※हमको तो 60 वर्षों के जीवनमें ये चार बातें सबके सार रूप में मिली हैं - 1. भगवान् के नामका जप 2. स्वरुपका ध्यान 3. सत्संग(सत्पुरुषोंका संग और सत्त्-शास्त्रोंका मनन) 4. सेवा ※ जो ईश्वर की शरण हो जाता है उसे जो कुछ हो उसीमें सदा प्रसन्न रहना चाहिये ※ क्रिया, कंठ, वाणी और हृदयमें 'गीता' धारण करनी चाहिये ※ परमात्मा की प्राप्तिके लिए सबसे बढ़िया औषधि है परमात्माके नामका जप और स्वरुपका ध्यान। जल्दी-से-जल्दी कल्याण करना हो तो एक क्षण भी परमात्माका जप-ध्यान नहीं छोड़ना चहिये। निरंतर जप-ध्यान होनेमें सहायक है -विश्वास। और विश्वास होनेके लिए सुगम उपाय है-सत्संग या ईश्वरसे रोकर प्रार्थना। वह सामर्थ्यवान है सब कुछ कर सकता है।

रविवार, 9 मार्च 2014

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण करने में स्वतन्त्र है -९-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन शुक्ल, अष्टमी, रविवार, वि० स० २०७०


गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण  करने में स्वतन्त्र है -९-

 

गत ब्लॉग से आगे ...... एक और सात्विक भोजन है और दूसरी और राजस तामस भोजन है । इन दोनों के विषय में विचार करने पर यही निर्णय मिलता है की डाल-भात, फुल्का रोटी, तरकारी-साग, दूध, दही, घी, फल, मेवा इत्यादि जो सात्विक पदार्थ है, उनका सेवन करना ही उत्त और कल्याण में सहायक है । इसके विपरीत मिर्च-खटाई आदि राजसी और लहसुन, प्याज, गांजा, सल्फा, भांग, तम्बाकू, बीडी-सिगरेट और मॉस-मंदिरा, मछली, अंडा आदि हिंसायुक्त घ्रणित और अभक्ष्य होने के करण तामसी है; अत: इनका सेवन पतनकारक और महान हानिकारक है, अतएव त्याज्य है । अपने विवेकद्वारा किये हुए इस निर्णय के अनुसार सात्विक भोजन को दाहिने पंक्ति में और राजस-तामस भोजन को बायीं पंक्ति में रखना चाहिये ।

एक और परमात्मा का चिन्तन-सेवन है और एक और दृशय संसार का चिन्तन-सेवन है । इन दोनों में कौन कर्तव्य है- इस विषय में गहराई से अपने ह्रदय में विचार करना चाहिये । भली-भाँती विचार करने पर यही निर्णय मिलता है की काम, क्रोध, लोभ, मोह, ममता, आसक्ति और स्वार्थ के वश होकर इस नाशवान क्षणभंगुर जड-चेतन, स्थावर-जन्गात्मक संसार के चिन्तन, सेवन और संग्रह में तो क्षणमात्र के लिए ही सुख-सा प्रतीत होता है; किन्तु वास्तव में इसमें सुख नही है, बल्कि संसार के चिन्तन में तो हानी-ही-हानि है । इसके विपरीत चाहे हिन्दू, मुसलमान, ईसाई –कोई भी क्यूँ न हो, उसकी सच्चिदानंद परमात्मा के अल्लाह, खुदा, गॉड, ईश्वर, ॐ, हरी, नारायण, राम,कृष्ण, शिव आदि में से जिस नाम-रूप में श्रद्धा-विस्वास और रूचि हो, उसी नाम का श्रद्धा पुर्वक जप, स्मरण, कीर्तन करना और उसके स्वरुप का चिन्तन करना ही आदि, मध्य और अन्त में सदा ही लाभदायक आनन्द प्रदान करनेवाला है, अत: यही उत्तम कर्तव्य है । उपर्युक्त निर्णय के अनुसार हमे उचित है की परमात्मचिन्तन को दाहिनी पंक्ति में और संसारचिन्तन को बायीं पंक्ति में रखे ।......शेष अगले ब्लॉग में ।           

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

शनिवार, 8 मार्च 2014

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण करने में स्वतन्त्र है -८-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन शुक्ल, सप्तमी, शनिवार, वि० स० २०७०

