※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

व्यापारसे मुक्ति

हरि भक्त गोरा कुंभार
असत्य, कपट और लोभ आदि त्याग करके यदि भगवत्-प्रीत्यर्थ न्याययुक्त व्यापार किया जाय तो वही मुक्ति का मुख्य साधन बन सकता है । मुक्तिमें प्रधान हेतु भाव है, क्रिया नहीं है । शास्त्रविधि के अनुसार सकाम भाव से यज्ञ, दान, ताप आदि उत्तम कर्म करनेवाला मुक्ति नहीं पाता, सकाम बुद्धि के कारण वह तो या तो उस अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त होता है । जिसके लिये वह उक्त सत्कार्य करता है या निश्चित काल के लिये स्वर्ग को प्राप्त करता है परन्तु निष्काम भावसे किया अल्प कर्म भी मुक्ति का हेतु बन सकता है । इसीलिये सकाम कर्म को तुच्छ और अल्प कहा है, कुछ भी न करने वाले कि अपेक्षा सकाम यज्ञादि कर्म करने वाले बहुत ही उत्तम है और इन लोगों को प्रोत्साहन ही मिलना चाहिये, परन्तु सकाम भाव रहने तक वह कर्म स्त्री, धन, मान-बडाई या स्वर्गादिके अतिरिक्त परमपद कि प्राप्ति करने में समर्थ नहीं होता । इसीसे गीता में भगवान् ने सकाम कर्म को निष्काम की अपेक्षा नीचा बताया है (देखो गीता अ० २।४२,४३,४४; अ० ७।२०,२१,२२; अ०९।२०,२१) पक्षान्तरमें निष्काम कर्मकी प्रशंसा करते हुए भगवान् कहते है-----

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति  प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ।। ( गीता २।४०)

`इस निष्काम कर्म योग में आरम्भ का अर्थात बीजका नाश नहीं है और विपरीत फलरूप दोष भी नहीं होता है । इसलिये इस निष्काम कर्मयोग रूप धर्मका थोड़ा भी साधन जन्म-मृत्युरूप महान्  भयसे उद्धार कर देता है ।` अतएव मुक्तिकामियों को निष्काम कर्म का आचरण करना चाहिये । मुक्ति के लिये आवश्यकता ज्ञानकी है, किसी अन्य बाह्य  उपकरण की नहीं, इसीसे मुक्तिका अधिकार साधनसम्पन्न होनेपर सभी को है । व्यापारी भाइयों को व्यापार छोड़ने की आवश्यकता नहीं । वे यदि चाहे तो व्यापारको ही मुक्ति का साधन बना सकते हैं ।शेष गले ब्लॉग में......

नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण !
[ पुस्तक 'तत्व-चिन्तामणि` श्रीजयदयालजी गोयन्दका कोड ६८३, गीता प्रेस,गोरखपुर ]

सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

व्यापारसुधारकी आवश्यकता





अब आगे.......

