※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

वर्तमान दोषों के निवारण की आवश्यकता -२-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन कृष्ण , चतुर्थी, बुधवार, वि० स० २०७०

 वर्तमान दोषों के निवारण की आवश्यकता -२-

 
गत ब्लॉग से आगे…..आय-कर, बिक्री-कर, सम्पति-कर, दान-कर, विवाह-कर आदि करों की भरमार के कारण लोगों की नियत बुरी होकर उनमे झूठ, कपट, चोरी, बेईमानी, धोखेबाजी, घूसखोरी आदि जोरों से बढ़ रही है । इन सब दोषों के दूर होने के का कोई सरल उपाय समझने में नही आया । किसी व्यापारी से न्यायसंगत व्यवसाय करने के लिए कहा जाता है तो उसका यही उत्तर मिलता है की इस ‘युग में न्यायसंगत व्यवसाय चल ही नही सकता, लाख रूपये से अधिक वार्षिक आमदनी होने पर सरकार ही अनेक प्रकार से करों द्वारा अधिकाँश रूपये ले लेती है । अत: इस ज़माने में न्यायपूर्वक व्यवसाय करके तो कोई लखपति-करोडपति हो ही नही सकता ।’ किन्तु मनुष्य को इस प्रकार कभी निराश नही होना चाहिये । लखपति-करोडपति  बनने की लालसा और लोभ का त्याग करने पर न्याययुक्त व्यवसाय हो सकता है ।

बहुत से लोग चोरबाजारी करके प्रतिवर्ष लाखों रूपये एकत्र करते और सरकार से छिपाकर गुप्तरूप से रखते है । वे उनकी रक्षा भी बड़ी कठिनाई से कर पाते है । किसी को न्याययुक्त सरकारी कर देने के लिये कहाँ जाता है तो यह उत्तर मिलता है की ‘नाना प्रकार के झूठ-कपट, बेईमानी और इतना परिश्रम करके रूपये हम सरकार के लिए थोड़े ही उपार्जन करते है । सरकार का यदि मामूली कर होता तो दिया भी जा सकता था, किन्तु सरकार ने इतने कर लगा दिए की यदि सरकार को सच्चाई से न्यायपूर्वक सारी आमदनी बता दी जाय तो अधिकाँश धन सरकार ही ले लेगी ।’

कोई स्वार्थ त्याग की बात कहता है तो लोग उसकी हँसी उड़ाते है । यह अन्याय से उपार्जित धन परोपकार में विशेष खर्च नही होता, क्योकि पाप के द्रव्य से पाप ही होता है । यदि उस द्रव्य को परमार्थ या परोपकार में दिल खोल कर लगा दे तो उस पाप का कुछ प्रायश्चित हो, किन्तु उस काम में न लगा कर उस द्रव्य को ऐश-आराम-शौकीनी में विवाह-शादी में ही खर्च करते है, जिससे उनका यह लोक भी बिगड़ता है और परलोक भी ।....शेष  अगले ब्लॉग में.
  

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

वर्तमान दोषों के निवारण की आवश्यकता -१-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन कृष्ण , तृतीया, मंगलवार, वि० स० २०७०

 वर्तमान दोषों के निवारण की आवश्यकता -१-

                                       

दोषों के निवारण के लिए लिखने का मेरा अधिकार और सामर्थ्य नही है, क्योकि इस विषय में वही पुरुष लिख सकता है जो सर्वथा निर्दोष एवं प्रभावशाली हो एवं उसी का असर पड़ता है । मैं तो एक साधारण आदमी हूँ, किन्तु सबके सुझाव के लिए लिखा जाता है ।

वर्तमान समय में हम लोगों में बहुत दोष आ गए है और बढ़ते ही जा रहे है । उन पर गम्भीरतापूर्वक विचार करके उसके निवारण के लिए प्रयत्न करना विशेष आवश्यक है ।
 
बहुत से मनुष्य तो अर्थलोलुप होकर संसार के पतनोन्मुख प्रवाह में बह रहे है, कितने ही मनुष्य पद के अभिमान और मान-बड़ाई-प्रतिष्ठा के लोभ से मोहित हुए पतन की और जा रहे है । बहुत से मनुष्यों को श्रद्धा की कमी के कारण ईश्वर, धर्म, सत्संग और शास्त्र की बातें अच्छी नही लगती और कोई-कोई तो इन सबको व्यर्थ समझकर उपेक्षा कर देते है । व्यक्तिगत स्वार्थ को त्याग कर अपना और संसार का हित और परमार्थ साधन की और दृष्टि बहुत ही कम लोगों की है, यह बहुत ही विचारणीय विषय है । ....शेष  अगले ब्लॉग में .     

