※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

भावना ऊँची-से-ऊँची करनी चाहिये 1


भावना ऊँची-से-ऊँची करनी चाहिये 

भावना ऊँची-से-ऊँची करनी चाहिये कोड- 2027 प्रवचन दिनांक-१२-५-१९५९, गंगेहरकी कुटिया, वटवृक्ष, स्वर्गाश्रम। अपने मनके अनुकूल या प्रतिकूल जो भी घटना होती है, वह अपने लिये भगवान् की मंगलमय विधान है, उसके प्राप्त होनेपर प्रसन्न रहे। प्रभु मंगल करनेवाले हैं, वे अनिष्ट करते ही नहीं।  सत्संग कर रहे हैं, कोई नास्तिक आ जाय और अंट-शंट पूछने लगे तो विघ्न नहीं समझे, उसमें प्रसन्न रहे। यदि विघ्न माने तो नीची श्रेणी है। वह भगवान् का भेजा हुआ है, भगवान् परीक्षा ले रहे हैं। अगर विघ्न मान लिया तो अनुत्तीर्ण हो गये, यदि उसे पुरस्कार मान ले तो पुरस्कार है।  बीमारी आती है तो चिकित्सा करनी चाहिये। जैसे प्यास लगती है तो जल पीनेसे प्यास दूर होती है, इसी तरह औषधि लेनेसे रोग दूर होने लगे तो प्रसन्न नहीं होना चाहिये। यदि रोग बढ़ता है तो दुखी नहीं होना चाहिये। कोई द्वेष भावना आ जाय तो चुप हो जाना चाहिये। मन के अनुकूल में उतनी शिक्षा नहीं है, जितनी प्रतिकूलमें मिलती है। प्रतिकूलतामें द्वेष, क्रोध, स्पर्धा आदि नहीं हों तो यह उत्तम बात है।  क्रोध का अवसर आपके नहीं आया और आपको क्रोध नहीं हुआ तो उससे क्या पता चले कि क्रोध जीता गया है या नहीं, क्रोध की स्थिति आनेपर क्रोध नहीं हो तब पता चले। भगवान् की दया को इतनी छोटी बना दी कि स्त्री, पुत्र, धन में ही दया मान ली। यह आत्मकल्याण करनेवाली नहीं है, इनमें समता रहनी चाहिये। यदि इनमें ही दया मान ली तो डूब जाता है। भगवान् की  दया सकाम भाव से मान ले तो नीचे गिरने की सम्भावना है। प्रतिकूल में दया माने तो ऊँचा उठाने वाली है। रोग आये तो भगवान् चेताते हैं कि मृत्यु आने वाली है, भगवान् सावधान करते हैं। रोग पाप का फल है निश्चिन्त होकर कैसे सो रहा है। यदि उस रोग को परम तप मान ले तो वह पाप तप हो जाता है। मैं जब अस्वस्थ हुआ, तब मैंने शरीरमें खोजा, किन्तु वहाँ भोक्ता नहीं मिला। प्रश्न-भगवत्प्राप्ति शीघ्र कैसे हो ? उत्तर-भगवान कहते हैं— यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ (गीता ६ । ३०) जो पुरुष सम्पूर्ण भूतोंमें सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतोंको मुझ वासुदेव अन्तर्गत देखता है उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।  जब भगवान कहते हैं तो मान ही लेना चाहिये। नहीं मानते है तो भगवान वचनोंमें विश्वास कहाँ है? आश्चर्य करना चाहिये कि ऐसा क्यों नहीं होता है। वैराग्य की तीव्रता राग-द्वेषको खा जाती है। समता उसका फल है। सार बात बतलाता हूँ।  पहली बात-भक्ति या ज्ञानके नशेमें चूर रहे। यह पता ही नहीं रहे कि संसार में क्या हो रहा है?  दूसरी बात- भगवान् का हृदय पुष्प से भी बढ़कर कोमल है और वज्रसे भी बढ़कर कठोर है। श्रद्धालुओं के लिये वज्रसे भी बढ़कर कठोर है और श्रद्धालुके लिये कोमल है। भगवान जब अवतार लेते हैं तब ये कार्य करते हैं— परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (गीता ४। ८)  साधु पुरुषोंका उद्धार करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्म की अच्छी तरहसे स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ।  माता, पिता, गुरु आदि की मार में परम लाभ है। भगवान ने महाभारत युद्ध में शस्त्र नहीं लिया, जिससे दुर्योधन आदि की मुक्ति नहीं हुई। जिसकी जैसी भावना होती है उनको भगवान उसी तरहसे दीखते हैं— जाकी रही भावना जैसी । प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥ एक स्त्री है वह शेर, कामी, विरक्त, बच्चे और भक्त सबको अलग-अलग दीखती है। इसी तरह भगवान भी सबको अपनी भावना के अनुसार अलग-अलग दीखते हैं। जैसे भगवान् श्रीकृष्ण चन्द्र जी जब कंस रंगभूमि में मल्ल युद्ध के लिये गये थे तब वहाँ उपस्थित लोगोंको  अपनी-अपनी भावना के अनुसार दीखे— मल्लाना नरवरः स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान् गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वपित्रोः शिशुः। मृत्यु भोजपतेर्विराड विदुषां तत्त्वं परं योगिनां वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रंगं गतः साग्रजः॥ (श्रीमद्भागवत महापुराण १०। ४३ । १७)  जिस समय भगवान श्री कृष्ण बलराम जी के साथ रंगभूमि में पधारे, उस समय वे पहलवानोंको को वज्र कठोर शरीर, साधारण मनुष्य को नर-रत्न, स्त्रियों को मूर्तिमान् कामदेव, गोपों को स्वजन, दुष्ट राजाओंको दण्ड देनेवाले शासक, माता-पिता के समान बड़े-बूढ़ों को शिशु, कंस को मृत्यु, अज्ञानियोंको विराट्, योगियों को परम तत्त्व और भक्त शिरोमणि वृष्टिवंशियों को अपने इष्टदेव जान पड़े (सबने अपने-अपने भावानुरूप क्रमशः रौद्र, अद्भुत, शृंगार, हास्य, वीर, वात्सल्य, भयानक, बीभत्स, शान्त और प्रेम भक्ति रस का अनुभव किया)।

