※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

देश के कल्याण के लिए संस्कृत, आयुर्वेद, हिंदी तथा गीता-रामायण के प्रचार की आवश्यकता


|| श्री हरी ||

देश के कल्याण के लिए संस्कृत, आयुर्वेद, हिंदी तथा गीता-रामायण के प्रचार की आवश्यकता

संस्कृत – भाषा


वर्तमान काल में इस देश में संस्कृत-भाषा का दिनोदिन हास होता जा रहा है | इसी क्रम में हास होता गया तो एक दिन हमारे देश में संस्कृत-भाषा का लुप्त प्राय हो जाना भी कोई बड़ी बात नहीं है | पांडवो के राज्य शासन के समय तक तो उस भाषा का बहुत अधिक प्रचार था | निति, धर्म और अध्यात्मविषयक सभी ग्रन्थ संस्कृत-भाषा में ही थे और यही धर्म भाषा थी; क्योकि राजनीतिक कार्य तथा दंड विधान आदि सब मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति आदि स्मृतियो के आधार पर ही किये जाते थे | कानून में अब भी कुछ रूप में इन्ही स्मृतियो के आधार पर दायभाग और दंडविधान किया जाता है | नीति, धर्म और अध्यात्मविषयक साहित्य को देखने से मालूम होता है की संस्कृत भाषा सारे भारत में व्यापक रूप से प्रचलित थी, उसी के प्रताप से इसके सभी प्रान्तो के कोने-कोने में अभ भी संस्कृत-भाषा मिलती है | भारतवर्ष में कोई भी ऐसा प्रान्त और जिला नहीं, जहा संस्कृत भाषा न पायी जाती हो | संस्कृत के जानने वाला कोई भी पंडित कही भी चला जाये, उसे संस्कृत में बात करने वाला कोई-न-कोई मिल ही जाता है एवं भारत के किसी भी प्रान्त में चले जाईये – श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराण एक ही मिलेंगे, कही विशेष भेद नहीं मिलेगा | इससे हमारी संस्कृतभाषा और धार्मिक ग्रंथो की अनादिता, व्यापकता और उपादेयता सिद्ध होती है | इस संस्कृत भाषा के पूर्व की कोई अन्य भाषा या श्रुति, स्मृति, इतिहास-पुराण के पहले का कोई भी धार्मिक ग्रन्थ और संस्कृत वर्णमाला के पूर्व की कोई अन्य वर्णमाला देखने-सुनने में नहीं आती, इससे भी इसकी अनादिता सिद्ध होती है | बौध्हयुग में धार्मिक विरोध के नाते संस्कृत पर प्रहार हुए, फिर भी सम्राट विर्क्रमादित्य और राजा भोज के समय में संस्कृत का बड़ा अच्छा प्रचार रहा | उसके बाद भी कुछ संस्कृत-प्रसार रहा,किन्तु फिर मुसलमानी शासन में संस्कृत भाषा का पर्याप्त हास हुआ |

सुना जाता है की वेदों की कुल ११३१ शाखाये थी, जिनमे अब लगभग १२ ही मिलती है | सामवेद की १०००   शाखाओ में केवल लगभग १२ ही मिलती है | यही दशा वेद के ब्राह्मण, आरण्यक, कल्पसूत्रादी की तथा वेदांग एवं अन्यान्य  धर्मग्रंथो की है | इन सब वैदिक शाखाओ तथा अन्यान्य धर्मग्रन्थो का इतना हाश कैसे हुआ? इसपर नि:संदेह यह कहा जा सकता है की वैदिक धर्म की विरोधियो तथा विदेशी अत्याचारियो के द्वारा ही हमारी यह सारी अमूल्य  ग्रन्थ-सम्पति नष्ट कर दी गयी | कहा जाता है की उज्जैन के राजा मतादित्य ने हजारो ब्राह्मणों की तमाम पुस्तकों को जलवा दिया था | बौधौ के द्वारा ‘सहाद्रिखंड’ (पुस्तकालय) का नाश किया जाना प्रसिद्द है | मुसलमानों नें अलेक्ज़ेन्ड्रिया के पुस्तकालय को जला दिया था | महमूद और नादिरसाह ने भी संस्कृत के अगणित धर्मग्रंथो का नाश किया | कुछ मुसलमान बादशाहों ने  तो संस्कृत की पुस्तकों को ‘हमाम’ गरम करने के लिए जलाया था | इस प्रकार हमारे इस अमूल्य ज्ञानकोष को ध्वंस कर दिया गया | यों पहले तो इसका अत्याचारियो ने नाश किया, पर उसमे तो हम निरुपाय थे,किन्तु बड़े खेद की बात है की अब बचे-खुचे को हम अवहेलना तथा मुर्खता से नाश कर रहे है |

 परन्तु इसको बचाना हमारा परम कर्तव्य है | संस्कृत-भाषा के बचने से ही धर्म भी बचेगा; क्योकि हमारे जितने भी मूल धार्मिक ग्रन्थ है, उनका आधार संस्कृत-भाषा ही है और यह संस्कृत-भाषा कितनी प्रांजल और मधुर है, इसका तत्व इस अमृतमय भाषा का आस्वादन करने वाले विद्वान ही जानते है | संस्कृत का व्याकरण भी अलोकिक है | जगत की किसी भी भाषा का वैसा सर्वांगपूर्ण व्याकरण देखने में नहीं आता |

इस प्रकार के संस्कृत-भाषा रुपी अलोकिक रत्न का यदि हमारे भारतवर्ष में अभाव में जायेगा तो पुन: इसका प्रादुर्भाव होना बहुत कठिन होगा | अत: सरकार से और देशवासियो से प्रार्थना है की जिस प्रकार यह संस्कृत-भाषा जीवित रहे, इसका उतरोतर अधिक प्रचार हो और यह सर्वागीण समृधि को प्राप्त हो, इसके लिखे सभी को शक्ति-यत्न अनुसार प्रयत्न करना चाहिए |

नारायण    नारायण    नारायण

ब्रह्मलीन परम श्रधेय श्री जयदयालजी गोयन्दका

कल्याण अंक वर्ष ८५, संख्या ९, पन्ना न० ८७६, गीताप्रेस, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश २७३००५