※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

गुरुवार, 27 मार्च 2014

गोपियोंका विशुद्ध प्रेम अथवा रासलीला का रहस्य



|| श्रीहरिः ||
आज की शुभतिथि-पंचांग
चैत्र कृष्ण, पापमोचनी एकादशी, गुरुवार, वि०स० २०७०

** गोपियोंका विशुद्ध प्रेम अथवा रासलीला का रहस्य **
श्रीमद्भागवतकी रासपंचाध्यायी की रासलीला-अध्याय के विषय में कुछ विचार किया जाता है | साधारणतया लोग रासपंचाध्यायी का जो अभिप्राय व्यक्त किया करते हैं, वास्तविक रासपंचाध्यायी उससे भिन्न है | वस्तुतः रासपंचाध्यायी में भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों का विशुद्ध माधुर्य का भाव है | उस विशुद्ध प्रेम के कारण ही आज संसार में गोपियों की इतनी प्रशंसा की जाती है | गोपियों में श्रीराधिकाजी का स्थान सबसे ऊँचा है, रासलीला में प्रधान गोपी के नाम से इन्हीं का संकेत है | ये भगवान् की आह्लादिनी शक्ति हैं | अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के नायक भगवान् श्रीकृष्ण को सुख पहुँचाना, उनको प्रसन्न एवं आनंदित करना, यह उनका ही काम था | इनकी सखी गोपियों का भी यही काम था | श्रीकृष्णलीला-सम्बन्धी जितने भी ग्रन्थ हैं, उन सबमें हम श्रीमद्भागवत को प्रधान समझते हैं, किन्तु भागवत में यत्किंचित कहीं जो जारभाव-सा दिखता है, उसे हमारा मन स्वीकार नहीं  करता | यह चीज हमारे काम की नहीं, हमें तो विशुद्ध प्रेमभाव ही देखना चाहिए | पति-पत्नी का प्रेम तो कामभाव को लेकर हो सकता है, किन्तु भगवान् का गोपियों के साथ कामभाव को लेकर प्रेम था, यह हम स्वप्न में भी स्वीकार नहीं कर सकते | भगवान् श्रीकृष्ण का श्रीरुक्मिणीजी के साथ जो प्रेम है, जिससे कि संतानोत्पत्ति होती है, यह उनका ऐश्वर्ययुक्त प्रेम है | जिस प्रेम में कामभाव हो, वह प्रेम नहीं | भगवान् प्रेम और आनन्द के पुंज हैं | उनका प्रेम पूर्ण विशुद्ध था | भगवान् की जितनी भी क्रियाएं होती थी, केवल गोपियों को आह्लादित करने के लिए होती थीं | रासलीला में जो उनका नृत्य, गान, वंशीवादन आदि होता था, सब गोपियों को सुख पहुँचाने के लिए, उनका प्रेम बढ़ाने के लिए ही होता था | इसी प्रकार गोपियों की जितनी क्रियाएं होती थी, केवल भगवान् को आह्लादित करने के लिए ही थीं |

         भगवान् श्रीकृष्ण साक्षात् परब्रह्म परमात्मा थे, प्रेम-प्रचार के लिए ही इन्होने मनुष्यरूप में अवतार धारण किया था, न कि कामोपभोग के लिए और वास्तव में इन्होंने विशुद्ध प्रेम का प्रचार किया भी | मेरी एक लोकोक्ति सुनी हुई है, वह इस प्रकार है | एक समय नारदजी की काम से भेंट हुई, तब नारदजी ने कहा—‘अरे मदन ! तुमने तो मेरे मन में भी काम-विकार पैदा कर दिया |’ इसपर कामने नारदजी से बड़े अहंकारपूर्ण वचन कहे | वह बोला—‘तुम तो चीज ही क्या हो, मैं ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश को भी काममोहित करके नचा सकता हूँ, मेरे सम्मुख कोई भी खड़ा नहीं रह सकता |’ तब नारदजी भगवान् विष्णु के पास गये एवं कामदेव के वचन उन्होंने ज्यों-के-त्यों उन्हें कह सुनाये | नारदजी ने भगवान् से कहा, ‘उसको इतना घमंड हो गया है कि वह आपको भी कुछ नहीं समझता, यदि आप उसका अभिमान नष्ट न करेंगे तो वह और उद्दण्ड हो जायगा | इसलिए आपको उसका अभिमान नष्ट करना चाहिए |’ भगवान् विष्णु ने नारद से कहा, ‘जाओ—कामसे कह दो कि मैं द्वापर में मनुष्यरूप में अवतार ग्रहण करूँगा | उस समय मुझसे तुम किले की लड़ाई करना चाहोगे या मैदान की |’ तब नारदजी ने काम के पास आकर उससे यह बात पूछी | काम बोला—‘मुझे किले की लड़ाई में* भी कोई नहीं जीत सकता, फिर मैदान की लड़ाई में☨ तो जीत ही कौन सकता है ?’