    चमड़े के लिये भारतवर्ष में कितनी गौ-हत्या होती है यहाँ बतलाना नहीं होगा । अतएव लाख, रेशम और चमड़े का व्यापार और व्यवहार प्रत्येक धर्मप्रेमी सज्जन को त्याग देना चाहिये ।
   कुछ लोग केवल ब्याज का पेशा करते हैं ।यद्यपि ब्याज का पेशा निषिद्ध नहीं है परन्तु व्यापार के साथ रूपये का ब्याज उपजाना उत्तम है । ब्याज के साथ व्यापार करने वाला कभी अकर्मण्य नहीं होता, आलसी और नितान्त कृपण भी नहीं होता । उसमें व्यापार कुशलता आती है । लडके-बच्चे काम सीखते हैं । कर्मण्यता बढाती है । अतएव केवल ब्याज का ही पेशा नहीं करना चाहिये परन्तु यदि कोई ऐसा नहीं कर सके तो लोभवश गरीबों को लूटना तो अवश्य छोड़ दे । ब्याज के पेशेवाले गरीबों पर बड़ा अत्याचार किया करते हैं । कम रूपये देकर ज्यादा का दस्तावेज लिखवाते हैं । जरा-जरा-सी बातपर उनको तंग करते हैं । ब्याज पर रुपया लेनेवाले लोगों की सारी कमाई ब्याज भरते-भरते पूरी हो जाती है । कमाई ही नहीं, स्त्रियों का जेवर, पशु, धन, जमीन, घर-द्वार, सब उस ब्याज में चले जाते हैं । ब्याज के पेशेवाले निर्दयता से उनके जमीन-मकान को नीलाम करवाकर गरीब स्त्री-बच्चों को राह का कंगाल निराधार बना देते हैं । लोभसे यह सारे पाप होते हैं । इन पापों की अधिक वृद्धि प्राय: केवल ब्याज का पेशा करने वालों के अत्यधिक लोभसे होती है । अतएव ब्याज कमानेवालों को कम-से-कम लोभ से अन्याय तो नहीं करना चाहिये ।
     यथासाध्य विदेशी वस्त्र और अन्यान्य विदेशी वस्तुओं के व्यापार का त्याग करना चाहिये ।
  सबसे पहली और अन्तिम बात यह है कि झूठ, कपट, छलका त्यागकर, दूसरेको किसी प्रकार का नुकसान न पहुँचाकर  न्याय और सत्यता के साथ व्यापार करना चाहिये । यह तो व्यापार-शुद्धि की बात संक्षेप से कही गयी । इतना तो अवश्य ही करना चाहिये । परन्तु यदि वर्णधर्म मानकर निष्कामभाव से व्यापार के द्वारा परमात्मा की पूजा की जाय तो इसीसे परमपद की प्राप्ति भी हो सकती है ।

नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण !
[ पुस्तक 'तत्व-चिन्तामणि` श्रीजयदयालजी गोयन्दका कोड ६८३, गीता प्रेस,गोरखपुर ]

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

व्यापारसुधारकी आवश्यकता



अब आगे........

       इस सट्टे के सिवा एक जुआ घुड़दौड़का होता है, जिसमें बड़े-बड़े धनि-मानी लोग जा-जाकर बड़े चाव से दावँ लगाया करते हैं । मनुमहाराज ने जीवोंके जुए को सबसे बड़ा पापकारी जुआ बतलाया है । अतएव सट्टा, जुआ सब तरह से त्याग करने योग्य है । यदि कोई भाई लोभवश या दोष समझकर भी आत्माकी कमजोरी से सर्वथा त्याग न कर सकें तो कम-से-कम घुड़दौड़ में बाजी लगाना तो बिलकुल ही बंद कर दें और सट्टे में बिना हुयी चीज माथे कर-कर बेचने का काम कभी न करें । बिना हुए माथे कर-कर बेचने वाले का माल वास्तव में किसी को नहीं लेना चाहिये, इससे बड़ी भारी हानि होती है । जो सट्टे की हानि समझकर भी उसका त्याग नहीं करता वह खुद अपनी हिंसा का साधन तो करता ही है, पर दूसरों को यथेष्ट नुकसान पहुंचाता है । जो लोग `खेला`(कार्नर) वगैरह करके मालके दाम बेहद चढ़ा देते हैं वे बड़ा पाप करते हैं, अतएव खेला करनेवालों में कभी शामिल नहीं होना चाहिये, उसमें गरीबों की आह और उनका बड़ा शाप सहन करना पड़ता है ।

