
उत्तर भक्ति, कर्म, ध्यान और ज्ञानयोग | ये चारों विषय दोनों निष्ठाओं (सांख्य और कर्म ) के अंतर्गत है |

प्रश्न गीता के अनुसार परमात्मा को प्राप्त हुए सिद्ध पुरुषों के प्राय: सम्पूर्ण लक्षणों का, माला की मणियों के सूत्र की तरह आधार रूप लक्षण क्या है ?
उत्तर – ‘समता

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः |
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः || (गीता ५|१९)

‘जिनका मन समत्व भाव में स्थित है ; उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया अर्थात् वे जीते हुए ही संसार से मुक्त हैं, क्योंकि सच्चिदानंदघन परमात्मा निर्दोष और सम हैं, इससे वे सच्चिदानंदघन परमात्मा में स्थित है |
मान-अपमान, सुख-दुःख, मित्र-शत्रु और ब्राह्मण-चंडाल आदि में जिनकी समबुद्धि है, गीता की दृष्टि से वे ही ज्ञानी हैं |'.....शेष अगले ब्लॉग में    

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

जयदयाल गोयन्दका, तत्व-चिंतामणि, कोड ६८३, गीताप्रेस गोरखपुर