          फिर नारदजी ने भगवान् के पास जाकर सारी बातें कह दीं | तब भगवान् ने नारद के द्वारा काम को सूचित कर दिया कि ‘तुम्हारे साथ मैंदान की लड़ाई करने के लिए मैं श्रीकृष्णरूप में अवतार लूँगा |’ भगवान् की तो बात ही क्या, भगवान् के साथ रासलीला करनेवाली गोपियों ने ही मदन के मद को चूर कर दिया | जहाँ मधुवन की अद्भुत शोभा एवं शीतल, मंद, सुगंधयुक्त पवन बह रहा था, जिसमें कि स्वाभाविक ही काम की उत्पत्ति हो सकती है और ऋषि-मुनियों का भी काम से मोहित होना संभव है, वहाँ वे सुंदरी, युवा, कुमारी तथा विवाहिता गोपियाँ इतनी जितेन्द्रिया रहीं कि उनपर कामदेव अपना कुछ भी प्रभाव नहीं डाल सका | वे सुंदरी गोपियाँ कामको जीतकर उसके मस्तक पर नाच-नाचकर उसके मदको चूर करती थीं | सुन्दरता के साथ पूर्ण युवावस्था होनेपर भी उन्होंने विशुद्ध प्रेमभाव ही रखा | इस प्रकार जब गोपियों ने ही काम को जीत लिया, तब नित्ययुक्त भगवान् की तो बात ही क्या ?
*किले की लड़ाई का अर्थ यह है कि गिरि-गुहा आदि एकान्त निर्जन स्थान में जहाँ कि काम-क्रोधादि का प्रायः अवसर ही नहीं आता, वहाँ ब्रह्मचर्य से रहकर कामको जीतना |
☨ मैदान की लड़ाई का अर्थ यह है कि गृहस्थ में स्त्रियों के समूह में रहकर काम को जीतना |...शेष अगले ब्लॉग में
—श्रद्धेय जयदयाल गोयन्दका सेठजी, ‘प्रेमयोगका तत्त्व’ पुस्तकसे कोड ५२७, गीताप्रेसगोरखपुर
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शुक्रवार, 21 मार्च 2014

ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है -९-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

चैत्र कृष्ण, पञ्चमी,  शुक्रवार, वि० स० २०७०

ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है  -९-

 
गत ब्लॉग से आगे...इस पर यदि कोई कहे की ब्राह्मणों की जो इतनी महिमा कही जाती है, यह उन ग्रंथो के कारण ही तो है, जो प्राय ब्राह्मणों के बनाये हुए है और जिनमे ब्राह्मणों ने जान बूझ कर अपने स्वार्थ साधन के लिए नाना प्रकार के रास्ते खोल दिए है । तो इसके उत्तर यह है की ऐसा करना वस्तुतः शास्त्र-ग्रंथो से यथार्थ परिचय न होने के कारण ही है । शास्त्रो और प्राचीन ग्रंथो के देखने से यह बात सिद्ध होती है, ब्राह्मण ने तो त्याग ही त्याग किया है । राज्य क्षत्रियो के लिए छोड़ दिया,धन के उत्पत्ति स्थान कृषि,गो रक्षा और वाणिज्य आदि को और धन-भण्डार को विषयो के हाथ दे दिया । शारीरिक श्रम से अर्थोपार्जन करने का कार्य शूद्रों के हिस्से में आ गया है । ब्राह्मणों ने तो अपने लिए रखा अपने लिखे केवल संतोष से भरा त्याग पूर्ण जीवन ।

