※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

शनिवार, 24 मई 2014

गीताप्रेस के संस्थापक-विशिष्ट सहयोगी-२९-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

ज्येष्ठ कृष्ण, एकादशी, शनिवार,  वि० स० २०७१

गीताप्रेस के संस्थापक-विशिष्ट सहयोगी-२९-

 

भाईजी ने सेठजी के प्रति महापुरुष वन्दन शीर्षक से एक पद और तैयार किया जो बड़ा ही भावपूर्ण है-

सर्व-शिरोमणि विश्व-सभा के, आत्मोपम विश्वम्भरके ।

विजयी नायक जग-नायक के, सच्चे सुहृद चराचर के ।।

सुखद सुधा-निधि साधु कुमुद के, भास्कर भक्त-कमल-वनके ।

आश्रय दीनो के, प्रकाश पथिकों के, अवलम्बन जन के ।।

लोभी जग-हित के, त्यागी सब जगत के, भोगी भूमा के ।

मोहि निर्मोही के, प्यारे जीवन बोधमयी माँ के ।।

तत्पर परम हरण पर-दुःख के, तत्परता-विहीन तनके ।

चतुर खिलाडी जग-नाटक के, चिन्तामणि साधक-जन के ।।

सफल मार्ग-दर्शक पथ-भ्रष्टों के, आधार अभागों के ।

विमल विधायक प्रेम-भक्ति के, उच्च भाव के, त्यागो के ।।

परम प्रचारक प्रभु-वाणी के, ज्ञाता गहरे भावों के ।

वक्ता, व्याख्याता, विसुद्ध, उच्छेदक सर्व कुभावों के ।।

पथदर्शक निष्काम-कर्म के, चालक अचल सांख्यपथ के ।

पालक सत्य अहिंसा व्रत के, घालक नित अपूत पथ के ।।

नासक त्रिविध ताप के, पोशाक तप के, तारक भक्तों के ।

हारक पापों के, संजीवन-भेषज विषयाशक्तों के ।।

पावनकर्ता पतितों के, पृथ्वी के, प्रेत, पितृ-गण के ।

भूषण भूमंडल के, दूषण राग-द्वेष रणागण के ।।

रक्षक अतिदृढ सत्य-धर्म के, भक्षक भव-जंजालों के ।

तक्षक भोग-रोग धन-मद के, व्यापारी सत-लालों के ।।

दक्ष दुभाषी जन, जन-धन के, मुखिया राम-दलालों के ।

छिपे हुए अज्ञात लोक-निधि, मालिक असली मालों के ।।

चूडामणि दैवी गुण-गण के, परमादर्श महानों के ।

महिमा-वर्णन में असक्त तव, विद्या-बल विद्वानों के ।।

भाईजी को सेठजी ने जैसिडीह में विष्णुभगवान् के दर्शन करवाये थे । इस पद में उसकी और संकेत मिलता है ।

परम गुरु राममिलावनहार ।

अति उदार मंजुल मंगलमय अभिमत फलदातार ।।

टूटी फूटी नाव पड़ी मम भीषण भाव नद धार ।

जयति जयति जयदेव दयानिधि बेग उतारों पार ।।.. शेष अगले ब्लॉग में       

गीताप्रेस के संस्थापक, गीता के परम प्रचारक, प्रकाशक  श्रीविश्वशान्ति आश्रम, इलाहाबाद

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!