※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

पाप और पुण्य


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

पौष कृष्ण, दशमी, शुक्रवार, वि० स० २०७०

 
पाप और पुण्य
 

प्रश्न  (क)  पुण्य और पाप क्या हैं ?

उत्तर (क) यदपि पाप-पुण्य का विषय बहुत गंभीर है तथा इसका दायरा बहुत विस्तृत है तथापि संक्षेप में साररूप यही कहा जा सकता है का
‘मानव-कर्तव्य ही पुण्य या सुकृत है और अकर्तव्य ही पाप या दुष्कृत है |’

 
प्रश्न  (ख) जो मनुष्य ईश्वर और किसी धर्मशास्त्र पर विश्वास नहीं करता,वह शास्त्रीय विधि-निषेध को तो पुण्य-पाप मानता नहीं, फिर उसके लिये पाप-पुण्य की व्यवस्था किस प्रकार हो सकती है ?

उत्तर (ख) पुण्य-पाप अथवा कर्तव्य-अकर्तव्य के निर्णय में शास्त्र (धर्मग्रंथ) ही प्रमाण है , इसलिए श्रीभगवान ने अर्जुन से कहा की ‘तेरे लिए इस  कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है, ऐसा जान कर तुझे शास्त्र-विधि से नियत किये हुए कर्म ही करने चाहिये |’ (गीता १६|२४)

परन्तु जिस मनुष्य का इश्वर और शास्त्र में विश्वास नहीं है, शास्त्र की व्यवस्था न मानने पर भी, उसके लिए भी मानव-कर्तव्य ही पुण्य है और अकर्तव्य ही पाप है |

अब यह प्रश्न आता है की शास्त्र को न मानने वाला मनुष्य कर्तव्य और अकर्तव्य का निर्णय किस प्रकार करे ? इसका उत्तर यह है की उसे प्राचीन और वर्तमान महापुरुषों के किये हुए निर्णय और आचरण को प्रमाण मानकर अपने कर्तव्याकर्तव्य का निश्चय करना चाहिये |      

श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, भगवत्प्राप्ति के विविध उपाय, कोड ३०९, गीताप्रेस गोरखपुर, उत्तरप्रदेश , भारत  

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!