※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

रविवार, 26 मई 2013

ध्यानावस्था में प्रभु से वार्तालाप -८-


        || श्रीहरिः ||

आज की शुभतिथि-पंचांग

ज्येष्ठ कृष्ण, प्रतिपदा, रविवार, वि० स० २०७०

 

  गत ब्लॉग से आगे...साधक-कोशिश तो खूब करता हूँ, किन्तु मन के आगे मेरी कुछ चलती नहीं |

भगवान-खूब कोशिश करता हूँ यह मानना गलत है | कोशिश थोड़ी करते हो और उसको मान बहुत लेते हों |

साधक-इसके सुधारने के लिए मैं विशेष कोशिश करूँगा; किन्तु शरीर में और सांसारिक विषयों में आसक्ति रहने तथा मन चन्चल होने के कारण आपकी दया बिना पूर्णतया शरण होना बहुत कठिन प्रतीत होता है |

भगवान-कठिन मानते हो इसलिए कठिन प्रतीत हो रहा है | वास्तव में कठिन है नहीं |

साधक-कैसे न कठिन मानूँ? मुझे तो ऐसा प्रयत्क्ष प्रतीत होता है |

भगवान-ठीक मालूम हो तो होता रहे, किन्तु तुम्हे हमारी बात की और ध्यान देना चाहिये |

साधक-आज से आपकी दयापर भरोसा रखकर कोशिश करूँगा जिससे वह मुझे कठिन भी मालूम न पड़े | किन्तु सुना है की आपके थोड़े-से भी नाम-जप तथा ध्यान से सब पापों का नाश हो जाता है | शास्त्र और आप भी ऐसा ही कहते है, फिर वृतियाँ मलिन होने का क्या कारण है ? थोडा-सा भजन-ध्यान तो मेरे द्वारा भी होता ही होगा |

भगवान-भजन-ध्यान से सब पापों का नाश होता है यह सत्य है किन्तु इसमें कोई विश्वाश करे तब न | तुम्हारा भी तो इसमें पूरा विश्वास नहीं है, क्योकि तुम मान रहे हों की पापों का नाश नहीं हुआ है | वे अभी वैसे ही पड़े है |

साधक-विश्वास न होने में क्या कारण है ?

भगवान-नीच* और नास्तिकों# का संग, सन्च्चित पाप और दुर्गुण |

 * झूठ, कपट, चोरी, जारी, हिंसा आदि शास्त्रविपरीत कर्म करने वालों को नीच कहते है |

# ईश्वर को तथा श्रुति, स्मृति आदि शास्त्रको न मानेवाले को नास्तिक कहते है |      

साधक-पाप और दुर्गुण क्या अलग-अलग वस्तु है ?

भगवान-चोरी, जारी, झूठ, हिंसा और दम्भ-पाखंड आदि पाप है तथा राग, द्वेष, काम, ल्रोध, दर्पऔर अहंकार आदि दुर्गुण है |

साधक-इन सबका नाश कैसे हो?

भगवान-इनके नाश के लिए निष्काम भाव से भजन, ध्यान, सेवा और सत्संग आदि करना ही सबसे बढकर उपाय है |

साधक-सुना है वैराग्य होने से राग-द्वेषादी दोषों का नाश हो जाता है और उससे भजन-ध्यान का साधन भी अच्छा होता है |

भगवान-ठीक है ! वैराग्यसे भजन-धयन का संग्रह बढ़ता है | किन्तु अंत:करण शुद्ध हुए बिना दृढ वैराग्य भी तो नहीं होता | यदि कहो तो शरीर और संसारिक भोगों में दुःख और दोषबुद्धि करने से भी वैराग्य हो सकता है, सो ठीक है | पर यह वृति भी उपर्युक्त साधनों से ही होती है | अतएव भजन, ध्यान, सेवा और सत्संग आदि करने की प्राणपर्यन्त चेष्टा करनी चाहिये |....शेष अगले ब्लॉग में .    

श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्त्वचिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर, उत्तरप्रदेश , भारत  

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!