इसका प्रमाण शास्त्रो के वे शब्द है, जिनमे ब्राह्मण की वृत्ति का वर्णन है –

‘ब्राह्मण ऋत, अमृत, मृत,प्रमृत, या सत्यानृत से अपना जीवन बितावे परन्तु श्रवृति अर्थात सेवावृति- नौकरी न करे । उञ्छ और शील  को ऋत  को जानना चाहिये । बिना मांगे मिला हुआ अमृत है । मांगी हुई भिक्षा मृत कहलाती है और खेती को प्रमृत कहते है । वाणिज्य को सत्यानृत कहते है, उससे भी जीविका चलाई जा सकती है किन्तु सेवाको  श्रवृति   कहते है इसलिए उसका त्याग कर देना चाहिये ।’ (मनु० ४ । ४-६ ) ।.....शेष अगले ब्लॉग में ।

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्व चिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

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गुरुवार, 20 मार्च 2014

ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है -८-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

चैत्र कृष्ण, चतुर्थी,  गुरुवार, वि० स० २०७०

ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है  -८-

गत ब्लॉग से आगे...उपयुक्त शब्दों से ब्राह्मण के स्वरुप और महत्व का अच्छा परिचय मिलता है । 

इसी प्रकार मनु महाराज ने भी कहा है –

‘स्थावर जीवो में प्राणधारी श्रेस्ठ है, प्राणधारियो में बुद्धिमान: बुद्धिमानों में मनुष्य और मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेस्ठ कहे गए है । ब्राह्मणों में विद्वानों, विद्वानों में कृत बुद्धि (अर्थात जिनकी शास्त्रोक्त कर्म में बुद्धि है) कृत बुद्धियो में शास्त्रोक्त कर्म करने वाले और उनमे भी ब्रह्म्वेता ब्राह्मण श्रेस्ठ है । उत्पन्न हुआ ब्राह्मण पृथ्वी पर सबसे श्रेस्ठ है; क्योकि वह सब प्राणियो के धर्म समूह की रक्षा के लिए समर्थ मना गया है । (मनु० १ । ९६,९७,९८)

ब्राह्मणों की निंदा का निषेध करते हुए भीष्म पितामह युधिस्ठिर से कहते है –

‘हे राजन ! जो अज्ञानी मनुष्य ब्राह्मणों की निंदा करते है, में सत्य कहता हूँ की वे नष्ट हो जाते, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है ।’ (महा अनु० ३३ । १८)

‘ब्राह्मणों की निंदा कभी नहीं सुननी चाहिये । यदि कही ब्राह्मण-निंदा होती हो तो वहा या तो निचा सिर करके  चुप चाप बैठा रहे अथवा वहाँ से उठ कर वहाँ से चला जाए । इस पृथ्वी पर ऐसा कोई भी मनुष्य न जन्मा है और न जन्मेगा ही जो ब्राह्मणों से विरोध करके सुख से जीवन व्यतीत कर सके ।’ (महा अनु० ३३ । २५-२६) ।.....शेष अगले ब्लॉग में ।

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्व चिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

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बुधवार, 19 मार्च 2014

ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है -७-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

चैत्र कृष्ण, तृतीया,  बुधवार, वि० स० २०७०

ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है  -६-

 गत ब्लॉग से आगे...‘समस्त भूतो में स्थावर (वृक्ष) श्रेस्ठ है । उनसे सर्प आदि कीड़े श्रेस्ठ है । उनसे बोध्युक्त प्राणी श्रेस्ठ है । उनसे मनुष्य और मनुष्यों में प्रथमगण श्रेस्ठ है । प्रथमगण से गन्धर्व और गन्धर्वो से सिद्धगण,सिद्धगण से देवताओ के भर्त्य किन्नर आदि श्रेस्ठ है ।
 
किन्नरों और असुरो की अपेक्षा इन्द्र आदि देवता श्रेस्ठ है । इन्द्रादि देवताओ से दक्ष आदि ब्रह्मा के पुत्र श्रेस्ठ है । दक्ष आदि की अपेक्षा शंकर श्रेस्ठ है और शंकर ब्रह्मा के अंश है इसलिए शंकर से ब्रह्मा श्रेस्ठ है । ब्रह्मा मुझे अपना परम आराध्य परमेश्वर मानते है ।
 
इसलिए ब्रह्मा से में श्रेस्ठ हु और मैं दिज देव ब्राह्मण को अपना देवता या पूजनीय समजह्ता हु । इसलिए ब्राह्मण मुझसे भी श्रेस्ठ है । इस कारण ब्राह्मण सर्व पूजनीय है, हे ब्राह्मणों ! में इस जगत में दुसरे किसी की ब्राह्मणों के साथ तुलना भी नहीं करता फिर उससे बढ़ कर तो किसी को मान ही कैसे सकता हु ।
 
ब्राह्मण क्यों श्रेस्ठ है ?
 