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण  करने में स्वतन्त्र है -८-

 

गत ब्लॉग से आगे ...... एक और दूसरों के हक का हरण करना है और एक और दूसरों के हक को हरण न करना है । इन दोनों में से कौन उत्तम है, इसको अपनी आत्मा से पूछने पर यही उत्तर मिलेगा की काम, लोभ, स्वार्थ और अज्ञान के वश में होकर दुसरे के हक की जमीन, मकान, स्त्री, पुत्र, धन आदि किसी भी पदार्थ को चोरी से, जोरी से, ठगी से या अन्य किसी भी प्रकार से अपने अधिकार में न करना ही न्याययुक्त और उत्तम है; इसके विपरीत, किसी के भी हक की वस्तु को किसी प्रकार हड़प लेना अन्यायपूर्ण और महान हानिकारक है । अत: ऐसा समझ लेने पर दूसरों के हक का हरण न करने को दाहिनी पंक्ति में और दुसरे के हक को हरण करने को बायीं पंक्ति में रख लेना चाहिये ।

एक और विषयभोगों का त्याग है और दूसरी और विषयभोगों का उपभोग । इन दोनों में से कौन उत्तम और कल्याणकारक है- इस पर अपमे अन्तकरण में विचार करना चाहिये । विवेकपूर्वक भलीभाँती विचार करने पर यही बात मन में आती है की काम, क्रोध, लोभ, स्वार्थ और अज्ञान के वशीभूत होकर ऐश-आराम, स्वाद-शौक के रूप में जो मन इन्द्रयों द्वारा विषयों का उपभोग है, उसमे यदपि आरम्भ में सुख-सा प्रतीत होता है , वह परिणाम में विष के समान और महान हानिकारक है-अत: वह राजस सुख त्याज्य हैं । इसी प्रकार जो निंद्रा, आलस्य, प्रमाद आदि के रूप में सुखभोग किया जाता है, वह आरंभ में और परिणाम में मोहकारक होने के कारण अपने पतन का हेतु है और महान हानिकारक है; अत: यह तामस सुख भी तयाज्य है । इन दोनों के विपरीत धर्म  के लिए कष्ट सहना रूप तप, सत्पुरुषों का सँग और सेवा, कल्याणकारी पुस्तकों का अनुशीलन, दुखियों की सेवा और वैराग्यपूर्वक विषयों का त्याग करते हुए अपना जीवन बिताना आदि औषध-सेवन की भांति आरम्भ में कष्टप्रद होते हुए भी परिणाम में अमृततुल्य सुखप्रद है अत: यह सात्विक सुख ही उत्तम और कल्याणकरक सिद्ध हुआ । उपर्युक्त निर्णय के अनुसार हमे विषयों के त्यागरूप सात्विक सुख को दाहिनी और की पंक्ति में और विषयों के उपभोगरूप राजस-तामस सुख को बायीं पंक्ति में रखना चाहिये ।......शेष अगले ब्लॉग में ।
      

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण करने में स्वतन्त्र है -७-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन शुक्ल, षष्ठी, शुक्रवार, वि० स० २०७०

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण  करने में स्वतन्त्र है -७-

 

गत ब्लॉग से आगे ...... एक और सत्य भाषण  है और एक और असत्य भाषण है । इन दोनों में कौन उत्तम और कल्याणकरक है । इस विषय में अपने आत्मा से पूछने पर यही उत्तर मिलता है की जो आत जैसी देखी, सुनी, समझी हो, उसको न घटाकर, न बढ़ाकर कपट छोड़कर ज्यों-का-त्यों सत्य कह देना ही उत्तम है । इसके विपरीत, काम-क्रोध, लोभ-मोह और भय के वश में होकर मिथ्याभाषण करना पाप है । जब यह निर्णय हो गया, तब सत्यभाषण को दाहिनी और की पंक्ति में और असत्य भाषण को बायीं और की पंक्ति में रखे ।