 कुछ ऐसे व्यापार होते हैं जिनमें बड़ी हिंसा होती है जैसे लाख, रेशम, चमडा आदि ।
  लाख कीड़ों से उत्पन्न होती है । वृक्षों से लाल गोंद जैसे टुकड़े उत्तारे जाते हैं,  उसमें दो प्रकार के जीव रहते हैं । एक तो बहुत बारीक होते हैं जो बरसात में गरमी से जहाँ लाख पड़ी होती है वहाँ निकल-निकल कर दीवारों पर चढ़ जाते हैं, दीवाल उन कीड़ों से लाल हो जाती है । दूसरे जीव लंबे कीड़े जैसे होते हैं, ये लाख के बीज समझे जाते हैं, इन असंख्य जीवों की बुरी तरह हिंसा होती है । प्रथम तो लाख के धोनेमें ही असंख्य प्राणी मर जाते हैं फिर थैलियों मे भरकर जलती हुई भट्टी मे तपाया जाता है जिससे चपड़ा बनता है, जानवरों के खून का लाखवटिया बनता है । जिस समय उसको तपाते हैं उस समय उसमें चटाचट शब्द होता है । चारों ओर दुर्गन्ध फैली रहती है, पानी खराब हो जाता है जिससे बीमारियाँ फैलती हैं । इस व्यवहार को करनेवाले अधिकांश वैश्य भाई ही हैं । बड़े खेद की बात है मारवाड़ी समाज में इसी लाख की चूड़ियाँ सुहाग का प्रतीक समझकर स्त्रियाँ पहनती हैं, इन चूड़ियों को बनानेवाले मुँहमांगे दाम लेते हैं । जिस लाख में इतनी हिंसा होती है, जो इतनी अपवित्र है उसकी चूड़ियों का तुरंत त्याग कर देना चाहिये ।

   इसी प्रकार रेशम के बनने में भी बड़ी हिंसा होती है ।रेशमा सहित कीड़े उबलते पानी मे डाल दिये जाते हैं, वे सब बेचारे उसमें झुलस जाते हैं, पीछे उन पर लिपटा हुआ रेशम निकाल लिया जाता है । शेष अगले ब्लॉग में.....
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[ पुस्तक तत्त्व-चिन्तामणि श्रीजयदयालजी गोयन्दका कोड ६८३, गीता प्रेस,गोरखपुर ]

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

व्यापारसुधारकी आवश्यकता



अब आगे.......

    आजकल सट्टे कि प्रवृत्ति देश में बहुत बढ़ गयी है । सट्टे से धन, जीवन और धर्म को कितना धक्का पहुँच रहा है, इस बात पर देश के मनस्वियों को विचार कर शीघ्र ही इसे रोकने का पूरा प्रयत्न करना चाहिये । पहले यह सट्टा अधिकतर मुंबई मे ही था और जगह कहीं कहीं बरसात के समय बादलों के सौदा हुआ करते थे, परन्तु अब तो इसका विस्तार चारों ओर प्राय: सभी व्यापार क्षेत्रों मे हो गया है । कुछ वर्षों पूर्व व्यापारी लोग सट्टे-फाटके से घृणा करने और सट्टेबाजों के पास बैठने और उनसे बात करने में हिचकते थे, पर अब ऐसे व्यापारी बहुत ही कम मिलते हैं जो सट्टा न करते हों । सट्टा उसें कहते हैं कि जिसमे प्राय: माल का लेनदेन न हो, सिर्फ समय पर घटा-नफा दिया-लिया जाय । रुई, पाट, हेसियन, गल्ला, तिलहन, हुण्डी-शेयर और चांदी आदि प्राय: सभी व्यापारी वस्तुओं का सट्टा होता है । सट्टेवालों के खर्चे अनाप-शनाप बढ़ जाते हैं । मेहनत कि कमाई से चित्त उखड़ जाता है । ये लोग पल-पल में लाखों के सपने देखा करते हैं । झूठ-कपट को तो सट्टे का साथी ही समझना चाहिये । सट्टेवालों कि सदियों कि इज्जत आबरू घंटों में बर्बाद हो जाती है । सट्टे के कारण बड़े शहरों मे प्रतिवर्ष एक-न-एक आत्महत्या या आत्महत्या के प्रयत्न सुननेमें आते हैं । आत्महत्या के विचार तो शायद कई बार कितनों के ही मन में उठते होंगे । सट्टेबाजों को आत्मिक सुख मिलना तो बहुत दूर कि बात है, वे बेचारे गृहस्थ के सुख से भी वंचित रहते हैं ।कई लोगों का चित्त तो सट्टे में इतना तल्लीन रहता है कि उन्हें भूख, प्यास और नींद तक का पता नहीं रहता । बीमार पड़ जाते हैं, बैचेनी से कहीं लुढ़क पड़ते हैं और नींद मे उन्हें प्राय: सपने सट्टे के ही आता हैं । धर्म, देश, माता, पिता आदि कि सेवा तो हो ही कहाँ से, अपने स्त्री-बच्चों कि भी पूरी सार-सम्हाल नहीं होती; घर में बच्चा बीमारी से सिसक रहा है, सहधर्मिणी रोगसेव्याकुल है, सट्टेबाज विलायत के तार का पता लगाने बाड़ों में भटक रहे हैं । एक सज्जन ने यह आँखों देखी दशा वर्णन की थी । खेद है कि इस सट्टे को भी लोग व्यापार के नाम से पुकारते हैं जिसमें न घर का पता है, न संसार का और न शरीरका । मेरी समझ से यदि इतनी तल्लीनता थोड़े समय के लिये भी परमात्मा हो जाय तो उससे परमार्थ के मार्गमें अकथनीय उन्नति हो सकती है । इस सट्टे कि प्रवृत्ति से मजुरीके काम नष्ट हो रहे हैं । कला नाश हो रही है । इस अवस्था में यथासाध्य इसका प्रचार रोकना चाहिये । शेष अगले ब्लॉग में....
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[ पुस्तक तत्त्व-चिन्तामणि श्रीजयदयालजी गोयन्दका कोड ६८३, गीता प्रेस,गोरखपुर ]