इसका उत्तर तो यही है की मेरे ब्राह्मण रूप मुख में जो श्रधापूर्वक अर्पण किया जाता है (ब्राह्मण भोजन कराया जाता है) उससे मुझे परम तृप्ति होती है; यहाँ तक की मेरे अग्निरूप मुख में हवन रूप करने से भी मुझे वैसी तृप्ति नहीं होती ।’ (श्री मदभागवत ५ । ५ । २१-२३) ।.....शेष अगले ब्लॉग में ।

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्व चिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

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मंगलवार, 18 मार्च 2014

ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है -६-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

चैत्र कृष्ण, द्वितीया, मंगलवार, वि० स० २०७०

ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है  -६-

 गत ब्लॉग से आगे...यह स्मरण रखना चाहिये की ब्राह्मणत्व की रक्षा ब्राह्मण के द्वारा ही होगी । क्षत्रिय, वैश्य और सूद्र अपने सदाचार,सद्गुण तथा ज्ञान आदि के प्रभाव से भगवन को प्राप्त को कर सकते है; परन्तु वे ब्राह्मण नहीं बन सकते । ब्राह्मण तो वही है जो जन्म से ही ब्राह्मण है और उसी को वेदादि  पढ़ाने का अधिकार है ।

मनु महाराज ने कहा है -
अधियिरनस्त्र्यो वर्णाः स्वकर्मस्था दिविजातय: ।
प्रब्रुयाद ब्राह्मणस्त्वेसाम् नेतराविति निश्चयः ।। (मनु १० । १)
 

“अपने-अपने कर्मो में लगे हुए (ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य-तीनो) द्विजाति वेद पढ़े परन्तु इनमे से वेद पढावे ब्राह्मण ही, क्षत्रिय वैश्य नहीं यह निश्चय है ।”

 
इससे यह सिद्ध होता है की ब्राह्मण के बिना वेद की शिक्षा और कोई नहीं दे सकता और वेद के बिना वैदिक वर्णाश्रम-धर्म नहीं रह सकता, इसलिए ब्राह्मण की रक्षा अत्यंत आवश्यक है ।

शास्त्रो में ब्राह्मण को सबसे श्रेस्ठ बतलाया है । ब्राह्मण की बतलाई हुई विधि से ही धर्म, अर्थ, कम, मोक्ष चारों की सिद्धी मानी गयी है । ब्राह्मण का महत्व बतलाते हुए शास्त्र कहते है –

 
ब्राह्मणोस्य मुखमासीद बाहु राजन्य: क्रतः ।
ऊरु तदस्य यद्वैश्य पदाभ्यां शूद्रो अजायत ।। (यजुर्वेद ३१ । ११)

‘श्री भगवान के मुख से ब्राह्मण की, बाहू से क्षत्रिय की, उरु से वैश्य की और चरणों से शुद्र की उत्पति हुई है ।’
 

 ‘उत्तम अंग से (अर्थात भगवान के श्री मुख से) उत्पन्न होने तथा सबसे पहले उत्पन्न होने से और वेद के धारण करने से ब्राह्मण इस जगत का धर्म स्वामी होता है । ब्रह्मा ने तप करके हव्य-कव्य पहुचाने के लिए और सम्पूर्ण जगत की रक्षा के लिए अपने मुख से सबसे पहले ब्राह्मण को उत्पन्न किया ।’ (मनु १ । ९३-९४)

 
‘जाति की श्रेष्ठता से, उत्पत्ति स्थान की श्रेष्ठता से, वेद के पढ़ने-पढ़ाने आदि नियमो को धारण करने से तथा संस्कार की विशेषता से ब्राह्मण सब वर्णों का प्रभु है ।’ (मनु० १० । ३) ।.....शेष अगले ब्लॉग में ।
 

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्व चिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

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सोमवार, 17 मार्च 2014

ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है -५-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