एक और ब्रह्मचर्य का पालन है और एक और व्यभिचार । इन दोनों के विषय में विचार करने पर यही निर्णय मिलता है की ब्रह्मचर्य का पालन करना अर्थात किसी भी स्त्री या बालक के साथ कुत्सितभाव से श्रवण, दर्शन, स्पर्श, वार्तालाप, एकान्तवास, चिन्तन, सहवास, हँसी-मजाक आदि क्रियाओं को न करना और कामोद्दीपक वस्तुओं का सेवन न करना ही श्रेष्ठ और कल्याणकारक है । किन्तु काम, क्रोध, लोभ, मोह के वशीभूत होकर इसके विपरीत आचरण करना-व्यभिचार करना महान पतनकारक है । अत: ब्रह्मचर्य को दाहिनी पंक्ति में और व्यभिचार को बायीं पंक्ति में रखे ।......शेष अगले ब्लॉग में ।           

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

गुरुवार, 6 मार्च 2014

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण करने में स्वतन्त्र है -६-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन शुक्ल, पंचमी, गुरूवार, वि० स० २०७०

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण  करने में स्वतन्त्र है -६-

 

गत ब्लॉग से आगे ...... एक और समता है और दूसरी और विषमता । इन दोनों में कौन उत्तम और कौन निकृष्ट है- इसका निर्णय करे । विचार करने पर यही निर्णय होता है की समता ही अमृत है और विषमता (राग-द्वेष) ही विष है, जो सब अनर्थों की जड है । अत: समता को दाहिनी और की पंक्ति में और विषमता को बायीं और की पंक्ति में रखे ।

एक और दुसरे को हित करना है और दूसरी और दूसरों का अहित करना है । इन दोनों में से कौन उत्तम है, इस पर विचार करने पर यही निर्णय प्राप्त होता है की किसी को दुःख न पंहुचाकर अहंकार, ममता, स्वार्थ और आसक्ति से रहित हो तन, मन, धन आदि द्वारा हर प्रकार से उसको  सुख पहुचाना ही अपने लिए कल्याणकारक और उत्तम है । इसके विपरीत काम, क्रोध लोभ, मोह, भय आदि के वश में होकर किसी भी प्रकार कहीं कभी किसी निमित्त से किसी प्राणी की आत्मा को किन्चितमात्र भी दुःख पहुचानाअपने लिए पतनकारक है । जब यह निर्णय हो गया की दूसरों का हित करना हमारे लिए कल्याणकारक है और दुसरे का अहित करना हमारे लिए पतनकारक है, तब हमे दूसरोंके हित को दाहिनी और की पंक्ति में और दुसरे के अहित को बायीं और की पंक्ति में रखना चाहिये ।......शेष अगले ब्लॉग में ।           

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

बुधवार, 5 मार्च 2014

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण करने में स्वतन्त्र है -५-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन शुक्ल, चतुर्थी, बुधवार, वि० स० २०७०

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण  करने में स्वतन्त्र है -५-

 

गत ब्लॉग से आगे ......  जो कल्याणकरक बाते हो, उनको दाहिनी और रखे और जो पतनकारक बाते हो उनको, उनको बायीं और रखे । इस प्रकार अलग-अलग दो पक्तियाँ बन जाएँगी, जिसमे दाहिनी और की पक्ति ग्रहण करने के लिए एवं बायीं और की पंक्ति त्याग करने के लिए है । उधाहरण के लिए-

एक और सद्व्यवहार है और दूसरी और दुर्व्यवहार । अब यह निर्णय करना है की इन दोनो में कौन उत्तम और कल्याणकरक है तथा कौन निकृष्ट और पतनकारक है ।

एक मनुष्य अपने साथ अपना स्वार्थ और अभिमान छोड़कर उत्तम श्रेणी का व्यवहार करता है तो इससे आपको कितनी प्रसन्नता और शान्ति मिलती है । आपके हृदय पर यह असर पड़ता है की इसने मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया है । अत: इससे आपको यह शिक्षा लेनी चाहिये की आप भी दूसरों के साथ ऐसा ही उत्तम व्यवहार करे । इसके विपरीत, कोई व्यक्ति आपके प्रति अत्याचार करता है, दुर्व्यवहार करता है, आपका अपमान करता है तो उससे आपके चित में उसके व्यवहार का यह असर पड़ता है की इसने मेरे साथ अनुचित और बुरा बर्ताव किया । अत: उससे आपको यह शिक्षा लेनी चाहिये की आप ऐसा दुर्व्यवहार किसी के साथ न करे ।

