※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

बुधवार, 29 मई 2013

ध्यानावस्था में प्रभु से वार्तालाप -११-


|| श्रीहरिः ||

आज की शुभतिथि-पंचांग

ज्येष्ठ कृष्ण, पन्चमी, बुधवार, वि० स० २०७०

 

  गत ब्लॉग से आगे...साधक-यदि मन ही चाहने लगे तो फिर आपसे प्रार्थना ही क्यों करू ? मन नहीं चाहता इसलिये तो आपकी आपकी मदद चाहता हूँ |

भगवान-मेरी आज्ञाओ के पालन करने में तत्पर रहने से ही मेरी पूरी मदद मिलती है | यह विश्वास रखों की इसमें तत्पर होने में कठिन-से-कठिन भी काम सहज में हो सकता है |

साधक-भगवन् ! आप जैसा कहते है वैसा ही करूंगा, किन्तु होगा सब आपकी कृपा से ही | मैं तो निमितमात्र हूँ | इसलिए आपकी यह आज्ञा मानकर अब विशेष रूप से कोशिश करूँगा, मुझे निमित बनाकर जो कुछ करा लेना है, सो करा लीजिये |

भगवान-ऐसा मान लेने में तुम्हारे में कही हरामीपन न आ जाय |

साधक-भगवन् ! क्या आपसे मदद माँगना भी हरामीपन है |

भगवान-मदद तो मागता रहें, किन्तु काम करने में जी चुराता रहे और आज्ञापालन करे नहीं, इसी का नाम हरामीपन है | मैंने जो कुछ बतलाया है मुझमे चित लगा कर वैसा ही करते रहों | आगे-पीछे का कुछ भी चिन्तन मत करों | जो कुछ हो प्रसन्नतापूर्वक देखते रहो | इसी का नाम शरणागति है ! विश्वास रखों की इस प्रकार शरण होने से सब कार्यों की सिद्धि हो सकती है |

साधक-विश्वास तो करता हूँ किन्तु आतुरता के कारण भूल हो जाती है और परमशांति तथा परमानन्द ही प्राप्ति की और लक्ष्य चला जाता है |

भगवान-जैसे कार्य के फल की और देखते हो वैसे कार्य की तरफ क्यों नहीं देखते  ? मेरी आज्ञा के अनुसार कार्य करने से ही मेरे में श्रद्धा और प्रेम की वृद्धि होकर मेरी प्राप्ति होती है |

साधक-किन्तु प्रभो ! आपमें श्रद्धा और प्रेम के हुए बिना आज्ञा का पालन भी तो नहीं हो सकता |

भगवान-जितनी श्रद्धा और प्रेम से मेरी आज्ञा का पालन हो सके उतनी श्रद्धा और प्रेम तो तुममे है ही |....शेष अगले ब्लॉग में .    

श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्त्वचिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर, उत्तरप्रदेश , भारत  

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!