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

व्यापारसुधारकी आवश्यकता



अब आगे.....

     थोड़े से जीवन के लिये ईश्वर पर अविश्वास करके पाप बटोरना बड़ी मुर्खता है । आमदनी तो उतनी ही होती है जितनी होनी होती है, पाप जरुर पल्ले बांध जाता है । पाप का पैसा ठहरता नहीं, इधर आता है उधर चला जाता है, बट्टाखाता जितना रहना होता है उतना ही रहता है । लोग अपने मनमें ही धन आता हुआ देखकर मोहित हो जाते हैं । पाप से धन पैदा होने कि धारणा बड़ी ही भ्रम मूलक है । इससे धन तो पैदा होता नहीं परन्तु आत्मा का पतन अवश्य होता है । लोक-परलोक दोनों बिगड़ जाते हैं । जो अन्याय से धन कमाकर उसमें से थोडा-सा दान देकर धर्मात्मा बनना और कहलाना चाहते हैं वे बड़े भ्रम में हैं । भगवान् के यहाँ इतना अन्धेर नहीं है, वहाँ सबकी सच्ची परख होती है ।

   अतएव परमात्मापर विश्वास करके व्यापार में झूठ-कपट को सर्वथा त्याग देना चाहिये । किसी भी चीज में दूसरी कोई चीज कभी नहीं मिलनी चाहिये । वजन में ज्यादा करने के लिये रुई, पाट, गल्ले आदि में पानी मिलाना या गीली जगह में रखना नहीं चाहिये । खाद्य पदार्थों में मिलावट करके लोगोंके स्वास्थ्य और धर्म को कभी नहीं बिगाड़ना चाहिये । वजन, नाप और गिनती में न तो कम देना चाहिये और न ज्यादा लेना चाहिये । नमूने के अनुसार ही मालका लेन-दें करना चाहिये । नमूने के अनुसार ही मालका लेन-दें अत्यन्त आवश्यक है ।
     आढ़त ठहराकर किसी भी तरह से महाजनकी एक पाई ज्यादा लेना बड़ा पाप है । इससे खूब बचना चाहिये । इसी प्रकार कमीशन के काममें भी धोखा देकर काम नहीं करना चाहिये । दलालको भी चाहिये कि वह सच्चा रुख बताकर लेने-बेचनेवाले को भ्रम से बचाकर अपने हक़ और मेहनत का ही पैसा ले ।
    हम जिसके साथ व्यवहार करे उसके साथ हमें वैसा ही बर्ताव करना चाहिये जैसा अपने हित और स्वार्थ का ख्याल रखते है वैसा ही उसके हित और स्वार्थ का ख्याल रखना चाहिये । सबसे उत्तम तो वह है कि जो अपना स्वार्थ छोड़कर पराया हित सोचता है---दुसरे के स्वार्थ के लिये अपने स्वार्थ को त्याग देता है । व्यापार करनेवाला होनेपर भी ऐसा पुरुष वास्तव में साधु ही है । शेष अगले ब्लॉग में.......
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गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