इससे निर्णय हो जाता है की सद्व्यवहार ही उत्तम और कल्याणकरक है तथा दुर्व्यवहार निकृष्ट और पतनकारक है । अड़ सद्व्यवहार को दाहिनी पंक्ति में और दुर्व्यवहार को बायीं पंक्ति में रखे ।......शेष अगले ब्लॉग में ।           

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

मंगलवार, 4 मार्च 2014

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण करने में स्वतन्त्र है -४-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन शुक्ल, तृतीया, मंगलवार, वि० स० २०७०

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण  करने में स्वतन्त्र है -४-

 

गत ब्लॉग से आगे ...... शास्त्रों में कल्याण के लिए बहुत से उपाय बतलाये गए है और सज्जन पुरुष भी हमारे कल्याण की बहुत-सी बाते कहते है । उन सब पर एवं उनके सिवा भी जो आज तक आपने पढ़ा, सुना, समझा है, उस पर तथा उसके अतिरिक्त भी, ईश्वर ने आपको जो बुद्धि, विवेक और ज्ञान दिया है, उसका आश्रय लेकर पक्षपात रहित हो आपको गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये ।  इस प्रकार गम्भीर विचार करने पर आपकी बुद्धि में संशय और भ्रम से रहित जो कल्याणकर भाव और आचरण प्रतीत हो, उसको सिद्धान्त मानकर तत्परतापूर्वक कटीबद्ध हो उसका सेवन करना और उसके विपरीत भाव और आचरण का कभी सेवन न करना-यही अपने द्वारा अपना उद्धार करना है । इसी प्रकार जो भाव और आचरण हमे विचार करने पर लाभप्रद प्रतीत हो, उसका सेवन न करना अपना अध:पतन करना है ।

संसार में जितने भी हिन्दू, मुसलमान, इसाई, पारसी, यहूदी, सिखआदि मत और सिद्धान्त माने जाते है, उन सबसे आदरपूर्वक निरपेक्ष होकर पक्षपात रहित हो समभाव से विवेकपूर्वक गंभीरता से अपनी बुद्धि के द्वारा निर्णय करते हुए विचार करना चाहिये की परम कल्याणदायक भाव और आचरण कौन-से है । एवं इनके लिए जो-जो बाते अपने मन में आये, उन पर सोच विचार करके निर्णय की हुई बातों की हमे दो श्रेणी बना लेनी चाहिये-(१) कल्याणकरक अच्छी बाते और (२) पतनकारक बुरी बातें ।......शेष अगले ब्लॉग में ।
         

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

सोमवार, 3 मार्च 2014

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण करने में स्वतन्त्र है -३-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन शुक्ल, द्वितीया, सोमवार, वि० स० २०७०

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण  करने में स्वतन्त्र है -३-

 
गत ब्लॉग से आगे ...... अभिप्राय यह है की जो मनुष्य जिससे अपना परम हित- कल्याण हो, उस भाव और आचरण को तो ग्रहण करता है और जिससे अध:पतन हो उस भाव और आचरण का सर्वथा त्याग करता है, वही अपने द्वारा अपना उद्धार कर रहा है ।
 
इसके विपरीत, जो मनुष्य जिससे अपना अध:पतन हो, उस भाव और आचरण को तो ग्रहण करता है तथा जिससे अपना कल्याण हो, उस भाव और आचरण को ग्रहण नही करता, वही अपने द्वारा अपना अध:पतन करता है ।
 
अत: जो मनुष्य अपने द्वारा अपने उद्धार का उपाय करता है, व स्वयं ही अपन मित्र है ; इसके विपरीत, जो मनुष्य समझ-बूझ कर अपने कल्याण के विरुद्ध आचरण करता है, वह स्वयं ही अपना शत्रु है ।

अब यह भली-भांति विचार करना चाहिये की अपने द्वारा अपना उद्धार करना क्या है और अपने द्वारा अपना अध:पतन करना क्या है ।......शेष अगले ब्लॉग में ।           

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

रविवार, 2 मार्च 2014

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण करने में स्वतन्त्र है -२-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन शुक्ल, प्रतिपदा, रविवार, वि० स० २०७०

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण  करने में स्वतन्त्र है -२-

 
गत ब्लॉग से आगे ...... जिस गीता का आदर भारतेतर देशों में भी है, उसका हम भारतीय लोग जितना आदर करना चाहिये, उतना नही करते-यह बड़ी ही लज्जा और दुःख की बात है ।

