※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

स्वार्थ रहित व्यवहार -5-


|| श्री हरी ||

आज की शुभ तिथि – पंचांग

माघ शुक्ल, एकादशी, गुरूवार, वि० स० २०६९

 
गत ब्लॉग से आगे.....एक बार बनवास में पाण्डव जल के अभाव में व्याकुल हो गए | महाराज युधिस्टर ने क्रमश: चारो भाईओ को जल लाने के लिए भेजा | सरोवर पर एक यक्ष था | उसने उनसे प्रश्न किया किन्तु उन लोगो ने उसकी अवहेलना करके जल लेने का प्रयास किया एवं यक्ष की माया से मृत हो गए | अन्त में भाइयों के न लौटने पर महाराज युधिस्टर सरोवर पर गए एवं यक्ष के प्रश्नों का उत्तर देकर उसे संतुस्ट किया | यक्ष ने प्रसन्न होकर महाराज से कहा की मैं आपके उत्तर से संतुस्ट हूँ और आपके एक भाई को जीवित कर सकता हूँ | युधिस्टर जी ने कहा की यदि आप एक को ही जीवित करना चाहते है तो नकुल को जीवित कर दे | यक्ष ने कहा भीम और अर्जुन जिनकी सहायता से तुम दुर्योधन को जीत सकते हो, उन्हें छोड़ कर तुम नकुल को क्यों जीवित करना चाहते है ?  मैं तुम्हे सावधान करके पुन: विचार करने का अवसर देता हूँ | युधिस्टर ने कहा  मैं माता कुन्ती का पुत्र हूँ, नकुल के जीवित रहने से मेरी माता माद्री की सन्तति भी कायम रहेगी, अत: आप नकुल को जीवित कर दे | यक्ष उनके भाव को देख कर प्रसन्न हो गया और चारों भाइयोंको जीवित कर दिया |

माताओं से यही कहना है की ऐसा व्यवहार करना चाहिये | कुन्ती देवी ने कितना
उपकार किया, ब्राह्मण परिवार की रक्षा के लिये अपने लड़के भीम को राक्षस के सामने
मरने के लियें भेज दिया | सोचना चाहिये, आज हमारे यहाँ कोई प्लेग की बीमारी आ
जाती है तो वहाँ कोई सोना भी नहीं चाहता | कुन्ती जैसी स्त्री और माता कोई ही होगी
जो ऐसे काम के लिए उत्साह दिलाये | सम्पति में तो सभी शामिल हो जाते हैं | विपत्ति
में शामिल होने में ही विशेषता है |आपति में शामिल होनेवाले को ही भगवान याद
करते है | माताओं को देवी कुन्ती का और हम लोगो को महाराज युधिस्टर का अनुकरण
करना चाहिये ||.....शेष अगले ब्लॉग में


श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन की आवश्यकता पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर           


नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!