अपने मनके अनुकूल या प्रतिकूल जो भी घटना होती है, वह अपने लिये भगवान् की मंगलमय विधान है, उसके प्राप्त होनेपर प्रसन्न रहे। प्रभु मंगल करनेवाले हैं, वे अनिष्ट करते ही नहीं।
सत्संग कर रहे हैं, कोई नास्तिक आ जाय और अंट-शंट पूछने लगे तो विघ्न नहीं समझे, उसमें प्रसन्न रहे। यदि विघ्न माने तो नीची श्रेणी है। वह भगवान् का भेजा हुआ है, भगवान् परीक्षा ले रहे हैं। अगर विघ्न मान लिया तो अनुत्तीर्ण हो गये, यदि उसे पुरस्कार मान ले तो पुरस्कार है।
 बीमारी आती है तो चिकित्सा करनी चाहिये। जैसे प्यास लगती है तो जल पीनेसे प्यास दूर होती है, इसी तरह औषधि लेनेसे रोग दूर होने लगे तो प्रसन्न नहीं होना चाहिये। यदि रोग बढ़ता है तो दुखी नहीं होना चाहिये। कोई द्वेष भावना आ जाय तो चुप हो जाना चाहिये। मन के अनुकूल में उतनी शिक्षा नहीं है, जितनी प्रतिकूलमें मिलती है। प्रतिकूलतामें द्वेष, क्रोध, स्पर्धा आदि नहीं हों तो यह उत्तम बात है।
 क्रोध का अवसर आपके नहीं आया और आपको क्रोध नहीं हुआ तो उससे क्या पता चले कि क्रोध जीता गया है या नहीं, क्रोध की स्थिति आनेपर क्रोध नहीं हो तब पता चले। भगवान् की दया को इतनी छोटी बना दी कि स्त्री, पुत्र, धन में ही दया मान ली। यह आत्मकल्याण करनेवाली नहीं है, इनमें समता रहनी चाहिये। यदि इनमें ही दया मान ली तो डूब जाता है। भगवान् की  दया सकाम भाव से मान ले तो नीचे गिरने की सम्भावना है।
प्रतिकूल में दया माने तो ऊँचा उठाने वाली है। रोग आये तो भगवान् चेताते हैं कि मृत्यु आने वाली है, भगवान् सावधान करते हैं। रोग पाप का फल है निश्चिन्त होकर कैसे सो रहा है। यदि उस रोग को परम तप मान ले तो वह पाप तप हो जाता है। मैं जब अस्वस्थ हुआ, तब मैंने शरीरमें खोजा, किन्तु वहाँ भोक्ता नहीं मिला।
प्रश्न-भगवत्प्राप्ति शीघ्र कैसे हो ?
उत्तर-भगवान कहते हैं—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
(गीता ६ । ३०)
जो पुरुष सम्पूर्ण भूतोंमें सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतोंको मुझ वासुदेव अन्तर्गत देखता है उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।
जब भगवान कहते हैं तो मान ही लेना चाहिये। नहीं मानते है तो भगवान वचनोंमें विश्वास कहाँ है? आश्चर्य करना चाहिये कि ऐसा क्यों नहीं होता है। वैराग्य की तीव्रता राग-द्वेषको खा जाती है। समता उसका फल है। सार बात बतलाता हूँ।
पहली बात-भक्ति या ज्ञानके नशेमें चूर रहे। यह पता ही नहीं रहे कि संसार में क्या हो रहा है?