चैत्र कृष्ण, प्रतिपदा, सोमवार, वि० स० २०७०

ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है  -५-

 गत ब्लॉग से आगे...धर्मग्रंथ और संस्कृत भाषा की रक्षा होने से ही सनातन धर्म की रक्षा होगी; परन्तु इसके लिए ब्राह्मण के ब्राह्मणत्व की रक्षा की सर्वप्रथम आवश्यकता है । आजकल जो ब्राह्मण जाति ब्रह्मनत्व की और से उदासीन होती जा रही है और क्रमशः वर्णअंतर के कर्मो को ग्रहण करती जा रही है,यह बड़े खेद की बात है । परन्तु केवल खेद प्रगट करने से काम नहीं चलेगा । हमे वह कारण खोजने चाहिये जिससे ऐसा हो रहा है । इसमें कई कारण है । जैसे –

(१) पाश्चात्य शिक्षा और सभ्यता के प्रभाव से धर्म के प्रति अनास्था ।

(२) धर्म,अर्थ,काम, मोक्ष के लिए किये जाने वाले हमारे प्रत्येक कर्म का सम्बंध धर्म से है और धार्मिक कार्य में ब्राह्मण का संयोग सर्वथा आवश्यक है, इस सिद्धांत को भूल जाना ।

(३) ज्ञानमार्गी और भक्तिमार्गी पुरुषो के द्वारा जो वस्तुत: ज्ञान और भक्ति के तत्व को नहीं जानते, ज्ञान और भक्ति के नाम पर कर्मकांड की उपेक्षा होना, और इसी प्रकार निष्काम कर्म के तत्व की बात को कहने वाले लोगो द्वारा सकाम कर्म की उपेक्षा करने के भाव से प्रकारान्तर से कर्म कांड का विरोधी हो जाना ।

(४) संस्कृतग्य ब्राहमण का सम्मान न होना । शास्त्रीय कर्मकांड की अनावास्यकता मान लेने से ब्राह्मण का अनावश्यक समज्हा जाना ।

(५) कर्मकाण्ड के त्याग और राज्याश्रय न होने से ब्राहमण की अजीविका में कष्ट होना और उसके परिवार-पालन में बाधा पहुचना ।

(६) त्याग का आदर्श भूल जाने से ब्राह्मणों की भी भोग में प्रवर्ती होना  और भोगो के लिए अधिक धन की अवश्यकता का अनुभव होना ।

(७)  शास्त्रों में श्रद्धा का घट जाना ।

इस प्रकार के अनेको कारणों से आज ब्राह्मण जाति ब्राह्मणत्व से विमुख होती जा रही है,जो वर्णाश्रम-धर्म के लिए बहुत ही चिंता की बात है ।.....शेष अगले ब्लॉग में ।

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्व चिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

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रविवार, 16 मार्च 2014

ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है -४-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग
फाल्गुन शुक्ल, पूर्णिमा, रविवार, वि० स० २०७०

ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है  -४-

 
गत ब्लॉग से आगे...इस धर्ममय जीवन में चार वर्ण और उन चार वर्णों में धर्म की सुव्यवस्था रखे के लिए सबसे प्रथम ब्राह्मण का अधिकार और कर्तव्य माना गया है । ब्राह्मण धर्म-ग्रंथो की रक्षा, प्रचार और विस्तार  करता है और उसके अनुसार तीनो वर्णों से कर्म कराने के व्यवस्था करता है । इसी से हमारे धर्मग्रंथो का  सम्बंध आज भी ब्राह्मण जाति से है और आज भी ब्राह्मण जाति धर्मग्रंथो के अध्ययन के लिए संस्कृत भाषा पढने में सबसे आगे है ।
 
यह स्मरण रखना चाहिए की संस्कृत अनादि भाषा है और सर्वांगपूर्ण है । संस्कृत के सामान वस्तुतः सुसंकृत भाषा दुनिया और कोई है ही नहीं । आज जो संस्कृत की अवहेलना है उसका कारण यही है की संस्कृत राजभाषा तो है ही नहीं, उसे राज्य की और से यथा योग्य आश्रय भी प्राप्त नहीं है और तब तक होना बहुत ही कठिन भी है जब तक हिन्दू-सभ्यता के प्रति श्रधा रखने वाले संस्कृत के प्रेमी शासक न हो ।
 
इस लिए जब तक वैसा नहीं होता, कम-से-कम तब तक प्रत्येक धर्म-प्रेमी पुरुष का कर्तव्य होता है की वह सनातन वैदिक वर्णाश्रम-धर्म की रक्षा के हेतु भूत  ब्राह्मणत्व की और परम धर्म रूप संस्कृत ग्रंथो की एवं संस्कृत भाषा की रक्षा करे ।.....शेष अगले ब्लॉग में ।