व्यापारसुधारकी आवश्यकता


अब आगे......

     आढ़त, दलाली, कमीशन में भी तरह-तरह की चोरियां की जाती है । वास्तव में आढ़तियों को चाहिये कि महाजन के साथ आढ़त ठहरा ले उससे एक पैसा भी छिपाकर अधिक लेना हराम समझे । महाजन को विश्वास दिलाया जाता है कि आढ़त ।।।) या ।।) सैंकड़ा ली जायगी परन्तु छल कपट से जितना अधिक चढ़ाया जाय उतना ही चढाते हैं । २) ४) ५) सैंकड़ेतक वसूल करके भी सन्तोष नहीं होता । बोरा, बारदाना, मजदूरी आदि के बहाने से महाजन से छिपाकर या मालपर अधिक दाम रखकर दलाली या बट्टा वगैरह उसे न देकर अथवा गुप्तरूपसे अपना माल बाजार से ख़रीदा हुआ बताकर तरह-तरह से महाजन को ठगना चाहते हैं ।
  कमीशन के काम में भी बड़ी चोरियां होती है । बाजार मंदा हो गया तो तेजभावमें बिके हुए माल की बिक्री मंदे की दे देते हैं । तेज हो गया तो किसी दुसरे से मिलकर बिना बिके ही बहुत-सा माल खुद खरीदकर पहलेका बिका बताकर झूठी बिक्री भेज देते हैं । बंधे भाव से कम-ज्यादा भावमें भी माल बेचते हैं ।
   दलाली के काम में अपने थोड़े से लोभ के लिये ग्राहक का गला कटा दिया जाता है । दलाल का यह कर्तव्य है कि वह जिससे जिसको माल दिलवावे उन दोनों का समान हित सोचे । अपने लोभ के लिये दोनोंको उलटी-सीधी पट्टी पढ़ाकर लेनेवाले को तेजी और बेचनेवालेको झूठ ही मंदी कि रुख बताकर काम करवा देना बड़ा अन्याय है । अपनी जो सच्ची राय हो वही देनी चाहिये । दोनों पक्षों को अपनी स्पष्ट धारणा और बाजार कि स्थिति सच्ची समझानी चाहिये ।
   कहाँ तक गिनाया जाय । व्यापार के नाम पर चोरी, डकैती, और ठगी सब कुछ होती है । न ईश्वर पर विश्वास है न प्रारब्ध पर न ही सत्य और न्याय पर । वास्तव मे व्यापार में कुशलता भी नहीं है । कुशल व्यापारी सच्चा होता है वह दुसरोंको धोखा देनेवाला नहीं होता । सच्चाई से व्यापार कर वह सबका विश्वासपात्र बन जाता है, जितना विश्वास बढ़ता है उतना ही उसका झंझट कम होता है और व्यापार में दिनोंदिन उन्नति होती है । मोल-मुलाई करनेवाले दुकानदार को ग्राहकों से बड़ी माथापच्ची करनी पड़ती है । विश्वास जम जानेपर सच्चे एक दाम बतानेवाले दुकानदार को माल बेचने में कुछ भी कठिनाई नहीं होती , ग्राहक चाहकर बिना दाम पूछे उसका माल खरीदते हैं, उन्हें वहाँ ठगे जाने का भय नहीं रहता । परन्तु आजकल तो दूकान खोलने के समय प्रतिदिन लोग प्राय: भगवान् से प्रार्थना किया करते हैं---`शंकर !  भेज कोई हिये का अंधा और गठरी का पूरा` यानी भगवान् ऐसा ग्राहक भेजें जिसे हम ठग सकें, जो अपनी मुर्खता से अपने गलेपर हमसे चुपचाप छुरी फिरवा ले । इससे यह सिद्ध होता है कि कोई ग्राहक अपनी बुद्धिमानी और सावधानी से तो भले ही बच जाय, परन्तु दुकानदार तो उसपर हाथ साफ करनेको सब तरह सजा-सजाया तैयार है । शेष अगले ब्लॉग में....
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बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