दूसरी बात- भगवान् का हृदय पुष्प से भी बढ़कर कोमल है और वज्रसे भी बढ़कर कठोर है। श्रद्धालुओं के लिये वज्रसे भी बढ़कर कठोर है और श्रद्धालुके लिये कोमल है। भगवान जब अवतार लेते हैं तब ये कार्य करते हैं—
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
(गीता ४। ८)
साधु पुरुषोंका उद्धार करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्म की अच्छी तरहसे स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ।
माता, पिता, गुरु आदि की मार में परम लाभ है। भगवान ने महाभारत युद्ध में शस्त्र नहीं लिया, जिससे दुर्योधन आदि की मुक्ति नहीं हुई। जिसकी जैसी भावना होती है उनको भगवान उसी तरहसे दीखते हैं—
जाकी रही भावना जैसी । प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥
एक स्त्री है वह शेर, कामी, विरक्त, बच्चे और भक्त सबको अलग-अलग दीखती है। इसी तरह भगवान भी सबको अपनी भावना के अनुसार अलग-अलग दीखते हैं। जैसे भगवान् श्रीकृष्ण चन्द्र जी जब कंस रंगभूमि में मल्ल युद्ध के लिये गये थे तब वहाँ उपस्थित लोगोंको  अपनी-अपनी भावना के अनुसार दीखे—
मल्लाना नरवरः स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान्
गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वपित्रोः शिशुः।
मृत्यु भोजपतेर्विराड विदुषां तत्त्वं परं योगिनां
वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रंगं गतः साग्रजः॥
(श्रीमद्भागवत महापुराण १०। ४३ । १७)
 जिस समय भगवान श्री कृष्ण बलराम जी के साथ रंगभूमि में पधारे, उस समय वे पहलवानोंको को वज्र कठोर शरीर, साधारण मनुष्य को नर-रत्न, स्त्रियों को मूर्तिमान् कामदेव, गोपों को स्वजन, दुष्ट राजाओंको दण्ड देनेवाले शासक, माता-पिता के समान बड़े-बूढ़ों को शिशु, कंस को मृत्यु, अज्ञानियोंको विराट्, योगियों को परम तत्त्व और भक्त शिरोमणि वृष्टिवंशियों को अपने इष्टदेव जान पड़े (सबने अपने-अपने भावानुरूप क्रमशः रौद्र, अद्भुत, शृंगार, हास्य, वीर, वात्सल्य, भयानक, बीभत्स, शान्त और प्रेम भक्ति रस का अनुभव किया)।

- श्री जयदयाल जी गोयन्दका -सेठजी 
पुस्तक- भगवत्प्राप्ति की अमूल्य बातें , कोड-2027, गीताप्रेस गोरखपुर  