गीता बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रन्थ है । यह भगवान् की वान्ग्मयी मूर्ती है, भगवान का नि:श्वाश है और भगवान के ह्रदय का भाव है । यह उपनिषद आदि सम्पूर्ण शास्त्रों का सार है । गीता की भाषा बहुत ही सरल, सुन्दर और भावपूर्ण है । गीता के अधयन्न का महत्व गंगास्नान और गायत्रीजप से भी बढ़कर कहाँ जाये तो अत्युक्ति नहीं है । इसका श्रवण, कथन, गायन और स्मरण-सभी परम मधुर और परम कल्याणप्रद है ।

गीता में अठारह अध्याय और सात सौ श्लोक है, उनमे बहुत से ऐसे श्लोक है, जिनमे से एक श्लोक भी यदि मनुष्य अर्थ और भावसहित मनन करके काम में लाये तो उसका उद्धार हो सकता है । यहाँ गीता के एक श्लोक के विषय में कुछ विचार किया जाता है-

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:॥ (६|५)

‘अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले; क्योकि यह मनुष्य मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ।’

इस श्लोक में प्रधान चार बाते बतलाई गई है-

मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये ।

मनुष्य को अपने द्वारा अध:पतन नही करना चाहिये ।

मनुष्य आप ही अपना मित्र है ।

मनुष्य आप ही अपना शत्रु है ।......शेष अगले ब्लॉग में ।           

—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

शनिवार, 1 मार्च 2014

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण करने में स्वतन्त्र है -१-


।। श्रीहरिः ।।

आज की शुभतिथि-पंचांग

फाल्गुन कृष्ण , अमावस्या, शनिवार, वि० स० २०७०

गीता के अनुसार मनुष्य अपना कल्याण  करने में स्वतन्त्र है -१-

 

भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में जो उपदेश दिया है, वह किसी सम्प्रदाय को सामने रखकर नही दिया है । वह तो सबके लिए समान रूप से पालनीय है । इसलिए गीता सार्वजनिक ग्रन्थ है । गीता के उपदेश का हिन्दू तो आदर करते ही है, कितने ही इस्लाम धर्म के मानने वाले मुसलमान तथा ईसाई धर्म को मानने वाले लोग एव अन्य धर्मावलम्बी लोग भी इसका आदर करते है । जर्मनी, अमेरिका आदि देशों के निवासियों से इसका बहुत आदर किया है ।

सुना गया है की योरप के किसी एक बड़े भारी पुस्तकालय में अनेक देशों की भाषाओँ और लिपियों की पुस्तके लाखों की संख्या में एकत्र की, जो सुव्यवस्था पूर्वक आलमारियों में सजाई हुई थी । उस पुस्तकालय के बड़े हाल के मध्य में टेबल पर सुन्दर वस्त्र के ऊपर श्रीमद भगवदगीता की एक पुस्तक रखी हुई थी । वहां एक भारतवासी सज्जन गए, उन्होंने उस पुस्तकालय के प्रधान से पुछा-‘टेबल पर सजाकर रखी हुई यह कौन सी पुस्तक है !’
 
उन्होंने उत्तर में कहाँ- ‘श्रीमद भगवतगीता ।’
 
भारतीय सज्जन ने पुछा-‘भगवतगीता क्या है ?’
 
इस प्रश्न को सुनकर उन अधिकारी महोदय को बड़ा आश्चर्य हुआ । उन्होंने हँस कर कहाँ-‘बड़े आश्चर्य की बात है की आप भारत में रह कर भी भारत के प्रधान और उच्च कोटि के महापुरुष श्रीकृष्ण के द्वारा अपने प्रिय मित्र अर्जुन को दिए हुए उपदेशरूप श्रीमदभगवतगीता-ग्रन्थ को ही जानते ! यह तो बहुत लज्जा की बात है ।
 
यह सुनकर वे भारतीय सज्जन बहुत ही लज्जित हुए । उनपर उस प्रधान के उपर्युक्त वचनों का बड़ा असर पडा । उन्होंने कहाँ-‘मैंने नाम तो सुना था, पर इसे देखा न था; अब मैं इसका अधयन्न करूँगा ।’......शेष अगले ब्लॉग में ।

  —श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!