※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

बुधवार, 16 अक्तूबर 2013

भगवान की दया -६-


      ।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

आश्विन शुक्ल, त्रयोदशी, बुधवार, वि० स० २०७०

 

गत ब्लॉग से आगे ...  हम जब परमात्मा की दया पर विचार करते है तो हमे पद-पद पर परमात्मा की दया के दर्शन होते है । प्रथम तो परमेश्वर के नियमों की और ही देखिये, वे कितनी दया से भरे है । कोई जीव कैसे भी पापी क्यों न हो, अनेक त्रिर्यकयोनियों के भोगने पर उसको भी अंत में परमात्मा मनुष्य का शरीर देते है । यदि उसके पापों की और ध्यान दिया जाये तो उसे मनुष्य का शरीर मिलने की बहुत ही कम गुंजाईश रह जाती है । परन्तु यह उस परमात्मा का हेतु रहित परम दया का ही कार्य है जो पुन: उसको मनुष्य-शरीर देकर सुधार का मौका देता है ।
गोसाईं जी कहते है

आकर चारि लच्छ चौरासी । जोनी भ्रमत यह जिव अबिनाशी ।।
कबहुँक करि करुना नर  देहि  । देत ईस बिन हेतु स्नेही ।।

दूसरा कानून है, कोई कैसा भी पापी क्यूँ न हो, जब वह भगवान की शरण हो जाता है अर्थात सम्पूर्ण पापों को छोड़ कर भगवान् के अनुकूल बन जाता है तो भगवान उसके पिछले सारे पाप नाश करके उसे तत्काल मुक्तिपद दे देते है ।

भगवान श्री राम कहते है

सकृदेव प्रपत्राय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतत्द्वं मम ।। (वा० रा० ६।१८।३३)

तीसरा कायदा है कि एक साधारण-से- साधारण मनुष्य भी परमात्मा को प्रेम से भजता है, तो परमेश्वर भी उसको उसि प्रकार भजते है । ‘ये यथां मां प्रप्ध्यन्ते तात्स्तेव भ्जामयं ।’ (गीता ४।११) इतना ही नहीं, परमेश्वर के भजन के प्रताप से उसके पूर्व के किये हुए सब पापों का नाश हो जाता है और वह शीघ्र ही परम धर्मात्मा बनकर दुर्लभ परम गति को प्राप्त होता है ।
भगवान श्री कृष्ण के वचन है :-

अपि चेतसुदुराचारो भजते मांमनन्यभाक ।
साधुरेव स मन्तव्य: समयगव्यवसितो हि स ।।

क्षिप्र भवति धर्मात्मा सश्र्वछान्ति निगछति ।
कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति ।। (गीता ९।३०-३१)

जो परमेश्वर कि भक्ति करता है, उसकी वे सब प्रकार से रक्षा और सहायता करते है एवं उचित बुद्धि देकर इस असार संसार से उसका उद्धार कर देते है । शेष अगले ब्लॉग में.       

श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्त्वचिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर
नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!