शनिवार, 23 फ़रवरी 2019

गीताप्रेस के संस्थापक श्रीजयदायलजी गोयन्दका-सेठजी का सिद्धान्त

मनुष्य के ऊपर उठने में मान-बड़ाई की इच्छा बहुत बाधक होती है । मरने पर मेरा नाम चले । इसी स्मृति के लिये लोग स्मारक बनाते हैं । यह मामला गड़बड़ मालूम देता है । प्रायः यह बहुतों में ही रहता है । अच्छे अच्छे साधु, नेता इस तरह की व्यवस्था करते है कि स्मृति रहे । यह अन्धकार की बात है ।
कहने का विशेष उद्देश्य यह है कि मैं या भाईजी (श्रीहनुमान प्रसादजी पोद्दार) मर जायँ तो पीछे से किसी को हमलोगों के लिये कोई स्मृति या स्मारक नहीं बनवाना चाहिये । मरने के बाद मैं कहने कैसे आऊँगा । अतः अभी से कह देता हूँ । भाईजी के लिये भी मैं कहता हूँ ।
भगवच्चर्चा के लिये यह निषेध नहीं है । व्यक्तिगत नाम और रूप की पूजा की बात है । नाम, रूप तो मिटा ही दे ।
प्रारम्भ में एक दो पुस्तकें तैयार हुईं तो मैंने नाम देने का निषेध किया था । पीछे लेखों में भाईजी ने छाप दिया और लेखों की पुस्तकें बन गयीं । इसके सिवा और किसी रूप में नाम, रूप का प्रचार नहीं होने दें ।
फोटो पूजना रूप की पूजा है । स्मारक बनाना नाम को पूजना है । ज्ञानी या भक्त कोई भी हो, जिनका नाम रूप प्रचलित होता है, लोग कहते हैं, यदि उनका वास्तव में विरोध होता तो उनके अनुयायी लोग उनके नाम, रूप की पूजा क्यों करते ?
हमारे मरने पर कोई हमारे लिये शोक सभा न करे । नाम, रूप कायम रखने की कोई चेष्टा न करे । जो लोग हमारे इस भाव का प्रचार करेंगे वे ही हमारे अनुयायी हैं ।
मंगलनाथ जी में जितनी मेरी श्रेष्ठ बुद्धि थी या है, उतनी मेरे जीवन में किसी जीवित मनुष्य में नहीं हुई । पर मैं उनके नाम या चित्र का प्रचार नहीं करता । उनके सिद्धांतो का प्रचार करता हूँ ।
व्याख्यान के समय उनकी स्मृति हो जाती है, उनकी युक्तियों का खयाल करके बातें भी कही जाती हैं, पर उनके नाम, रूप का प्रचार मैं कभी नहीं करता । उनका जो भाव था, उसी का हमें प्रचार करना चाहिये । यदि यह बात कही जाय कि उनके द्वारा मनाही की बात यों ही कहनामात्र था तो इसमें तीन दोष आते हैं―झूठ, कपट और दम्भ ।
मेरा चित्र मेरे घर में है । यदि मेरा शरीर पहले शांत हो जाय, मेरी स्त्री उसे रखना चाहे तो मेरा विरोध नहीं है, पर चित्र घर के बाहर न निकले । मुझे पूरा भरोसा है कि हरिकृष्ण या शिवदयाल कभी उस चित्र की नकल किसी को नहीं लेने देंगे । एक चित्र श्रीज्वालाप्रसादजी के पास है । उनसे प्राप्त करने की पहले बहुत चेष्टा की गयी पर उनसे बहुत प्रेम था, उन्होंने नहीं दिया, यदि उनसे लिया जाय तो उनको बहुत दुःख होगा । इस कारण विचार होता है ।
प्रश्न― भक्त या ज्ञानी किस दृष्टि से ऐसी बात चाहते हैं ?
उत्तर― भक्त तो अपने स्वामी की ही पूजा चाहता है, उसी के नाम का प्रचार चाहता है । वह नौकर नालायक है, बेईमान है, भगवान को धोखा दे रहा है, जो भगवान के बदले में अपने नाम-रूप को पुजवाता है । मालिक की दुकान पर अपना नाम चलानेवाला नौकर क्या मालिक को अच्छा लग सकता है । भगवान के भक्त को भगवान के नाम, रूप, गुण का प्रचार करना चाहिये ।
मनुष्य के क्षणभंगुर, नाशवान शरीर को पुजवाने से क्या लाभ ? मेरा पाँच वर्ष पहले का चित्र यदि हो तो उसमें और आज के चित्र में कितना अन्तर होगा । ऐसे ही सभी चित्रों में कौन-सा सच्चा है? कोई नहीं ।
भगवान का रूप-नाम कितना मधुर है । यदि पहले जन्म का मेरा चित्र कहीं पूजा जाता हो तो उससे मुझे क्या लाभ हो रहा है । मेरी पुस्तकों में, लेखों में, भगवान विष्णु, राम, कृष्ण की ही प्रशंसा मिलेगी । यदि भक्तों के चित्रों की प्रचार की दृष्टि होती तो मंगलनाथजी महाराज के चित्र का खूब प्रचार करते ।
ज्ञानी की दृष्टि से बतलाया जाता है । पूजन की दृष्टि से पूजे तो उसे छोटा बना रहा है । ज्ञानी तो ब्रह्म ही हो गया, साक्षात परमात्मा हो गया । पूजक लोग उसे छोटा बना रहे हैं । उसे महात्मा कह रहे हैं । उसे ब्रह्म से न्यारा कर रहे हैं । उसके नाम, रूप को ब्रह्म से अलग निकाल रहे हैं ।
महात्मा की दृष्टि से यदि वह अपने नाम, रूप की पूजा चाहता है तो वह ब्रह्म को प्राप्त ही नहीं हुआ । अपने वर्तमान नाम, रूप में उसका अभिमान है, तभी वह उसकी पूजा चाहता है, अन्यथा उसे यही समझना चाहिये कि राम, कृष्ण का नाम, मेरा ही नाम है । उनकी पूजा मेरी ही पूजा है । यदि वह अलग नाम, रूप की पूजा चाहता है तो राम, कृष्ण से अपने को अलग मानता है । यदि मैं जयदयाल के नाम, रूप से आप लोगों का लाभ समझता हूँ, आपको पूजक और अपने को पूज्य समझता हूँ तो देहाभिमान और किसका नाम है ।
स्त्री पति की, पुत्र माता-पिता की पूजा करे, यह लाभ की बात है । परमात्मा सबसे ऊँचे हैं । अपनी श्रद्धा से अपने गुरु को ईश्वर के तुल्य मान सकता है, पर ईश्वर नहीं । अन्यथा यह ईश्वर को मटियामेट करने की-सी बात है । यह सिद्धान्त की बात है । नहीं तो इतने ईश्वर खड़े हो जायँगे कि आपको वास्तविक ईश्वर का पता लगाना कठिन हो जायगा ।
दम्भ-पाखण्ड के पेट में मान-बड़ाई या धन की इच्छा ही है । जितने काम विश्व में भगवान के विरुद्ध हो रहे हैं, उनसे भगवान प्रसन्न नहीं हैं । अधिकार दे दिया । लोग भगवान का दुरुपयोग कर रहे हैं, अतः दण्ड मिलेगा । आगे अधिकार नहीं रहेगा । बंदूक छीन ली जायगी । अच्छा काम करेगा, उसे दुबारा बन्दूक मिल जायगी और पुरस्कार भी मिलेगा ।
हरेक में यह बात आ जानी चाहिये कि भगवान के मन्दिर में भगवान की जगह पर किसी मनुष्य की पूजा करनी यह घृणा करने योग्य बात है । यदि उन महात्माओं ने स्वयं इस प्रकार का प्रचार करवाया है, तब तो वे महात्मा ही नहीं थे । यदि उनके अनुयायियों ने उनकी बात न मानकर यह प्रचार किया है तो उन्होंने उस महात्मा का सिद्धान्त नहीं समझा ।
― परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका 'सेठजी'
प्रवचन दिनांक― ३०-३-१९४१, प्रातःकाल, श्रीजी का बगीचा, वृन्दावन ।
( 'भगवत्प्राप्ति की अमूल्य बातें' पुस्तक से )

बुधवार, 21 जून 2017

शिक्षाप्रद पत्र-१

|| श्रीहरिः ||
आज की शुभतिथि
आषाढ़ कृष्ण द्वादशी, बुधवार, वि०सं० २०७४

 शिक्षाप्रद पत्र-१  
        सादर हरिस्मरण | तुम्हारा पत्र व्यवस्थापक, गीताप्रेस के नाम से दिया हुआ मिला | संसार को अनित्य, क्षणभंगुर मानव-शरीर को दुर्लभ, विषयों को विषवत एवं भजन-साधन को अमृतवत समझते हुए भी तुम्हारी बुद्धि भ्रमित-सी हो रही है तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह—आधिपत्य जमाये बैठे हैं, लिखा, सो मालूम किया | बुद्धि का भ्रम दूर हो एवं काम-क्रोध, लोभ, मोह का समूल नाश हो जाय—नामोनिशान न रहे, इसके लिए ईश्वर का भजन-ध्यान श्रद्धा-भक्ति-पूर्वक नित्य-निरन्तर करने की तत्परता से चेष्टा करनी चाहिए | ऐसा करने से शनैः-शनैः भ्रम का नाश होकर काम-क्रोध, लोभ-मोह आदि दुर्गुणों का भी नाश हो सकता है | गीता-तत्त्वांक या गीता-तत्त्वविवेचनी टीका में अध्याय ९ श्लोक ३०-३१ और अध्याय १० श्लोक ९-१० और ११ की व्याख्या देखनी चाहिए |