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

सत्संग और महात्माओं का प्रभाव -१३ –


।। श्रीहरिः ।।
आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन कृष्ण , द्वितीया, सोमवार, वि० स० २०७०

 सत्संग और महात्माओं का प्रभाव  -१३ –

                                       
गत ब्लॉग से आगे…..महात्माओं में अद्भुत प्रभाव होता है । उनके दर्शन, भाषण, स्पर्श, वार्तालाप से पापों का नाश और दुर्गुण-दुराचारों का अभाव होकर सद्गुण-सदाचार आ जाते है । अज्ञान का नाश होकर ह्रदय में ज्ञान आ जाता है, जिससे हमे सहज ही भगवतप्राप्ति हो जाती है । यह उन महापुरुषों का प्रभाव है, जो भगवान् के भेजे हुए अधिकारी पुरुष है अथवा जो महापुरुष परमात्मा को प्राप्त हो चुके है । ऐसे महात्मा परमात्मा ही बन जाते है । इसलिए परमात्मा के गुण-प्रभाव उनके गुण-प्रभाव है, यह समझना ही महात्मा को तत्व से समझना है ।

वास्तव में महात्मा का आत्मा परमात्मा से अलग नहीं है, पर हम मानते नही, उसे परमात्मा से भिन्न समझते है, इसलिए हम परमात्मा की प्राप्ति से वंचित रहते है । यह समझना ही अन्त:करण की शुद्धि होने पर ही होता है ।

भक्तिमार्ग में भगवान् से भिन्न रहने पर भी भक्तों की स्थिति विलक्षण होती है । जैसे जीवन्मुक्त ज्ञानी के दर्शन, भाषण, स्पर्श से मनुष्य पवित्र हो जाता है, वैसे ही भगवत्प्राप्त भगवतभक्त के दर्शन, भाषण, स्पर्श से भी हो जाता है । महापुरुषों का रहस्य वास्तव में महापुरुष बनने पर ही समझ में आता है । उनके उददेश्य सर्वथा अलौकिक और अदभुत होता है । उनका अपना तो कोई कर्म रहता ही नहीं । संसार में उनका जो जीवन है यानी शरीर की स्थिति है, तथा जो उनकी चेष्टा है, वह संसार के हित के लिए ही है । जैसे भगवान् का अवतार संसार के उद्धार के लिए होता है, वैसे ही महात्मा पुरुषों का जीवन भी संसार क उद्धार के लिए ही है ।   
           

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

सत्संग और महात्माओं का प्रभाव -१२ –


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन कृष्ण, प्रतिपदा, रविवार, वि० स० २०७०

 सत्संग और महात्माओं का प्रभाव  -१२ –

 

गत ब्लॉग से आगे….. महात्माओं के पहचानने की एक साधारण युक्ति यह है की जैसे अग्नि के समीप जाने से जानेवाले पर अग्नि का कुछ-न-कुछ प्रभाव जरुर पड़ता है, वैसे ही महात्मा के समीप जाने से महात्मा का प्रभाव पड़ता है । जैसे सरकार के किसी सिपाही को देखने से सरकार की स्मृति होती है, वैसे ही भगवान् के भक्त के दर्शन से भगवान् की स्मृति होती है । जिसका सँग करने से अपने में दैवी सम्पदा के लक्षण आवे, जिसके सँग से, जिसके साथ वार्तालाप करने से, दर्शन से, स्पर्श से आत्मा का सुधार हो, अपने में भक्तों के लक्षण प्रगट होने लगे, गुणातीत पुरुषों के लक्षण आने लगे तो समझना चाहिये की यह महापुरुष है ।

जब हम महापुरुषों का सँग करने के लिए जाय तो हम यह समझे की हम ज्ञान के पुन्ज् के सम्मुख जा रहे है । जैसे सूर्य के सम्मुख जाने से अन्धकार तो दूर भाग ही जाता है, किन्तु अधिक-से-अधिक प्रकाश होता चला जाता है । हम देखते है की जब प्रात:काल सूर्य उदय होता है, तब ज्यों-ज्यों सूर्य नजदीक आता है त्यों-ही-त्यों सूर्य के प्रकाश का अधिक असर पड़ता है । वैसे ही हम जितने ही महात्माओं के समीप होते है, उतना ही हमको अधिक लाभ मिलता है । वे एक ज्ञान के पुंज है, उस ज्ञानपुंज से हमारे अज्ञानान्धकार का नाश होकर हमारे ह्रदय में भी ज्ञान-सूर्य का प्रागटय होता है ।.... शेष अगले ब्लॉग में.

