※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

बुधवार, 22 मई 2013

ध्यानावस्था में प्रभु से वार्तालाप -४-


|| श्रीहरिः ||

आज की शुभतिथि-पंचांग

वैशाख शुक्ल, द्वादशी, बुधवार, वि० स० २०७०

 

  गत ब्लॉग से आगे...साधक-विरह की व्याकुलता से निराशा भी तो हो सकती है ?

भगवान-कह ही चुका हूँ की ऐसे पुरुषों के लिए फिर दर्शन देने की आवश्यकता ही क्या है?

साधक-फिर ऐसे पुरुषों को आपके दर्शन के लिए क्या करना चाहिये ?

भगवान-जिस किसी प्रकार से मुझमे श्रद्धा और प्रेम की वृद्धि हो ऐसी कोशिश करनी चाहिये |

साधक-क्या बिना श्रद्धा और प्रेम के दर्शन हो ही नहीं सकते |

भगवान-हाँ ! नहीं हो सकते यह नीति है |

साधक-क्या आप रियायत नहीं कर सकते ?

भगवान-किसी पर रियायत की जाय और किसी पर नहीं की जाय तो विषमता का दोष आता है | सब पर रियायत हो नहीं सकती |

साधक-क्या ऐसी रियायत कभी हो भी सकती है ?

भगवान-हाँ, अन्तकाल के लिए ऐसी रियायत है | उस समय बिना श्रद्धा और प्रेम के भी केवल मेरा स्मरण करनेसे ही मेरी प्राप्ति हो जाती है |

साधक-फिर उसके लिए भी यह विशेष रियायत क्यों रखी गयी है ?

भगवान-उसका जीवन समाप्त हो रहा है | सदा के वास्ते वह इस मनुष्य-शरीर का त्याग कर रहा है | इसलिए उसके वास्ते यह खास रियायत रखी गयी है |

साधक-यह तो उचित ही है की अन्तकाल के लिए यह विशेष रियायत रखी गयी है | क्नितु अन्त समय में मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ अपने काबू में नहीं रहते; अतएव उस समय आपका स्मरण करना भी वश की बात नहीं है |

भगवान-इसके लिए सर्वदा मेरा स्मरण रखने का अभ्यास करना चाहिये | जो ऐसा अभ्यास करेगा उसको मेरी स्मृति अवश्य होगी |....शेष अगले ब्लॉग में .    

श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्त्वचिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर, उत्तरप्रदेश , भारत  

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!