           मन की चंचलता के विषय में कई बातें लिखीं और लिखा कि भगवन्नाम जप करते समय भी मन इधर-उधर चला जाता है, सो मालूम किया | इसके लिए भगवान् की शरण होकर रो-रोकर करुणभावपूर्वक भगवान् से स्तुति-प्रार्थना करनी चाहिए | जप करते समय मन इधर-उधर चला जाय तो इसके लिए सच्चा और वास्तविक दुःख होना चाहिए | संसार को नाशवान, क्षणभंगुर, दु:खरूप तथा अनित्य समझकर इससे वैराग्य करना चाहिए एवं भगवान् को सर्वगुणसंपन्न तथा आनन्द और शान्तिस्वरूप समझकर उनमें श्रद्धा और प्रेम बढ़ाना चाहिए | इस प्रकार करने से मन धीरे-धीरे संसार से हटकर परमात्मा की ओर लग सकता है | इन्द्रियों का तो इधर-उधर भागने का स्वभाव ही है, वे प्रमथनस्वभाववाली है; किन्तु उनपर अधिक-से-अधिक सावधानीपूर्वक नियंत्रण रखना चाहिए | मन-इन्द्रियों को अभ्यास और वैराग्य से वश में करना चाहिए | गीता-तत्त्वांक या गीता-तत्त्वविवेचनी टीका में अध्याय ६ श्लोक ३५ और ३६ की व्याख्या देखनी चाहिए |

          अपने स्वरुप को पहचानने एवं शान्ति मिलने का उपाय पूछा, सो इसके लिए गीताप्रेस से प्रकाशित पुस्तकों का स्वाध्याय करना चाहिए | ‘तत्त्वचिन्तामणि’ के सात और ‘परमार्थ-पत्रावली’ के चार भाग प्रकाशित हो चुके हैं, इनका स्वाध्याय करना चाहिए | इनके अध्ययन से आपकी शंकाओं का समाधान हो सकता है | सबसे यथायोग्य |
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—श्रद्धेय जयदयाल गोयन्दका सेठजी ‘शिक्षाप्रद पत्र’ पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर


 नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

मंगलवार, 7 जून 2016

मनुष्य का कर्तव्य

|| श्रीहरिः ||
आज की शुभतिथि-पंचांग
ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, मंगलवार, वि०सं० २०७३

*मनुष्य का कर्तव्य*
गत ब्लॉग से आगे....... यदि मनुष्य अपनी बुद्धि के अनुसार इस लोक और परलोक में लाभ देनेवाले कर्मों में प्रवृत्त नहीं होता तो इसको उसकी मूर्खता, अकर्मण्यता और आलस्य के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है ? जो जान-बूझकर प्रमाद, आलस्य, निद्रा और भोगों से चित्त को हटाकर उसे सन्मार्ग में नहीं लगाता और पतन के मार्ग में आगे बढ़ता जाता है वह स्वयं ही अपना शत्रु है | श्रुति कहती है—
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः |
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ||
(केनोपनिषद २ | ५)
‘यदि इस मनुष्य-शरीर में उस परमात्म-तत्त्व को जान लिया जायगा तो सत्य है यानी उत्तम है | और यदि इस जन्म में उसकों नहीं जाना तो महान हानि है | धीर पुरुष सम्पूर्ण भूतों में परमात्मा का चिंतन कर—परमात्मा को समझकर इस देह को छोड़ अमृत को प्राप्त होते हैं अर्थात् इस देह से प्राणों के निकल जानेपर वे अमृतस्वरूप परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं |’