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

सत्संग और महात्माओं का प्रभाव -१२ –


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन कृष्ण, प्रतिपदा, रविवार, वि० स० २०७०

 सत्संग और महात्माओं का प्रभाव  -१२ –
 

गत ब्लॉग से आगे….. महात्माओं के पहचानने की एक साधारण युक्ति यह है की जैसे अग्नि के समीप जाने से जानेवाले पर अग्नि का कुछ-न-कुछ प्रभाव जरुर पड़ता है, वैसे ही महात्मा के समीप जाने से महात्मा का प्रभाव पड़ता है । जैसे सरकार के किसी सिपाही को देखने से सरकार की स्मृति होती है, वैसे ही भगवान् के भक्त के दर्शन से भगवान् की स्मृति होती है । जिसका सँग करने से अपने में दैवी सम्पदा के लक्षण आवे, जिसके सँग से, जिसके साथ वार्तालाप करने से, दर्शन से, स्पर्श से आत्मा का सुधार हो, अपने में भक्तों के लक्षण प्रगट होने लगे, गुणातीत पुरुषों के लक्षण आने लगे तो समझना चाहिये की यह महापुरुष है ।

जब हम महापुरुषों का सँग करने के लिए जाय तो हम यह समझे की हम ज्ञान के पुन्ज् के सम्मुख जा रहे है । जैसे सूर्य के सम्मुख जाने से अन्धकार तो दूर भाग ही जाता है, किन्तु अधिक-से-अधिक प्रकाश होता चला जाता है । हम देखते है की जब प्रात:काल सूर्य उदय होता है, तब ज्यों-ज्यों सूर्य नजदीक आता है त्यों-ही-त्यों सूर्य के प्रकाश का अधिक असर पड़ता है । वैसे ही हम जितने ही महात्माओं के समीप होते है, उतना ही हमको अधिक लाभ मिलता है । वे एक ज्ञान के पुंज है, उस ज्ञानपुंज से हमारे अज्ञानान्धकार का नाश होकर हमारे ह्रदय में भी ज्ञान-सूर्य का प्रागटय होता है ।.... शेष अगले ब्लॉग में.

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

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शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

सत्संग और महात्माओं का प्रभाव -११ –


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन कृष्ण, प्रतिपदा, शनिवार, वि० स० २०७०

 सत्संग और महात्माओं का प्रभाव  -११ –
 

गत ब्लॉग से आगे….. ‘महात्मा’ शब्द से यहाँ किसी आश्रम से सम्बन्ध नही है । कोई गृहस्थ हो, सन्यासी हो, वानप्रस्थी हो या ब्रह्मचारी हो-जिनमे महात्माओं के लक्षण, जो गीता में बताये है, मिलते है, वे महात्मा है । महात्माओं की महिमा जितनी जितनी गाई जाय, थोड़ी है; जैसे गंगा जी की महिमा जितनी गाई जाये थोड़ी है । गंगा सारे संसार का उद्धार कर सकती है, किन्तु यदि कोई गंगा में स्नान करने ही न जाय, गंगा-जलपान करे ही नहीं, तो इसमें गंगाजी का क्या दोष है । इसी प्रकार कोई महापुरुषों से लाभ नही उठावे तो उसमे महापुरुष का कोई दोष नहीं ।

एक गंगा से ही सबका कल्याण हो सकता है; क्योकि शास्त्र में कहा गया है की गंगा में स्नान करने से, उसका जलपान करने से मनुष्यों के सारे पापों का नाश हो जाता है और आत्मा का उद्धार हो जाता है । गंगाजी की भांति ही महात्मा पुरुष लाखों-करोड़ों पुरुषों का उद्धार कर सकते है । और सारे संसार के मनुष्यों का उद्धार होना भी कोई असम्भव तो है ही नहीं, हाँ, कठिन अवश्य है । क्योकि उनमे श्रद्धा हुए बिना तो कल्याण हो ही नही सकता और श्रद्धा होना कठिन है । प्रथम तो महापुरुष संसार में मिलते ही कठिनता से है; क्योकि संसार के करोड़ों मनुष्यों में कोई एक महापुरुष होता है-जैसे गीताजी में श्रीभगवान् ने कहा है-

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत: ॥ (गीता ७/३)

‘हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए प्रयत्न करता है । और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है ।’

भगवान् को जो तत्व से जानता है, वही महात्मा है । प्रथम तो लाखों-करोड़ों में कोई एक महात्मा होता है, फिर उसका मिलना भी बहुत दुर्लभ है, मिलने पर भी उसे पहचानना उससे भी कठिन है ।.... शेष अगले ब्लॉग में.