व्यापारसुधारकी आवश्यकता



अब आगे......

 अनाज आदि खाने की चीजोंमें दुसरे घटिया अनाज मिलाये जाते हैं----मिटटी मिलायी जाती है । जीरा, धनिया आदि किरानेकी और सरसों तिल आदि तिलहन चीजों में भी दूसरी चीज या मिट्टी मिलायी जाती है । किसान तो मामूली मिट्टी मिलते हैं परन्तु व्यापारी लोग भी उसी रंग कि मिट्टी खरीद कर मिलाया करते हैं । वजन ज्यादा करने के लिये बरसात में माल गीली जगह रखते हैं जिससे कहीं-कहीं माल सड जाता है, खाने वाले चाहे बीमार हो जायँ, पर व्यापारियों के घरों में पैसे अधिक आने चाहिये । गल्ला आदि जहाँ रखा जाता है वहां पहलेसे ही घटिया माल तो निचे या कोनों में रखते हैं और बढ़िया माल सामने नमूना दिखाने कि जगह रखा जाता है, वजन में भी बुरा हाल है । लेन-दें के बाट भी दो तरह प्रकार के होते हैं ।

  पाट के व्यापार में भी चोरियों कि कमी नहीं है । वजन बढाने के लिये पानी मिलाया जाता है । मीलों मे माल पास करानेवाले बाबुओं को कुछ दे-दिलाकर बढ़िया के कोंट्राक्ट में घटिया माल दे दिया जाता है । वजन में चोरी होती ही है । इसी तरह रुईमें पानी तथ धुल मिलायी जाती है । पाटकी तरह इनकी गांठों के अन्दर भी ख़राब माल छिपाकर दे दिया जाता है ।

   सभी चीजों में किसानों से माल खरीदते समय दामों में, वजन में, घटिया के बदले बढ़िया माल लेने में धोखा देकर लूटने कि चेष्टा रहती है और बेचते समय इससे उल्टा व्यवहार करने कि कोशिश होती है ।

 खाद्य पदार्थों में भी शुद्ध घी, तेल, या आटा तक मिलाना कठिन हो गया है । ऐसा कोई काम नहीं जो व्यापारी लोभवश न करते हों । घीमें चरबी, तैल, विलायती घी और मिट्टी का तैल मिलाया जाता है । सरसों के साथ तीसी, रेडी तो मिलते ही है परन्तु बड़ी-बड़ी मिलोंमें कुसुमके बीज भी मिलाये जाते हैं । जिसके तैल से बदहजमी, संग्रहणी, हैजा आदि बीमारियाँ फैलती हैं । मनुष्य दुःख पाते हैं, मर जाते हैं । परन्तु लोभियों को इस बात कि कोई परवाह नहीं । इसी तैल कि खली गायों को खिलाई जाती हा जिससे उनके अनेक प्रकार कि बीमारियाँ हो जाती हैं । गौभक्त और गोसेवक कहलाने वाले लोगों कि यह गन्दी करतूत है । ऐसी मीलों मे जब जांच के लिये सरकारी अफसर आते हैं तो उन्हें धोखा देकर या कुछ भेंट पूजा देकर पिण्ड छुड़ा लिया जाता है । साइनबोर्ड पर `जलानेका तैल` लिखकर भी दण्ड से बचनेकी चेष्टा कि जाती है ।