        मनुष्य  को अपनी उन्नति का यह मार्ग स्वयं ही चलकर तय करना पड़ता है , दूसरे के द्वारा यह मार्ग तय नहीं होता | अतएव उसकी इसी में बुद्धिमत्ता और कल्याण है, और यही उसका निश्चित कर्तव्य है कि अत्यन्त सावधानी के साथ प्रतिक्षण अपने को सम्भालते हुए इस लोक  और परलोक के कल्याणकारी साधन को खूब जोर के साथ करता रहे | प्रमाद, आलस्य , भोग एवं दुराचार आदि को कल्याण के मार्ग में अत्यन्त बाधक समझकर उन्हें सर्वथा त्याग दे | श्रुति चेतावनी देती हुई कहती है—
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत |
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ||
(कठोपनिषद ३ | १४)
‘उठो, जागो और महापुरुषों के समीप जाकर उनके द्वारा तत्त्वज्ञान के रहस्य को समझो | कविगण इसे तीक्ष्ण क्षुर के धार के समान अत्यंत कठिन मार्ग बताते हैं |’ परन्तु कठिन मानकर हताश होने की कोई आवश्यकता नहीं | भगवान् में चित्त लगाने से भगवत्कृपा से मनुष्य सारी कठिनाइयों से अनायास ही तर जाता है ‘मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि |’ भगवान् ने और भी कहा है—
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया |
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ||
(गीता ७ | १४)
‘यह मेरी अलौकिक—अति अद्भुत त्रिगुणमयी योगमाया बहुत दुस्तर है, परन्तु जो पुरुष मेरी ही शरण हो जाते हैं वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से सहज ही तर जाते हैं |’ सब देशों और समस्त पदार्थों में सदा-सर्वदा भगवान् का चिंतन करना और भगवान् की आज्ञा के अनुसार चलना ही शरणागति समझा जाता है | इसी को ईश्वर कि अनन्य भक्ति भी कहते हैं | अतएव जिसका ईश्वर में विश्वास हो, उसके लिए तो ईश्वर का आश्रय ग्रहण करना ही परम कर्तव्य है | जो भलीभांति ईश्वर के शरण हो जाता है, उससे ईश्वर के प्रतिकूल यानी अशुभ कर्म तो बन ही नहीं सकते | वह परम अभय पद को प्राप्त हो जाता है, उसके अंतर में शोक-मोह का आत्यन्तिक अभाव रहता है, उसको सदा के लिए अटल शांति प्राप्त हो जाती है और उसके आनंद का पार ही नहीं रहता | उसकी इस अनिर्वचनीय स्थिति को उदाहरण, वाणी या संकेत के द्वारा समझा या समझाया नहीं जा सकता | ऐसी स्थितिवाले पुरुष स्वयं ही जब उस स्थिति का वर्णन नहीं कर सकते तब दूसरों की तो बात ही क्या है ? मन-वाणी की वहाँ तक पहुँच ही नहीं है | केवल पवित्र हुई शुद्ध बुद्धि के द्वारा पुरुष इसका अनुभव करता है | ऐसा वेद और शास्त्र कहते हैं—
एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते |
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ||
(कठोपनिषद १ | ३ | १२)
‘सम्पूर्ण भूतों के हृदय में छिपा हुआ यह आत्मा सबकों प्रतीत नहीं होता, परन्तु यह सूक्ष्मबुद्धिवाले महात्मा पुरुषों से तीक्ष्ण और सूक्ष्मबुद्धि के द्वारा ही देखा जाता है |’ भगवान् स्वयं कहते हैं—
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतिन्द्रियं |
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्वतः ||
(गीता ६ | २१)
‘इन्द्रियों से अतीव केवल शुद्ध हुई सूक्ष्मबुद्धि द्वारा ग्रहण करनेयोग्य जो अनंत आनंद है उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है और जिस अवस्था में स्थित हुआ योगी भगवत्स्वरूप से चलायमान नहीं होता |’ उसी अवस्था को प्राप्त करने की चेष्टा मनुष्यमात्र को करनी चाहिए, यही सबका परम कर्तव्य है |

—श्रद्धेय जयदयाल गोयन्दका सेठजी तत्त्वचिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

 नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

सोमवार, 6 जून 2016

मनुष्य का कर्तव्य

|| श्रीहरिः ||
आज की शुभतिथि-पंचांग
ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा, सोमवार, वि०सं० २०७३

*मनुष्य का कर्तव्य*
गत ब्लॉग से आगे.......यदि आपको किसी भी धर्म, शास्त्र अथवा प्राचीन महात्माओं के लेखपर विश्वास न हो, तो कम-से-कम एक श्रीमद्भगवद्गीता पर तो जरुर विश्वास करना चाहिए | क्योंकि गीता का उपदेश प्रायः सभी मतों के अनुकूल पड़ता है | इसपर विश्वास करके उसी की शरण होकर साधन में लग जाना चाहिए | कदाचित् ईश्वर के अस्तित्व में भी आपके मनमें संदेह हो तो वर्तमान समय में आपकी दृष्टि में जगत में जितने श्रेष्ठ पुरुष हैं उन सबमें जो आपको सबसे श्रेष्ठ मान्य हों, उन्हीं के बतलाये हुए मार्गपर कमर कसकर चलना चाहिए | यदि वर्तमानकाल के किसी भी साधु-महात्मा या सत्पुरुष पर आपका विश्वास न हो, तो आपको यह विचार करना चाहिए कि क्या सारे संसार में हमसे उत्तम कल्याणमार्ग के ज्ञाता कोई नहीं हैं ? यदि यह कहते हों कि ‘हैं तो सही पर हमको नहीं मिले |’ तो उनकी खोज करनी चाहिए, अथवा यदि यह समझते हों कि ‘ हमसे तो बहुत-से पुरुष श्रेष्ठ हैं परन्तु कल्याणमार्ग के भलीभांति उपदेश करनेवाले पुरुष संसार में बहुत ही थोड़े हैं, जो हैं उनका भी हम-जैसे अश्रद्धालुओं को मिलना कठिन है, और यदि कहीं मिल भी जाते हैं तो पहचानने की योग्यता न होनेके कारण हम उन्हें पहचान नहीं सकते |’ ऐसी अवस्था में आपके लिए यह तो अवश्य ही विचारणीय है कि आप जो कुछ चेष्टा कर रहे हैं उससे क्या आपका यथार्थ कल्याण हो जायगा ? यदि संतोष नहीं है तो कम-से-कम अपनी उन्नति के लिए आपको उत्तरोत्तर विशेष प्रयत्न तो करना ही चाहिए | शम, दम, धृति, क्षमा, शांति, सन्तोष, जप, तप, सत्य, दया, ध्यान और सेवा आदि गुण और कर्म आपके विचार में जो उत्तम प्रतीत हों उनका ग्रहण तथा प्रमाद, आलस्य, निद्रा, विषयासक्ति, झूठ, कपट, चोरी-जारी आदि दुर्गुण और दुष्कर्मों का त्याग करना चाहिए | प्रत्येक कर्म करने से पूर्व सावधानी के साथ यह सोच लेना चाहिए कि मैं जो  कुछ कर रहा हूँ वह मेरे लिए यथार्थ लाभदायक है या नहीं और उसमें जहाँ कहीं भी त्रुटि मालूम पड़े, उसका बिना विलम्ब सुधार कर लेना चाहिए | मनुष्य जन्म बहुत ही दुर्लभ है, लाखों रूपये खर्च करने पर भी जीवन का एक क्षण नहीं मिल सकता | ऐसे मनुष्य-जीवन का समय निद्रा, आलस्य, प्रमाद और अकर्मण्यता में व्यर्थ कदापि नहीं खोना चाहिए | जो मनुष्य अपने इस अमूल्य समय को बिना सोचे-विचारे बितावेगा, उसे आगे चलकर अवश्य ही पछताना पड़ेगा | कवि ने क्या ही सुंदर कहा है—
बिना बिचारे जो करे सो पाछे पछिताय |
काम बिगारे आपनो जग में होत हँसाय ||
जगमें होत हँसाय चित्त में चैन न पावै |
खान पान सनमान राग रँग मन नहिं भावै ||
कह गिरधर कविराय कर्म गति टरट न टारे |
खटकत है जिय मांहि किया जो बिना बिचारे ||
        अतः अपनी बुद्धि के अनुसार मनुष्य को अपना समय बड़ी ही सावधानी से ऊँचे-से-ऊँचे काम में लगाना चाहिए जिससे आगे चलकर पश्चात्ताप न करना पड़े | नहीं तो गोस्वामी जी के शब्दों में—
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ |
कालहि कर्महि ईश्वरहि मिथ्या दोस लगाइ ||
-सिवा पछताने के अन्य कोई उपाय न रह जायगा | यह मनुष्य-जीवन बहुत ही महँगे मोल से मिला है | काम बहुत करने हैं, समय बहुत थोड़ा है, अतएव चेतकर अपने जीवन के बचे हुए समय को बुद्धिमानी के साथ केवल कल्याण के मार्ग में ही लगाना चाहिए |.....शेष अगले ब्लॉग में
—श्रद्धेय जयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्त्वचिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