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

सत्संग और महात्माओं का प्रभाव -१० –


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

माघ शुक्ल, पूर्णिमा, शुक्रवार, वि० स० २०७०

 सत्संग और महात्माओं का प्रभाव  -१० –
                  
                                              
गत ब्लॉग से आगे…..  महात्मा पुरुष हमे याद करते है तो उसके ध्यान में हमारा चित आ जाता है । इससे भी बहुत लाभ होता है और हम महात्मा को याद करे तो भी हमे लाभ हो जाता है । वीतराग पुरुष को याद करने से जो लाभ होता है, उससे अधिक महात्मा को याद करने से होता है और उससे भी अधिक विशेष लाभ श्रीभगवान् को याद करने से होता है । स्मरण करने योग्य तो श्रीभगवान् ही है । उनकी स्मृति मात्र से मनुष्य का कल्याण हो जाता है । भगवान् में शरीर-शरीरी भेद नही है । अत: उनका शरीर दिव्य-अलौकिक चिन्मय है । परन्तु महात्मा का शरीर ऐसा नही है । महात्मा का शरीर तो पंचभौतिक है । इसलिए भगवान् को दिव्य-चिन्मय माधुर्य-मूर्ति कहते है । उनके दर्शन, भाषण, स्पर्श सभी आनन्दप्रद  और कल्याणकर होते है । इसलिए भगवान् के समान तो भगवान् ही है । परतु महात्मा पुरुष का स्मरण-सँग भी अत्यंत लाभदायक है । महापुरुष के सँग की महिमा बताते हुए कहा गया है-  

एक घड़ी आधी घड़ी आधी में पुनि आध ।
तुलसी संगत साधू की, कटे कोटि अपराध ।।

एक घड़ी, आधी घड़ी या आधी में भी आधी घड़ी का जो महात्मा पुरुषों का सँग है, उसका इतना महात्म्य है की उससे करोड़ो अपराध कट जाते है । यह समझे की एक घड़ी चौबीस मिनट की होती है, आधी बारह मिनट की और आधी से भी आधी यानी चौथाई छ: मिनट की ।.... शेष अगले ब्लॉग में.

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

सत्संग और महात्माओं का प्रभाव -९ –


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

माघ शुक्ल, चतुर्दशी, गुरुवार, वि० स० २०७०


 सत्संग और महात्माओं का प्रभाव  -९ –

 

गत ब्लॉग से आगे…..  गीता के तेरहवे अध्याय के पच्चीसवे श्लोक में कहा है-

अन्ये त्वेवमजानन्त: श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।

तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणा: ॥

‘परन्तु इनसे दुसरे, अर्थात जो मन्दबुद्धि वाले पुरुष है, वे इस प्रकार न जानते हुए दूसरों से अर्थात तत्व को जानने वाले पुरुष से सुनकर ही तदनुसार उपासना करते है और वे श्रवणपरायण पुरुष भी मृत्युरूप संसारसागर को निसंदेह त्र जाते है ।’

इसके पूर्व गीता में यह कहा गया था की कितने ही तो ध्यानयोग के द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार करते है,कितने ही ज्ञानयोग के द्वारा और कितने ही कर्मयोग के द्वारा, किन्तु जो पुरुष न ज्ञानयोग जानते है, न कर्मयोग ही जानते है, मूढ़, अज्ञानी है, वे भी उन ज्ञानियों के पास जाकर, उनकी बात सुनकर उसके अनुसार साधन करते है तो वे श्रवणपरायण पुरुष भी मृत्युरुपी संसारसागर से तर जाते है ।

संसार में अनासक्त जो वीतराग पुरुष है, उनके सँग से भी पुरुष वीतराग हो जाता है । विरक्त-वीतराग पुरुषों के स्मरण से चित की वृत्तियाँ एकाग्र हो जाती है, जिससे आगे चलकर उसे आत्मा का ज्ञान तक हो जाता है ।

महर्षि पतंजली से योगदर्शन के प्रथम पाद के ३७वे सूत्र में कहा है-

‘वीतराग विषयं वा चितम्’

‘वीतराग पुरुष, जिसके चित का विषय है, उसके चित की वृत्तियाँ स्थिर हो जाती है ।’ ज्ञानी, महात्मा पुरुष तो वीतराग होकर ही महात्मा बनते है । तीव्र वैराग्य और दैवी सम्पदा के लक्ष्ण तो महात्मा में साधनअवस्था में आ जाते है । दैवी सम्पदा की व्याख्या गीता के सोलहवे अध्याय के पहले से तीसरे श्लोक में की गयी है ।.... शेष अगले ब्लॉग में.

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!