  नारियल, तिल, सरसों आदि के तेलों में कई तरह के विलायती किरासिन तैल मिलाये जाते हैं जो पेट में जाकर भांति-भांति कि बीमारियाँ पैदा करते हैं ।
 आजकल देश मे जो अधिक बीमारी फैल रही है, घर-घर में रोगी दिख पड़ते हैं इसका एक प्रधान कारण व्यापरियों का लोभवश खाद्य पदार्थोंमें अखाद्य चीजों का मिला देना भी है । शेष अगले ब्लॉग में....


नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण !
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मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

व्यापारसुधारकी आवश्यकता



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 व्यापार में प्रधानतः क्रय-विक्रय होता है, क्रय विक्रय के कई साधन है, कोई चीज तौलपर ली-दी  जाती है, कोई नाप पर, तो कोई गिनती पर । नमूना देखना-दिखलाना भी एक साधन होता है । जो दूसरों के लिये या दूसरों का माल खरीदते बेचते हैं वे आढ़तिया कहलाते हैं और जो दुसरोंसे दुसरोंको ठीक भाव में किसी का पक्ष न कर उचित दलाली पर माल दिला देते हैं वे दलाल कहलाते हैं । इन्ही सब तरीकों से व्यापार होता है । वस्तुओं के खरीदने बेचने में तौल-नाप और गिनती आदिसे कम देना या अधिक लेना, चीज बदलकर या एक वस्तुमें दूसरी (ख़राब) चीज मिलकर दे देना या धोखा देकर अच्छी ले लेना, नमूना दिखाकर उसको घटिया चीज देना और धोखे से बढ़िया लेना, नफा, आढ़त, दलाली ठहराकर उससे अधिक लेना या धोखे से कम देना, दलाली या आढ़त के लिये झूठी बातें समझा देना अथवा  झूठ, कपट, चोरी, जबरदस्ती, या अन्य किसी प्रकारसे दुसरे का हक़ मार लेना यह सब व्यापार के दोष है । आजकल व्यापार में यह दोष बहुत ज्यादा आ गए हैं । किसी भी दोष का कोई भी ख्याल न कर किसी तरह भी धन पैदा कर लेने वाला ही आजकल समझदार और चतुर समझा जाता है । समाज में उसी कि प्रतिष्ठा होती है । धन कि कमाई के सामने उसकी सारी चोरियां घरवाले और समाज सह लेता है । इसीसे चोरी और झूठ-कपट कि प्रवृति दिनोंदिन बढ़ रही है । व्यापार में झूठ, कपट नहीं करना चाहिये या इसके बिना किये भी धन पैदा हो सकता है ऐसी धारणा ही प्राय: लोप हो चली है । इसीसे जिस तरफ देखा जाता है उसी तरफ पोल नजर आती है ।

  अधिकांश भारतीय मीलों के साथ काम करने में व्यापारियों को यह डर बना ही रहता है कि तेज बाजार में हमें या तो नमूने के अनुसार क्वालिटी का माल नहीं मिलेगा या ठीक समय पर नहीं मिलेगा । कपड़ेकी मीलों में जिस तरह कि कार्यवाहीयां होती सुनी गयी है, यदि वे वास्तव में सत्य है तो हमारे व्यापारमें बड़ा धक्का पहुंचानेवाली है । रुई खरीदने में मैनेजिंग एजेंट लोग बड़ी गड़बड़ किया करते हैं ।