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रविवार, 5 जून 2016

मनुष्य का कर्तव्य

|| श्रीहरिः ||
आज की शुभतिथि-पंचांग
ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या, रविवार, वि०सं० २०७३

*मनुष्य का कर्तव्य*

       विचार की दृष्टि से देखनेपर यह स्पष्ट ही समझ में आता है कि आजकल संसार में प्रायः सभी लोग आत्मोन्नति की ओरसे विमुख-से हो रहे हैं | ऐसे बहुत ही कम लोग हैं जो आत्मा के उद्धार के लिए चेष्टा करते हैं | कुछ लोग जो कोशिश करते हैं उनमें भी अधिकांश किंकर्तव्यविमूढ़ हो रहे हैं | श्रद्धा-भक्ति की कमी के कारण यथार्थ मार्गदर्शक का भी अभाव-सा हो रहा है | समय, संग और स्वभाव की विचित्रता से कुछ लोग तो साधन की इच्छा होनेपर भी अपने विचारों के अनुसार चेष्टा नहीं कर पाते | इसमें प्रधान कारण अज्ञता के साथ-ही-साथ ईश्वर, शास्त्र और महर्षियों पर अश्रद्धा का होना है | परन्तु यह श्रद्धा किसी के करवाने से नहीं हो सकती | श्रद्धा-संपन्न पुरुषों के संग और निष्कामभाव से किये हुए तप, यज्ञ, दान, दया और भगवद्भक्ति आदि साधनों से हृदय के पवित्र होनेपर ईश्वर, परलोक, शास्त्र और महापुरुषों में प्रेम एवं श्रद्धा होती है | श्रद्धा ही मनुष्य का स्वरुप है, इस लोक और परलोक में श्रद्धा ही उसकी वास्तविक प्रतिष्ठा है | श्रीगीता में कहा है—
सत्त्वानुरूपा  सर्वस्व   श्रद्धा भवति भारत |
श्रद्धामयोयं  पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ||
(१७ | ३)
‘हे भारतवंशी अर्जुन ! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है तथा यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला हैवह स्वयं भी वही है | अर्थात् जिसकी जैसी श्रद्धा है, वैसा ही उसका स्वरुप समझा जाता है |’ अतः मनुष्य को सच्चे श्रद्धा-संपन्न बनने की कोशिश करनी चाहिए |

         आप ईश्वर के किसी भी नाम या किसी भी रूप में श्रद्धा करें, आपकी वह श्रद्धा ईश्वर में ही समझी जायगी क्योंकि सभी नाम-रूप ईश्वर के हैं | आपको जो धर्म प्रिय हो, जिस ऋषि, महात्मा या महापुरुषपर आपका विश्वास हो, आप उसीपर श्रद्धा करके उसी के अनुसार चल सकते हैं | आवश्यकता श्रद्धा-विश्वास की है | ईश्वर, धर्म और परलोक आदि विशेष करके श्रद्धा के ही विषय हैं | इनका प्रत्यक्ष तो अनेक प्रयत्नों के साथ विशेष परिश्रम करनेपर होता है | आरम्भ में तो इन विषयों के लिए किसी-न-किसी पर विश्वास ही करना पड़ता है, ऐसा न करे तो मनुष्य नास्तिक बनकर श्रेय के मार्ग से गिर जाता है, साधन से विमुख होकर होकर पतित हो जाता |.....शेष अगले ब्लॉग में
—श्रद्धेय जयदयाल गोयन्दका सेठजीतत्त्वचिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर
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शुक्रवार, 1 मई 2015