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्व चिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

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शनिवार, 15 मार्च 2014

ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है -३-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन शुक्ल, चतुर्दशी, शनिवार, वि० स० २०७०

ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है  -३-
 

गत ब्लॉग से आगे...दुःख की बात है की पाश्चात्य शिक्षा और संस्कृति के मोह में पढ़ कर आज हिन्दू-जाति के अधिकांश पढ़े-लिखे लोग दुसरे के आचार-व्यवहार का अनुकरण कर बोलचाल, रहन-सहन और खान-पान में धर्म विरुद्ध आचरण करने लगे है और इसके परिणाम स्वरुप वर्णाश्रम-धर्म को न मानने वाली विधर्मी जातियो में विवाह आदि सम्बंध स्थापित करके वर्ण में संकरता उत्पन्न कर रहे है ।
 
वर्ण में संकरता आने से जब वर्ण-धर्म,जाति-धर्म नष्ट हो जायेगा तब आश्रम-धर्म तो बचेगा ही कैसे? अतएव सब लोगो को बहुत चेष्टा करके पाश्चात्य आचार-व्यवहारो के अनुकरण से स्वयं बचना और भ्रमवश अनुकरण करने वाले लोगो को बचाना चाहिए ।

हिंदी सनातन धर्म में अत्यंत छोटे से लेकर बहुत बड़े तक सभी कार्यो का धर्म से सम्बंध है । हिन्दू का जीवन धर्ममय है । उसका जन्मना-मरना, खाना-पीना, सोना-जागना, देना-लेना, उपार्जन करना और त्याग करना- सभी कुछ धर्म सगत होना चाहिए ।
 
धर्म से बाहर उसकी कोई क्रिया नहीं होती । इस धर्म का तत्व ही वर्णाश्रम-धर्म में भरा है । वर्णाश्रम-धर्म हमे बतलाता है की किसके लिए किस समय, कौन- सा कर्म किस प्रकार करना उचित है । और इसी कर्म-कौशल से हिन्दू अपने इहलौकिक जीवन को सुखमय बिता कर अपने सब कर्म भगवान् के अर्पण करता हुआ अंत में मनुष्य-जीवन के परम ध्येय परमात्मा को प्राप्त कर सकता है ।.....शेष अगले ब्लॉग में ।

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्व चिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

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शुक्रवार, 14 मार्च 2014

ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है -२-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन शुक्ल, त्रयोदशी, शुक्रवार, वि० स० २०७०

ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है  -२-

 
गत ब्लॉग से आगे...पर-देशीय और पर-धर्मीय लोगो की सभ्यता, भाषा, आचरण, व्यवहार, रहन-सहन और पोशाक-पहनावा आदि के अनुकरण ने वर्णाश्रम-धर्म की शिथिलता में बड़ी सहायता दी है । पहले तो मुसलमानी शासन में हम लोग उनके आचारो की और झुके-किसी अंश में उनके आचार-व्यवहार की नक़ल की, परन्तु उस समय तक हमारी अपने शास्त्रो में, अपने पूर्वजो में, अपने धर्म में, अपने नीति में श्रधा थी, इससे उतनी हानि नहीं हुई, परन्तु वर्तमान पाश्चात्य शिक्षा, सभ्यता और संस्कृति आँधी में तो हमारी आंखे सर्वथा बंद सी हो गयी । हम मनो आँखें मूँद कर अंधे हो कर अपनी नक़ल करने लगे है ।
 
इससे से वर्णाश्रम-धर्म में आज कल बहुत शिथिलता आ गयी है । और यदि यही गति रही तो कुछ समय में वर्णाश्रम-धर्म का बहुत ही हास हो जायेगा । और हमारा ऐसा  करना अपने ही हाथों अपने पैरों में कुल्हाड़ी मरने के समान होगा ।
 
धर्म और नीति के त्याग से एक बार भ्रमवश चाहे कुछ सुख-सा प्रतीत हो,परन्तु वह सुख की चमक उस बिजली के प्रकाश की चमक के समान है जो गिर कर सब कुछ जला देती है ।
 
धर्म और नीति का त्याग करने वाला रावण, हिरन्यकस्यपू, कंस और दुर्योधन आदि की भी एक बार कुछ उन्नती-सी दिखायी दी थी, परन्तु अंत में उनका समूल विनाश हो गया ।...शेष अगले ब्लॉग में ।

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, तत्व चिंतामणि पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

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