※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

गुरुवार, 31 जनवरी 2013

गीता की बात का मूल्य है | -2-




|| श्री हरी ||
आज की शुभ तिथि – पंचांग
माघ कृष्ण, चतुर्थी, गुरूवार, वि० स० २०६९
गत बलॉग से आगे....
गत ब्लॉग से आगे.....बहुत-सी स्त्रियाँ गुरु बनाती हैं, कंठी बंधवाती हैं | खूब ध्यान देने की बात है, जो कंठी लिए फिरते हैं, कहते हैं इसे बाँध लो तुम्हारा कल्याण हो जाएगा | समझना चाहिये कि मैं जिन्हें पाखण्डी समझता हूँ उनका वही चिह्न है | कंठी बँधवाकर उन्हें कुछ देना मूर्खता है, यदि उनकी कंठी में कुछ चमत्कार होता तो क्या वे कंठी लेकर इस तरह घूमते | उनकी तो वह दशा होगी जो मैं वेश्या और भाँड़ की बात कहा करता हूँ | एक वेश्या ने एक ब्राह्मण को भोजन के लिए निमंत्रण दिया | ब्राह्मण ने पूछातू कौन है | वेश्या ने कहामैं खत्राणी हूँ | उसे भोजन कराकर उसने आकाश की ओर देखा |ब्राह्मण ने कहाक्या देखती ? उसने कहाएक ब्राह्मण को भोजन कराने से आकाश से विमान आता है, आप ब्राह्मण तो हैं न | उसने कहा
तू खत्राणी मैं पांडिया तू वेश्या मैं भाँड़ |
तेरे जिमाये मेरे जीमे पत्थर पड़सी राँड़ ||
इसलिए माता, बहनों से प्रार्थना है कि उनके लिए एक नंबर बात यह है कि पति ही उनके लिए साक्षात् ईश्वर है | उनका धर्म केवल पति की सेवा करना ही है | जो पति को छोड़कर दूसरे को गुरु बनाती है वह तो व्यभिचारिणी है | यदि गुरु बनाना ही हो तो परमात्मा को बनाए | चेली बनानेवाला और जो चेली बनती हैदोनों ही नरक में गिरेंगे | उसका एक नंबर गुरु तो पति है, दो नंबर जो पति के पूज्य माता-पितादि हैं वे पूज्य हैं, तीन नंबर में ईश्वर हैं | दूसरे पुरुष को यदि गुरु बना ले तो भगवान् का क्या दोष |उनके यहाँ सम्भवतः यह कानून होगा कि कोई पाप करे तो उसे रोकना नहीं है | राजाओं के राज्य में तो यह कानून है कि कोई विद्रोही हो, उसको रोक दे, किन्तु भगवान् के यहाँ यह कानून नहीं है, यदि कहो यह कानून तो बनाना चाहिए था | ठीक है हमारी सलाह लेते तो मैं यही कहता |
उनका कानून नहीं बदलता, क्योंकि वे सर्वज्ञ हैं | प्रकरण तो प्रेम का था उसमें यह विषय आ गया | जो अपनी बागडोर भगवान् के हाथ में सौप दे, उसके लिए यह कानून है कि यदि वह पाप करे तो भगवान् उसे रोक सकते हैं |सूत्रधार कठपुतली को नचाता है | उसी तरह नाचती है उस कठपुतली की तरह कोई बन जाय तो भगवान् उसकी बागडोर सँभालने के लिए तैयार हैं | अपने दस इन्द्रियाँ और एक मन है | इन ग्यारह घोड़ों की डोर भगवान् को पकड़ा दो, भगवान् कहते हैं
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज|
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः || (गीता १८|६६)
सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् कर्तव्य-कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा | मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर |’
यह घोषणा केवल अर्जुन के लिए नहीं है, अपितु सबके लिए है | अर्जुन से भगवान् ने फिर पूछा | उन्होंने उत्तर दिया— ‘करिष्ये वचनं तव’ |
कठपुतली और छाया का उदाहरण स्त्री के लिए दिया जा सकता है | स्त्री को पति की छाया बनना चाहिए | विवाह के समय यह प्रतिज्ञा होती है कि तू यदि पतिव्रत धर्म को स्वीकार करे तो मैं तुझे स्वीकार करूँ, इसी प्रकार पति भी स्वीकार करता है, किन्तु उस प्रतिज्ञा का पालन नहीं करते, इसलिए दुर्दशा होती है | जो मेरे मन के अनुसार चले उसके लिए मेरी भगवान् से प्रार्थना है कि पहले उसका कल्याण हो, मेरा बाद में हो | मैं तो खुशामद करता हूँ, इकरार करता हूँ कि मेरे मन के अनुसार कोई चले | इस बात का विरोध करता हूँ कि कोई मेरे शरीर की पूजा करे, मेरी बात की ओर ध्यान ही नहीं दे | मेरा उच्छिष्ट,मेरे चरणों की धूलि ले, मैं इस बात का विरोधी हूँ | जो स्वयं भी इस बात का विरोधी हो, वही मेरे मन के अनुकूल चलनेवाला है |
गीता का अनुवाद गीता-तत्त्वांक(तत्त्वविवेचनी) है | भगवान् ने कहा है जो मेरे गीताशास्त्र का प्रचार करता है उसके समान मेरा प्रिय कार्य करनेवाला कोई नहीं है | इसी प्रकार मैं भी कहता हूँ कि जो गीता-तत्त्वांक का प्रचार करता है उसके समान मुझे कोई भी प्यारा नहीं है | वह भगवान् का और मेरा दोनों का ही प्यारा है, क्योंकि वह भगवान् की ही बात है |भगवान् ने यह बात कही है
सोइ सेवक प्रियतम मम होई | मम अनुसासन मानै जोई ||
मैं यह बात कहता हूँ कि मेरी प्रार्थना के अनुसार कोई भी चले तो मैं उसका ऋणी हूँ | इसलिए भगवान् से मैं प्रार्थना करता हूँ कि मुझे ऋण से मुक्त करना, फिर गुंजाइश हो तो मेरा उद्धार करना| इस बात से मुझे लज्जा नहीं आती, चाहे समाचारपत्र में छाप दो |
यदि मैं आपको जूठन खिलाऊं, अपना पैर पुजवाऊं तो वह तो मेरे लिए कलंक है | मुझे यह विश्वास है कि गीता के अनुसार कोई चले तो उसके उद्धार होने में कोई संदेह नहीं है |
नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण!!! नारायण !!!
जयदयाल गोयन्दका सेठजी ,’जीवन-सुधार की बातेंपुस्तक कोड १५८७ , गीताप्रेस गोरखपुर