गौ सेवा की प्रेरणा -११-

 ।। श्रीहरिः ।।
आज की शुभतिथि-पंचांग
1 May 2015, Friday


कलकत्ते में जो भाई लोग रहते है, उनको कलकत्ते में पिजरापोल गऊशाला की सेवा करनी चाहिए । सभी जगह पिजरापोल गऊशाला है ही, उसकी सेवा करना भी गऊ की सेवा है । हर एक प्रकार से दूध की वृद्धि करनी चाहिए । जो ठाली (ठाठ) गऊ है, वृद्ध गऊ है उसकी भी सेवा करनी चाहिए । इस विषय में कितने भाई तो कहते है की गऊशाला में जो ठाली गऊ है यानी बुड्ढी गऊ है, निकम्मी गौ है उसकी सेवा करनी चाहिए, उनकी वृद्धि करनी चाहिए, दूध वाली गऊ बेच देनी चाहिए । कितने कहते है की अपने सभी लोगों को दोनों प्रकार  की गऊ की सेवा करनी चाहिए । कितने कहते है की नया डेयरी-फार्म खोलना चाहिए, दूधवाली गऊ की सेवा करनी चाहिए, ठाली गऊ अगर मरे तो मर जाय । इस तरह की आवाज आती है ।     
इन बातों से मुझे तो यही बात अच्छी मालूम देती है की सभी गऊओं की सेवा करनी चाहिए, चाहे जवान हो, चाहे बूढी हो । जवान की सेवा दूध के लिए करनी चाहिए और बुड्ढी की सेवा धर्म के लिए करनी चाहिए । अपने घर में जितने मनुष्य होते है, कोई बूढ़े तो कोई जवान होते है, सबकी सेवा करना अपना कर्तव्य है । बूढों के सेवा इसलिए की उन्होंने हमारी सेवाकी है , वे हमारी सेवा करते करते बूढ़े हो गए । आजकल लोग यह कहते है की “बूढ़े जल्दी-से-जल्दी मर जाय”  यह हमारी भावना, हमारी बुरी नीयत है । हमको तो यह भव रखना चाहिए की “हमारे बूढ़े माता-पिता सौ वर्षों तक जिए ।” हमारी भावना से वे सौ वर्षो तक जिए तो वे जियेंगे  नही । हम कह दे कल ही मर जायं, तो मरेगे नही । अपनी इच्छा से न तो कोई जीएगा न कोई मरेगा । उनके मरने की इच्छा करके हमने अपराध कर लिया । तो स्वयम अपराध क्यों करे, हमे तो बढ़िया-से-बढ़िया इच्छा रखनी चाहिए । सब गउओं की सेवा होनी चाहिए, जीव-मात्र की सेवा होनी चाहिए ।......शेष अगले ब्लॉग में ।          
 
—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, कल्याण वर्ष ८९, संख्या ०३ से, गीताप्रेस गोरखपुर

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गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

गौ सेवा की प्रेरणा -१०-

।। श्रीहरिः ।।
आज की शुभतिथि-पंचांग
30 April 2015, Thursday


गोचर भूमि छोड़ना भी बड़ी भरी सेवा है । गायों को घर में रख कर उनकी सेवा करना तो एक नंबर है ही, हर एक प्रकार से हमको गाय की सेवा करनी है । जैसे गऊशाळा है, इसमें अपनी शक्ति के अनुसार सभी भाई लोग मदद करते ही है, उसमे और विशेष मदद करनी चाहिए । आजकल ब्राह्मणों को गऊदान किया जाता है, वह दान देना तो बहुत उत्तम है ही, किन्तु यदि कोइ ब्राह्मण गऊ लेकर उसका पालन नही कर सके और बिक्री कर दे या किसी प्रकार से वह कसाई के हाथ चली जाये तो वह ब्राह्मण भी नरक में जायेगा और गोदान करने वाला भी । इसलिए ब्राह्मण उसे अपने घर में रख कर उसका पालन करे । गऊ दान की महिमा शास्त्र में लिखी भरी पड़ी है । ऐसी परिस्थति में आजकल समय में किसी को गऊ देना हो तो गऊ शाला में भेज दे । गऊशाला में गऊ के दूध का अधिक दाम देना भी गऊ की सेवा है । आजकल बहुत से गऊशालाएं चंदे से ही चल रही है । एक महात्मा बहुत उच्चकोटि के थे, उनका नाम था मंगलनाथ । उनके नाम से ऋषिकेश में एक गऊशाला है । हम सभी उसके मेम्बर है, जिससे किसी भी प्रकार गऊशाला कायम रहे । उसमे तीन-चार हज़ार रुपया यहाँ से सहायता मिल जाती है, वह वर्षो से इसी प्रकार चल रही है । उससे गऊओं की सेवा हो रही है और अपने को दूध मिल रहा है । नही तो इक्कठा इतना दूध कहाँ से मिलता । ......शेष अगले ब्लॉग में ।           

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, कल्याण वर्ष ८९, संख्या ०३ से, गीताप्रेस गोरखपुर

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