 रुई के बाजार में घटबढ़ बहुत रहती है ।रुई का सौदा करने पर भाव बढ़ जाता है तो एजेंट रुई अपने खाते में रख लेते हैं और यदि घट जाता है तो अपने लिये अलग खरीदी हुई रुई भी मौका लगाने पर मील खाते मे नोंध देते हैं । वजन बढ़ने के लिये कपड़ो में मांडी लगानेमें तो अहमदाबाद मशहूर है । रुई का भाव बढ़ जाने पर सुतमें भी कमी कर दी जाती है । अनेक तरह के बहाने बताकर कांट्रेक्टका माल भी समय पर नहीं दिया जाता । प्रायः लम्बाई-चौड़ाई में भी गोलमाल कर दी जाती है । सुतमें वजन भी कम दे दिया जाता है, इन्ही कारणोंसे बहुत-सी मीलों कि साख नहीं जमती । पक्षान्तरमें विलायती वस्त्र-व्यवसाय भारत के लिये महान घातक होनेपर भी कोंट्राक्टकी शर्तों के पालनमें अधिक उदारता और सच्चाई रहने के कारण बहुत-से व्यापारी उस काम को छोड़ना नहीं चाहते । यहाँ के माल के दाम ज्यादा रहने के कारण अत्यधिक लोभ की मात्रा ही है । शेष अगले ब्लॉग में...
 नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण !
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सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

व्यापारसुधारकी आवश्यकता



भारतवर्ष के व्यापार और व्यापारियों कि आज बहुत बुरी दशा है । व्यापार की दुरवस्था में विदेशी शासन भी एक बड़ा कारण है, परन्तु प्रधान कारण व्यापारिक समुदाय का नैतिक पतन है । व्यापार की उन्नति के असली रहस्य को भुलाकर लोगों ने व्यापार मे झूठ, कपट, छलको स्थान देकर उसे बहुत ही घृणित बना डाला है । लोभ कि अत्यन्त बढ़ी हुई प्रवृति ने किसी भी तरह धन कमाने कि चेष्टा को ही व्यापार नाम से स्वीकार कर लिया है । बहुत-से भाई तो व्यापार मे झूठ, कपट का रहना आवश्यक और स्वाभाविक मानने लगे हैं और वे ऐसा भी खाते हैं कि व्यापार मे झूठ कपट के बिना काम नहीं चलता । परन्तु वास्तव में यह बड़ा भारी भ्रम है । झूठ कपट से व्यापार मे आर्थिक लाभ होना तो दूर की बात है परन्तु उलटी हानि होती है । धर्म की हानि तो स्पष्ट ही है । आजकल व्यापारी जगत मे अँग्रेज-जाति का विश्वास औरों कि अपेक्षा बहुत बढ़ा हुआ है । व्यापारी लोग अंग्रेजों के साथ व्यापार करने मे उतना डर नहीं मानते जितना उन्हें अपने भाइयों के साथ करने में लगता है । यह देखा गया है कि गल्ला, तिलहन वगैरह अंग्रेजों को दो आना निचे में भी लोग बेच देते है, आमदनी मालके लेनदेन का सौदा करने में भी पहले अंग्रेजों को देखते हैं, इसका कारण यह है कि उनमें सच्चाई अधिक है । इसीसे उन पर लोगों का विश्वास अधिक है । इस कथन का यह अभिप्राय नहीं है कि अँग्रेज सभी सच्चे और भारतवासी मात्र सच्चे नहीं है । यहाँ मतलब यह है कि व्यापारी कार्यों में हमारी अपेक्षा उनमें सत्य का व्यवहार कहीं अधिक है । वह किसी भी धर्म के ख्याल से नहीं, व्यापारमें उन्नति होने और झूठे झंझटों से बचने के ख्याल से है ।

    सच्चाई के व्यवहार के करण जिन अँग्रेज और भारतीय फर्मोंपर लोगों का विश्वास है, उनका माल कुछ ऊँचे दाम देकर भी लेने में लोग लेनेमें नहीं हिचकते । बराबर के भाव में तो खुशामद करके उनके साथ काम करना चाहते हैं । शेष अगले ब्लॉग में..
नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण !
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